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यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए नई दिल्ली। कभी विलुप्ति के बेहद करीब पहुंच चुके एशियाई शेरों ने भारत में उल्लेखनीय वापसी की है और वर्ष 2015 में 523 रही उनकी संख्या बढ़कर 2025 में 891 हो गई है जबकि गुजरात के ग्रेटर गिर क्षेत्र में हुई 16वीं एशियाई शेर जनसंख्या गणना ने यह संकेत दिया है कि लंबे समय से चल रहे संरक्षण प्रयास अब ठोस नतीजे देने लगे हैं। 10 साल में 368 शेर बढ़े भारत में एशियाई शेरों की संख्या वर्ष 2015 में 523 थी, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 891 हो गई यानी एक दशक में उनकी संख्या में 368 की बढ़ोतरी हुई है। यह वृद्धि ऐसे समय में खास महत्व रखती है, जब एशियाई शेर कभी अपने प्राकृतिक क्षेत्र से लगभग पूरी तरह समाप्त होने की स्थिति में पहुंच चुके थे। क्यों बढ़ी शेरों की संख्या एशियाई शेरों की संख्या में सुधार के पीछे कई कारकों को महत्वपूर्ण माना गया है। इनमें सख्त कानूनी सुरक्षा , शेरों के शिकार बनने वाले वन्य जीवों की संख्या में सुधार, पूरे परिदृश्य को ध्यान में रखकर किया गया संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी प्रमुख हैं। यानी, संरक्षण केवल जंगल के भीतर शेरों की रक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके भोजन, आवास और आसपास रहने वाले समुदायों को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा गया। एशियाई शेर कौन हैं एशियाई शेर दुनिया की बड़ी बिल्ली प्रजातियों में शामिल हैं। शेरों की एक खास विशेषता यह है कि वे अन्य बड़ी बिल्लियों के विपरीत समूह में रहते हैं। इनके समूह को प्राइड कहा जाता है। भारत में एशियाई शेरों का मुख्य प्राकृतिक क्षेत्र गुजरात का गिर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य तथा उसके आसपास का व्यापक क्षेत्र है। कहां पाए जाते हैं एशियाई शेर एशियाई शेरों की मुख्य आबादी गुजरात के गिर क्षेत्र और उसके आसपास के ग्रेटर गिर लैंडस्केप में पाई जाती है। यह आबादी लंबे समय तक एक ही भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित रही है, इसलिए संरक्षण के लिहाज से इसे संवेदनशील माना जाता है। अब बरदा वन्यजीव अभयारण्य भी एशियाई शेरों के दूसरे महत्वपूर्ण आवास के रूप में उभर रहा है, जबकि कुनो राष्ट्रीय उद्यान में इनके नियोजित पुनर्वास की भी बात की गई है। किस तरह के जंगल पसंद करते हैं शेर एशियाई शेर मुख्य रूप से शुष्क पर्णपाती वनों में पाए जाते हैं। ऐसे जंगलों में पेड़ मौसम के अनुसार पत्तियां गिराते हैं और यहां घासभूमि तथा खुले क्षेत्र भी मिलते हैं, जो शेरों और उनके शिकार दोनों के लिए उपयोगी होते हैं। संरक्षण स्थिति: परीक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण एशियाई शेरों की संरक्षण स्थिति को अलग-अलग संस्थाओं ने उच्च सुरक्षा श्रेणी में रखा है। आईयूसीएन रेड लिस्ट: लुप्तप्राय सीआईटीईएस: परिशिष्ट-I वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I इन तीनों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिहाज से विशेष रूप से याद रखना चाहिए। सबसे बड़ा खतरा: एक ही क्षेत्र में ज्यादा आबादी एशियाई शेरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनकी अधिकांश आबादी एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में केंद्रित है। ऐसी स्थिति में किसी बड़ी बीमारी, जंगल की आग या प्राकृतिक आपदा का असर पूरी आबादी पर पड़ सकता है। इसके अलावा लंबे समय तक सीमित आबादी के भीतर प्रजनन से इनब्रीडिंग का खतरा भी बढ़ सकता है। इंसान और शेर के बीच संघर्ष कृषि क्षेत्र और बस्तियों के विस्तार के कारण शेर कई बार मानव आबादी के करीब पहुंच जाते हैं। इससे पशुधन पर हमले और मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना बढ़ती है। ग्रामीण इलाकों में पालतू पशुओं का शिकार होने पर स्थानीय लोगों के साथ तनाव पैदा हो सकता है, इसलिए सामुदायिक भागीदारी संरक्षण का अहम हिस्सा बनती है। तार, जाल और जहरीले शव भी खतरा एशियाई शेरों की मौत केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं होती। उनके सामने तार के फंदे, जाल और जहरीले शव जैसी मानवजनित चुनौतियां भी हैं। कई बार पशुधन के शिकार के बाद बदले की कार्रवाई में भी शेरों को नुकसान पहुंचाया जाता है। आवास पर भी दबाव अत्यधिक पशु चराई से शेरों के आवास की गुणवत्ता प्रभावित होती है। ज्यादा चराई के कारण कई क्षेत्रों में आक्रामक खरपतवार और झाड़ियां फैल सकती हैं, जिससे प्राकृतिक घासभूमि और पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होता है। इसका असर शेरों के शिकार आधार और अंततः उनकी आबादी पर पड़ सकता है। ‘प्रोजेक्ट लायन’ ने बदली संरक्षण की रणनीति एशियाई शेरों के संरक्षण के लिए वर्ष 2020 में ‘प्रोजेक्ट लायन’ शुरू किया गया। इस परियोजना का जोर केवल शेरों की संख्या बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पूरे परिदृश्य के संरक्षण पर है। इसके तहत आवास सुधार, आबादी प्रबंधन और पारिस्थितिक मजबूती पर काम किया जा रहा है। दूसरा सुरक्षित घर क्यों जरूरी एशियाई शेरों की पूरी आबादी को एक ही क्षेत्र में रखना दीर्घकालिक संरक्षण के लिहाज से जोखिम भरा माना जाता है। इसी कारण दूसरे सुरक्षित आवास विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। बरदा वन्यजीव अभयारण्य एशियाई शेरों के दूसरे घर के रूप में उभर रहा है, जबकि अलग क्षेत्र में आबादी स्थापित करना भविष्य में बीमारी या प्राकृतिक आपदा से होने वाले बड़े नुकसान को कम कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहल बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस की स्थापना भी महत्वपूर्ण पहल है। इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों के बीच ज्ञान, अनुभव और संरक्षण तकनीकों के आदान-प्रदान को मजबूत करना है। स्थानीय समुदाय क्यों हैं जरूरी वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारी एजेंसियों के भरोसे सफल नहीं हो सकता। गिर क्षेत्र में स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ने के लिए गिर संवाद सेतु पहल जैसे प्रयास किए गए हैं। इनका उद्देश्य लोगों और वन विभाग के बीच संवाद बढ़ाना तथा मानव-शेर सह-अस्तित्व को मजबूत करना है। याद रखने वाले पॉइंट वर्ष 2015 में एशियाई शेरों की संख्या: 523 वर्ष 2025 में संख्या: 891 10 वर्षों में वृद्धि: 368 गणना: 16वीं एशियाई शेर जनसंख्या गणना प्रमुख क्षेत्र: ग्रेटर गिर लैंडस्केप, गुजरात आईयूसीएन स्थिति: लुप्तप्राय सीआईटीईएस: परिशिष्ट-I वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची-I प्रमुख आवास: शुष्क पर्णपाती वन प्रोजेक्ट लायन की शुरुआत: 2020 उभरता दूसरा आवास: बरदा वन्यजीव अभयारण्य अंतरराष्ट्रीय पहल: इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस सामुदायिक पहल: गिर संवाद सेतु परीक्षा में कैसे पूछा जा सकता है प्रतियोगी परीक्षाओं में एशियाई शेरों से जुड़े सवाल उनकी भौगोलिक स्थिति, संरक्षण श्रेणी, प्रोजेक्ट लायन, बरदा वन्यजीव अभयारण्य, गिर राष्ट्रीय उद्यान और इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस से पूछे जा सकते हैं। प्रारंभिक परीक्षा के लिए तथ्य और संरक्षण स्थिति महत्वपूर्ण हैं, जबकि मुख्य परीक्षा में मानव-वन्यजीव संघर्ष, एकल आबादी का जोखिम, सामुदायिक संरक्षण और परिदृश्य आधारित संरक्षण जैसे मुद्दों पर प्रश्न बन सकते हैं। निष्कर्ष: संख्या बढ़ी लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं 523 से 891 तक पहुंचना भारत के वन्यजीव संरक्षण की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन एशियाई शेरों की लंबी अवधि की सुरक्षा के लिए केवल संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है। उनके लिए अलग-अलग सुरक्षित आवास, मजबूत शिकार आधार, रोग नियंत्रण, मानव-शेर सह-अस्तित्व और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। यही कारण है कि एशियाई शेरों की यह वापसी केवल एक वन्यजीव सफलता नहीं बल्कि भारत में परिदृश्य आधारित और समुदाय-केंद्रित संरक्षण मॉडल का महत्वपूर्ण उदाहरण भी है।