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नई दिल्ली। पुरातन काल में सोलह महाजनपदों में शुमार अंगभूमि की सांस्कृतिक पहचान केवल उसके प्राचीन इतिहास और गौरवशाली परंपराओं तक सीमित नहीं रही। इस भूमि की एक विशिष्ट विशेषता उसकी ‘अंग-बंग’ सांस्कृतिक विरासत भी रही है। गंगा के दोनों किनारों पर विकसित इस सांस्कृतिक भूगोल ने बिहार और बंगाल के बीच संवाद का ऐसा सेतु बनाया, जिसमें भाषा की सीमाएं अक्सर धुंधली पड़ जाती थीं। भागलपुर इस संवाद का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यहां रहकर अनेक बांग्लाभाषी विभूतियों ने साहित्य और संस्कृति को समृद्ध किया तथा अपनी रचनात्मक प्रतिभा से भागलपुर का नाम देश-देशांतर में रोशन किया। इनमें कथाशिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और मानवीय संवेदनाओं के विलक्षण चितेरे बनफूल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। चिकित्सक भी, साहित्यकार भी बनफूल अर्थात् डॉ. बलाय चंद मुखोपाध्याय का साहित्यिक व्यक्तित्व अत्यंत विराट था। साठ से अधिक उपन्यासों, सैकड़ों लघुकथाओं, नाटकों, कविताओं और अन्य रचनाओं के सर्जक बनफूल मूलतः चिकित्सक थे लेकिन उनकी संवेदनशील दृष्टि उन्हें अपने समय के आम आदमी तक ले जाती थी। उनकी रचनाओं में जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग असाधारण अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। मनुष्य की विडंबना, संघर्ष, प्रेम, अकेलापन और सामाजिक विषमता उनके साहित्य के केंद्रीय सरोकार रहे। फिल्मों ने भी बढ़ाई लोकप्रियता सन् 1960 के आसपास तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी बांग्ला फिल्म ‘हाटे बाजारे’ ने बनफूल की साहित्यिक लोकप्रियता को व्यापक जन-परिचय दिया। अशोक कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फिल्म को वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक मिला था। कम्बोडिया में आयोजित एशियन फिल्म महोत्सव में भी इसे सम्मानित किया गया। ‘हाटे बाजारे’ ही नहीं, बनफूल की अन्य रचनाओं पर भी फिल्में बनीं। उनके नाटक ‘मंत्रमुग्ध’ पर बिमल राय ने फिल्म बनाई, जबकि उनके चर्चित उपन्यास ‘अग्नीश्वर’ पर भी फिल्म का निर्माण हुआ। इससे उनकी रचनात्मकता की व्यापक पहुंच का अनुमान लगाया जा सकता है। बिहार से गहरा जुड़ाव लेकिन, बनफूल को केवल बांग्ला साहित्य के लेखक के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। उनका जीवन और रचना-संसार बिहार, विशेषकर भागलपुर की मिट्टी से गहरे जुड़े थे। भारत सरकार ने उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। उनकी जन्मशती के अवसर पर डाक टिकट भी जारी किया गया। उनकी कालजयी कृति ‘हाटे बाजारे’ की स्मृति आज भी रेल यात्रा के एक परिचित नाम में जीवित है। बरौनी से नवगछिया होते हुए सियालदह तक चलने वाली ‘हाटे बाजारे एक्सप्रेस’ उनके साहित्य की लोकप्रियता का एक प्रतीकात्मक स्मरण भी है। मनीहारी से शुरू हुआ सफर बनफूल का जन्म 19 जुलाई 1899 को मनीहारी में हुआ था। उनके पिता सत्यचरण मुखोपाध्याय मूलतः बंगाल के हुगली जिले के निवासी थे और नौकरी के सिलसिले में साहेबगंज के गंगा पार मनीहारी में रहते थे। गंगा के इस भूगोल ने शायद अनजाने ही बालक बलाय चंद के जीवन में बिहार और बंगाल के सांस्कृतिक संबंधों की पहली जमीन तैयार कर दी थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मनीहारी, साहेबगंज और हजारीबाग में हुई। इसके बाद उन्होंने पटना से चिकित्सा की पढ़ाई की और कोलकाता से पैथोलॉजी में विशेषज्ञता प्राप्त की। चिकित्सक के रूप में उन्होंने बंगाल के आजिमगंज में मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्य शुरू किया। भागलपुर बना कर्मभूमि पिता के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उन्हें अवकाश लेकर भागलपुर आना पड़ा। उनके छोटे भाई भी भागलपुर सदर अस्पताल में कार्यरत थे। यही वह शहर था, जिसने आगे चलकर उनके जीवन और साहित्य को एक स्थायी आधार दिया। लगभग 1929 के आसपास भागलपुर आने के बाद बनफूल ने इस शहर को अपना कर्मक्षेत्र बना लिया। जीवन के लगभग चार दशक उन्होंने यहीं बिताए। दिन में डॉक्टर, रात में साहित्यकार भागलपुर में उन्होंने अपना पैथोलॉजिकल क्लीनिक खोला और चिकित्सा-कार्य शुरू किया। इस दौरान उन्होंने कई बार अपना घर और क्लीनिक बदला लेकिन अंततः आदमपुर मोहल्ले में अपना मकान खरीद लिया। चिकित्सा उनका पेशा था और साहित्य उनका जीवन। दिन में वे मरीजों की जांच करते और रात को जागकर लिखते। यह दोहरी दिनचर्या उनके व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में थी। एक ओर वे रोग के लक्षणों को वैज्ञानिक दृष्टि से देखते थे, दूसरी ओर मनुष्य के भीतर छिपे दुख और संवेदना को साहित्यकार की दृष्टि से पहचानते थे। साहित्यिक पहचान का विस्तार कोलकाता से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘शनिवारे चिट्ठी’ में उनकी व्यंग्य कविताएं और लेख नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे। शीघ्र ही उनकी रचनात्मक पहचान स्थापित हो गई। ‘बनफूलेर गल्प’, ‘बनफूलेर कविता’ और उपन्यास ‘तृणखंड’ जैसी पुस्तकों के एक साथ प्रकाशित होने से बांग्ला साहित्य में उनकी उपस्थिति सशक्त हुई। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होने के साथ उनका साहित्यिक संसार विस्तार पाता गया। भागलपुर बना रचनात्मक प्रेरणा का केंद्र भागलपुर केवल उनके रहने का शहर नहीं था; यह उनकी रचनात्मक चेतना का हिस्सा बन गया था। शहर की गलियां, घाट, बाजार, अस्पताल, मजदूर बस्तियां, नदी और उसके किनारे का जीवन उनके भीतर लगातार कुछ लिखता रहता था। उन्होंने जीवन को दूर खड़े होकर नहीं देखा। वे उसके बीच रहते थे। चिकित्सक होने के कारण समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से उनका प्रतिदिन संपर्क होता था। यही अनुभव बाद में उनकी कहानियों और उपन्यासों की जीवंत सामग्री बना। दिनकर, महादेवी और निराला से रहे आत्मीय संबंध भागलपुर में रहते हुए उनका संपर्क हिंदी और बांग्ला साहित्य के अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों से रहा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर उन दिनों भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति थे। बनफूल और दिनकर के बीच आत्मीय संबंध थे। दिनकर ने उन्हें विश्वविद्यालय की सीनेट का सदस्य भी बनाया। महादेवी वर्मा और निराला से भी उनके संबंध रहे। साहित्यकार-कलाकार हरिकुंज के चित्रशाला स्टूडियो में डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ सहित अनेक साहित्यकारों के साथ बनफूल की बैठकी होती थी। इस तरह भागलपुर उस समय साहित्यिक संवाद का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ था। भागलपुर के लोगों से मिला अपार स्नेह बनफूल ने अपनी जीवनी में भागलपुर के लोगों के प्रति जिस आत्मीयता का उल्लेख किया है, वह उनके शहर से रिश्ते को समझने की महत्वपूर्ण कुंजी है। वे लिखते हैं कि भागलपुर में बिहारी और दूसरे गैर-बंगालियों से उन्हें जो आंतरिक प्यार मिला, वह बंगालियों से नहीं मिला। बंगालियों ने उनकी ख्याति के कारण उन्हें स्वीकार किया लेकिन बिहारी लोगों ने उन्हें अधिक प्यार दिया। यह कथन केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक आत्मीयता का प्रमाण है, जिसमें भाषा और क्षेत्र की दीवारें मनुष्यता के सामने छोटी पड़ जाती हैं। बनफूल के साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भी यही मानवीय निकटता है। वे समाज के उन लोगों (शिवशंकर सिंह पारिजात- पूर्व जनसंपर्क उपनिदेशक एवं इतिहासकार)



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