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पटना। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की साहित्यिक यात्रा में भागलपुर केवल एक शहर नहीं, वह महत्वपूर्ण पड़ाव है जहां उनकी कविता को पहली बड़ी सार्वजनिक पहचान मिली। दिनकर ने स्वयं स्वीकार किया था कि ‘हिमालय’ के कारण जनता में उनका नाम पहली बार फैला। इस कविता ने इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल का स्नेह भी अर्जित किया था। संयोग यह कि ‘हिमालय’ भागलपुर में लिखी गई, यहीं उसका सार्वजनिक पाठ हुआ और बाद में सुल्तानगंज से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘गंगा’ में छपी। इस तरह भागलपुर दिनकर की साहित्यिक पहचान के आरंभिक निर्माण में सृजन, पाठ और प्रकाशन—तीनों स्तरों पर उपस्थित है। ‘हिमालय’ ने रखी पहचान की नींव वर्ष 1933 में भागलपुर में बिहार प्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मेलन आयोजित हुआ था। इसके सभापति प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल थे और आयोजन की जिम्मेदारी पंडित शिवदुलारे मिश्र ने संभाली थी। कवि सम्मेलन का विषय ‘हिमालय’ था। दिनकर भी इसमें भाग लेने पहुंचे। इसी अवसर पर उन्होंने वह कविता लिखी, जिसने आगे चलकर उनकी राष्ट्रीय पहचान की आधारभूमि तैयार की। लालूचक की वह जागती रात दिनकर ने अपने संस्मरण में लिखा कि वे भागलपुर के लालूचक में एक मित्र के घर ठहरे थे। जगह की कमी के कारण बरामदे में सोने की जगह मिली और खाट भी ठीक नहीं थी। उसी खाट पर जागते-जागते उन्होंने रात भर में ‘हिमालय’ लिखी। अगले दिन कवि सम्मेलन में इसका पाठ हुआ तो काशी प्रसाद जायसवाल सहित सभा प्रभावित हुई। श्रोताओं की मांग पर कविता का कई बार पाठ करना पड़ा। दिनकर ने लिखा, “जनता में मेरा नाम पहले-पहल इसी कविता के कारण फैला, किंतु उससे भी पूर्व इस कविता ने जायसवाल जी का स्नेहभाजन बना दिया।” साधारण खाट से साहित्यिक मंच तक लालूचक की इस रात का प्रसंग भागलपुर के प्रख्यात पत्रकार अवधेश कुमार मिश्र भी सुनाया करते थे। वे स्वयं लालूचक के रहने वाले थे। यह प्रसंग बताता है कि प्रतिभा के सामने सुविधाओं का अभाव हमेशा दीवार नहीं बनता। साधारण खाट पर जागकर लिखी गई कविता अगले दिन साहित्यिक मंच पर गूंजती है और वही गूंज एक युवा कवि की पहचान को दूर तक ले जाती है। ‘हिमालय’ की यात्रा कवि सम्मेलन पर समाप्त नहीं हुई। सुल्तानगंज से प्रकाशित ‘गंगा’ में इसका प्रकाशन हुआ। पत्रिका के संपादन से शिवपूजन सहाय और राहुल सांकृत्यायन जैसे साहित्यकारों के नाम जुड़े रहे। इससे कविता सम्मेलन के श्रोताओं से आगे साहित्यिक पाठकों तक पहुंची। इस अर्थ में भागलपुर में कविता ने आकार लिया, मंच पाया और मुद्रित शब्द के रूप में व्यापक संसार में प्रवेश किया। ओज से कहीं व्यापक दिनकर तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. नृपेन्द्र प्रसाद वर्मा की साहित्यिक दृष्टि से दिनकर को केवल ओज, वीरता और राष्ट्रवाद के कवि के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। उनकी कविता में राष्ट्रीय चेतना के साथ सामाजिक सरोकार, मनुष्य की गरिमा, किसान और श्रमजीवी जीवन की पीड़ा तथा सांस्कृतिक आत्मबोध के प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। भागलपुर में दिनकर की शुरुआती साहित्यिक पहचान इसी व्यापक रचनात्मक व्यक्तित्व को समझने की महत्वपूर्ण कड़ी है। भागलपुर से दिनकर का रिश्ता आगे भी बना रहा। वे भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने और 10 जनवरी 1964 से 3 मई 1965 तक इस दायित्व का निर्वहन किया। लेकिन उनका संबंध केवल प्रशासनिक नहीं था। वे यहां के साहित्यिक जीवन से भी आत्मीय रूप से जुड़े रहे। ‘चित्रशाला’ बनी साहित्यिक चौराहा खलीफाबाग की ‘चित्रशाला’ इस संबंध का महत्वपूर्ण केंद्र थी। इसके मालिक और साहित्यकार स्वर्गीय हरिकुंज साहित्यिक गतिविधियों के सक्रिय केंद्र बने रहे। यहां डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’, हरिकुंज, बंगला के प्रसिद्ध साहित्यकार बलाइचांद मुखोपाध्याय ‘वनफूल’ और अनेक साहित्यकार जुटते थे। यह केवल बैठकी नहीं, भागलपुर के साहित्यिक संवाद का जीवंत केंद्र था। डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ ने ‘भागलपुर भागता हुआ शहर’ और ‘भागलपुर का साहित्यिक चौराहा खलीफाबाग’ जैसे स्तंभों में उस दौर की साहित्यिक स्मृतियों और चित्रशाला के प्रसंग दर्ज किए। उन्होंने दिनकर द्वारा ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ के पाठ का भी उल्लेख किया। चित्रशाला के मालिक हरिकुंज के पुत्र रंजन कुमार इस स्मृति के साक्षी हैं। उन्होंने अपने कैमरे में दिनकर की वह तस्वीर सुरक्षित की, जब वे ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ का पाठ कर रहे थे। संस्मरण और तस्वीर मिलकर उस समय के साहित्यिक वातावरण की जीवंत छवि सामने रखते हैं। पत्रकारिता ने सहेजी साहित्यिक स्मृति स्थानीय पत्रकारिता ने भी इस साहित्यिक वातावरण को आगे बढ़ाया। लगभग 1985 के आसपास भागलपुर से स्थानीय दैनिक ‘नई बात’ का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके प्रधान संपादक राजेंद्र प्रसाद सिंह थे। साहित्य और पत्रकारिता के बीच संवाद को इस अखबार ने स्थान दिया। डॉ. ‘बेचन’ के स्तंभों में बदलते भागलपुर के साथ उसकी साहित्यिक स्मृतियां भी दर्ज होती रहीं। इस तरह स्थानीय पत्रकारिता शहर की साहित्यिक स्मृति को संरक्षित करने का माध्यम बनी। युग-धर्म की हुंकार दिनकर की कविता को समझने के लिए भागलपुर के इस परिवेश को याद करना इसलिए जरूरी है कि उनकी कविता केवल शब्दों का ओज नहीं थी। वह अपने समय की बेचैनी से निकली आवाज थी- “सुनूं क्या सिंधु मैं गर्जन तुम्हारा, स्वयं युग-धर्म का हुंकार हूं मैं। कठिन निर्घोष हूं भीषण अशनि का, प्रलय गांडीव का टंकार हूं मैं।” अतीत से वर्तमान पर निशाना दिनकर की काव्य-चेतना उस दौर में विकसित हुई जब देश अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था। साहित्य राष्ट्रीय जागरण का माध्यम बन रहा था। इतिहास उनके लिए केवल अतीत नहीं, वर्तमान को जगाने का माध्यम था- “जब भी अतीत में जाता हूं, मुर्दों को नहीं जिलाता हूं। पीछे हटकर फेंकता बाण, जिससे कंपित हो वर्तमान।” राष्ट्रीय चेतना का प्रखर स्वर ‘हिमालय’ का राष्ट्रीय स्वर आगे ‘हुंकार’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में अधिक प्रखर हुआ। गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह तथा क्रांतिकारी युवाओं के संघर्ष के बीच का वैचारिक तनाव भी उनकी कविता में सुनाई देता है— “रे, रोक युधिष्ठिर को न यहां, जाने दे उनको स्वर्ग धीर। पर, फिरा हमें गांडीव गदा, लौटा दे अर्जुन भीम वीर।” ### हुंकार के साथ करुणा भी लेकिन दिनकर को केवल वीर रस का कवि कहना अधूरा होगा। उनकी कविता में राष्ट्र के साथ मनुष्य, संघर्ष के साथ करुणा और हुंकार के साथ प्रेम है। ‘रश्मिरथी’ में कर्ण के माध्यम से सामाजिक भेदभाव पर प्रश्न उठता है— “ऊंच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है, दया धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।” विषमता पर तीखा सवाल ‘विपथगा’ में सामाजिक असमानता का दर्द है— “श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र, बच्चे भूखे अकुलाते हैं, मां की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।” किसान की पीड़ा का स्वर स्वतंत्रता उनके लिए केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति नहीं थी। उसका अर्थ सामाजिक और आर्थिक न्याय भी था। इसलिए किसान की पीड़ा उनकी कविता में बार-बार लौटती है- “जेठ हो कि पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है, छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है। मुख में जीभ, शक्ति भुजा में, जीवन में सुख का नाम नहीं है, वसन कहां? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है।” सत्ता और अवसरवाद पर प्रहार राज्यसभा के सदस्य के रूप में 1952 से 1963 तक उन्होंने सत्ता और समाज को निकट से देखा। राजनीतिक अवसरवाद पर उनकी पंक्तियां आज भी सवाल खड़ा करती हैं- “टोपी कहती है, मैं थैली बन सकती हूं। कुरता कहता है मुझे बोरिया ही कर लो। ईमान बचाकर कहता है, आंखें सबकी, बिकने को हूं तैयार खुशी से जो दे दो।” ‘उर्वशी’ में प्रेम और सौंदर्य उनकी रचनात्मकता का दूसरा पक्ष प्रेम और सौंदर्य है। ‘उर्वशी’ में वही कवि प्रेम, देह और मानवीय संबंधों की जटिलताओं से संवाद करता है— “मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं, उर्वशी! अपने समय का सूर्य हूं मैं।” चिंतक दिनकर और राष्ट्रीय चेतना ‘संस्कृति के चार अध्याय’ ने उन्हें गंभीर चिंतक और गद्यकार के रूप में प्रतिष्ठित किया। 1962 के चीन-भारत युद्ध के बाद ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में राष्ट्रीय चेतना की तीव्रता फिर दिखाई दी— “यह आग मात्र सीमा की नहीं लपट है, मूढ़ो! स्वतंत्रता पर ही यह संकट है।” ### राष्ट्रकवि से जनकवि तक दिनकर की कविता समय के साथ बदलती रही, लेकिन जनता उसके केंद्र में बनी रही। स्वतंत्रता से पहले वह आजादी का आह्वान करती है और बाद में व्यवस्था से सवाल पूछती है। यही व्यापकता उन्हें केवल राष्ट्रकवि नहीं, जनकवि भी बनाती है। स्मृतियों में बसा भागलपुर-दिनकर का रिश्ता भागलपुर की दृष्टि से दिनकर की स्मृति के सूत्र स्पष्ट हैं। लालूचक की वह रात, ‘हिमालय’ का सार्वजनिक पाठ, काशी प्रसाद जायसवाल की प्रशंसा, सुल्तानगंज की ‘गंगा’, खलीफाबाग की ‘चित्रशाला’, हरिकुंज, डॉ. ‘बेचन’ के संस्मरण, रंजन कुमार के कैमरे में सुरक्षित तस्वीर, ‘नई बात’ की साहित्यिक पत्रकारिता और बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में उनकी भूमिका। ये प्रसंग मिलकर बताते हैं कि भागलपुर ने दिनकर को केवल एक रात का आश्रय नहीं दिया था। इस शहर ने उनकी कविता के जन्म, उसकी शुरुआती गूंज और उसके साहित्यिक विस्तार को अपने भीतर सहेजा। आज दिनकर को केवल कुछ लोकप्रिय पंक्तियों तक सीमित करने के बजाय उनके व्यापक रचनात्मक व्यक्तित्व को याद करने की जरूरत है। वह कवि राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हुंकार भरता है, किसान की भूख से व्यथित होता है, सामाजिक विषमता पर सवाल करता है, प्रेम और सौंदर्य को शब्द देता है और सत्ता के सामने जनता की आवाज रखता है। एक शहर, जहां से गूंज दूर तक गई भागलपुर उस आवाज की शुरुआती गूंज का साक्षी है। लालूचक की जागती रात, सुल्तानगंज की ‘गंगा’, खलीफाबाग की ‘चित्रशाला’ और एक साहित्यिक शहर की स्मृतियां आज भी उस यात्रा की कहानी कहती हैं। साहित्य की बड़ी यात्राएं कभी-कभी बहुत छोटे, साधारण और अभाव से भरे क्षणों से शुरू होती हैं। दिनकर की ऐसी ही एक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव था—भागलपुर। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं जनसरोकारों के टिप्पणीकार हैं।)



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