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पंचकुला। किसी जंगल या खुले इलाके में मृत पशु पड़ा हो तो उसे तेजी से साफ कर पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण प्रजातियों में गिद्ध शामिल हैं। यही वजह है कि इन्हें प्रकृति की ‘सफाई प्रणाली’ कहा जाता है। लेकिन, भारत में 1990 के दशक से इनकी आबादी में तेजी से गिरावट देखी गई है। अब गिद्धों को इस संकट से बाहर निकालने के लिए संरक्षण प्रजनन, सुरक्षित भोजन, सुरक्षित पशु चिकित्सा पद्धतियों, तकनीकी क्षमता और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 के अवसर पर हरियाणा के पंचकुला में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने ‘संकट से उबरना: भारत के गिद्धों का संरक्षण’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। कार्यक्रम का संदेश साफ था—गिद्धों को बचाने के लिए केवल उनकी संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि ऐसा सुरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करना होगा, जिसमें वे प्राकृतिक रूप से फल-फूल सकें। यूपीएससी और अन्य सिविल सेवा परीक्षाओं के लिहाज से यह विषय जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य श्रृंखला, प्रजाति संरक्षण और मानव-पशु संबंध जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों को एक साथ जोड़ता है। सबसे पहले समझें—गिद्ध आखिर इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं गिद्ध सामान्य पक्षी भर नहीं हैं। वे मृत जानवरों को तेजी से खाकर प्राकृतिक सफाईकर्मी की भूमिका निभाते हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने इन्हें प्रकृति की सफाई प्रणाली बताते हुए कहा कि मृत पशुओं के शवों को तेजी से खत्म करने के कारण गिद्ध पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में मदद करते हैं और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसे आसान तरीके से समझें मृत पशु → गिद्धों का भोजन → शवों का तेजी से निपटारा → पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण → पारिस्थितिक संतुलन यानी गिद्धों को केवल वन्यजीव संरक्षण के नजरिए से नहीं बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं और पोषक तत्वों के चक्र के संदर्भ में भी समझना महत्वपूर्ण है। 1990 के दशक से क्यों घटने लगी गिद्धों की आबादी भारत में 1990 के दशक से गिद्धों की आबादी में तेजी से गिरावट देखी गई। इसके पीछे दो प्रमुख पहलुओं की ओर ध्यान दिलाया गया है। पहला— उनकी खाद्य श्रृंखला में व्यवधान। दूसरा— उन पशुओं में दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल, जिनके शव बाद में गिद्ध खाते हैं। इसे इस तरह समझ सकते हैं— पशुओं में दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल → वही पशु गिद्धों की खाद्य श्रृंखला का हिस्सा → गिद्धों पर असर → आबादी में गिरावट यही कारण है कि संरक्षण की रणनीति में केवल गिद्धों को सुरक्षित करना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। पशु चिकित्सा पद्धतियों और गिद्धों को मिलने वाले भोजन को भी सुरक्षित बनाना जरूरी है। भारत में कौन-कौन से गिद्ध पाए जाते हैं कार्यशाला में बताया गया कि भारत कई तरह के निवासी और प्रवासी गिद्धों का घर है। जिन गिद्धों का उल्लेख किया गया है, उनमें— श्वेत-पूंछ वाला गिद्ध लंबी चोंच वाला गिद्ध पतली चोंच वाला गिद्ध लाल सिर वाला गिद्ध मिस्र का गिद्ध हिमालयी ग्रिफॉन यूरेशियन ग्रिफॉन सिनेरियस गिद्ध दाढ़ी वाला गिद्ध शामिल हैं। प्रारंभिक परीक्षा के लिए खास बात यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में प्रजातियों के नाम देकर यह पूछा जा सकता है कि इनमें से कौन-सी प्रजाति भारत में पाई जाती है। इसलिए अभ्यर्थियों के लिए इस सूची को याद रखना उपयोगी हो सकता है। गिद्ध बचाने का नया मंत्र—‘गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्र’ केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्र बनाने के प्रयास लगातार जारी रखने पर जोर दिया। इस व्यवस्था में तीन बातें खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं— सुरक्षित पशु चिकित्सा पद्धतियां + सुरक्षित भोजन की उपलब्धता + प्राकृतिक आवास में संरक्षण इसके साथ पशु चिकित्सकों, पशुपालकों, स्थानीय प्रशासन और समुदायों को भी संरक्षण अभियान में सक्रिय भागीदार बनाने तथा सुरक्षित शव प्रबंधन को बढ़ावा देने की बात कही गई। यूपीएससी मुख्य परीक्षा के लिहाज से यहां महत्वपूर्ण अवधारणा है— संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी। ‘संपूर्ण सरकार’ और ‘संपूर्ण समाज’ की भागीदारी पर जोर गिद्ध संरक्षण की रणनीति में ‘संपूर्ण सरकार’ और ‘संपूर्ण समाज’ के समन्वित प्रयासों पर जोर दिया गया है। इसका सीधा मतलब है कि केवल वन विभाग के भरोसे गिद्ध संरक्षण का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। इसमें पशु चिकित्सा व्यवस्था, पशुपालकों, स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिकों, संरक्षण विशेषज्ञों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी है। इसे परीक्षा के लिए इस तरह याद किया जा सकता है— विज्ञान + नीति + सुरक्षित पशु चिकित्सा + संरक्षण प्रजनन + समुदाय = गिद्ध संरक्षण पिंजोर का ‘जटायु’ बना गिद्ध संरक्षण का बड़ा केंद्र भारत में गिद्ध संरक्षण की इस कोशिश का महत्वपूर्ण केंद्र हरियाणा के पिंजोर स्थित जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र यानी जेसीबीसी है।यह हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी यानी बीएनएचएस की संयुक्त पहल से विकसित किया गया है। यह केंद्र खास तौर पर तीन प्रजातियों के संरक्षण प्रजनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है— श्वेत-पूंछ वाला गिद्ध, लंबी चोंच वाला गिद्ध और पतली चोंच वाला गिद्ध। 356 गिद्ध, 35 चूजे और 87 को प्राकृतिक आवास में छोड़ने या पुनर्वास में योगदान अब आते हैं उन आंकड़ों पर, जो यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा और समसामयिक घटनाक्रम के नोट्स के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। 2025-26 के दौरान जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र ने 356 गिद्धों को आश्रय दिया। इसी अवधि में केंद्र ने सफलतापूर्वक 35 चूजों का प्रजनन कराया। इसके अलावा 87 गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने या उनके पुनर्वास में योगदान दिया गया। वहीं, 90 पक्षियों को दूसरे संरक्षण-प्रजनन संस्थानों में स्थानांतरित किया गया। तकनीकी क्षमता बढ़ाने के लिए 22 संस्थानों के 1,222 प्रतिभागियों को प्रशिक्षण भी दिया गया। त्वरित पुनरावृत्ति: जटायु केंद्र के महत्वपूर्ण आंकड़े महत्वपूर्ण तथ्य आंकड़ा अवधि 2025-26 आश्रय दिए गए गिद्ध 356 सफलतापूर्वक प्रजनित चूजे 35 प्राकृतिक आवास में छोड़ने या पुनर्वास में योगदान 87 दूसरे संरक्षण-प्रजनन संस्थानों में भेजे गए पक्षी 90 प्रशिक्षण से जुड़े संस्थान 22 प्रशिक्षित प्रतिभागी 1,222 याद रखने का आसान सूत्र 356 → 35 → 87 → 90 → 22 → 1,222 यानी आश्रय → चूजे → प्राकृतिक आवास/पुनर्वास → स्थानांतरण → संस्थान → प्रतिभागी। जटायु केंद्र में सिर्फ प्रजनन नहीं, वैज्ञानिक प्रबंधन भी जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र की भूमिका केवल गिद्धों को रखकर उनकी संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यहां वैज्ञानिक पालन-पोषण, कृत्रिम ऊष्मायन, पशु चिकित्सा देखभाल, प्रजनन और आनुवंशिक प्रबंधन का काम भी किया जाता है। हरियाणा के पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव मंत्री राव नरबीर सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि संरक्षण प्रजनन की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कितने जीव पैदा हुए। असली सफलता स्वस्थ और आनुवंशिक रूप से प्रबंधित आबादी तैयार करने, वैज्ञानिक ज्ञान पैदा करने, तकनीकी क्षमता बढ़ाने और प्राकृतिक वातावरण में प्रजाति के संरक्षण में योगदान देने में है। यूपीएससी मुख्य परीक्षा में इस उदाहरण का इस्तेमाल प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण और प्रजाति पुनर्बहाली जैसे विषयों को समझाने के लिए किया जा सकता है। एक प्रजाति नहीं, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का मॉडल कार्यशाला में पर्यावरण संरक्षण के समग्र पारिस्थितिकी तंत्र आधारित मॉडल पर भी जोर दिया गया। इसका मतलब है कि संरक्षण को किसी एक प्रजाति तक सीमित रखने के बजाय पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखकर कदम उठाए जाएं। उदाहरण के तौर पर विशालकाय बिल्लियों, सुस्त भालू, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, डॉल्फिन, घड़ियाल, जंगली जल भैंस और गिद्धों से जुड़े संरक्षण प्रयासों का उल्लेख किया गया है। यूपीएससी के लिए यहां महत्वपूर्ण अवधारणा है— पारिस्थितिकी तंत्र आधारित संरक्षण दृष्टिकोण। ‘जटायु की कहानी’ पुस्तक का भी विमोचन कार्यशाला के उद्घाटन सत्र के दौरान ‘जटायु की कहानी: भारत के गिद्धों का संरक्षण’ नाम की एक विशेष पुस्तक का विमोचन किया गया। इस पुस्तक में भारत में गिद्धों की घटती आबादी से लेकर पिंजोर के जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र की स्थापना और सफल संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम तक की यात्रा को शामिल किया गया है। इसके अलावा गिद्ध संरक्षण पर आयोजित ऑनलाइन चित्रकला प्रतियोगिता और डिजिटल फोटोग्राफी प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार भी दिए गए। विज्ञान, नीति और समाज—तीनों को जोड़ने की कोशिश अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 की राष्ट्रीय कार्यशाला का मूल संदेश यह रहा कि गिद्धों की वापसी केवल प्रजनन केंद्रों के जरिए संभव नहीं होगी। इसके लिए विज्ञान, नीति, संरक्षण प्रजनन, सुरक्षित भूदृश्य और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। यानी गिद्ध संरक्षण का मॉडल कुछ इस तरह बनता है— संकट की पहचान → सुरक्षित पशु चिकित्सा → सुरक्षित भोजन → संरक्षण प्रजनन → वैज्ञानिक एवं आनुवंशिक प्रबंधन → सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र → पुनर्वास → समुदाय की भागीदारी यूपीएससी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर यह विषय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3 के पर्यावरण और जैव विविधता वाले हिस्से के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा प्रारंभिक परीक्षा में गिद्धों की प्रजातियों, संरक्षण प्रजनन और संबंधित संस्थाओं पर सवाल पूछा जा सकता है। मुख्य परीक्षा में इसे जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं, वैज्ञानिक वन्यजीव प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी से जोड़ा जा सकता है। प्रारंभिक परीक्षा के लिए एक नजर में याद रखें स्थान: पंचकुला, हरियाणा अवसर: अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस 2026 राष्ट्रीय कार्यशाला: ‘संकट से उबरना—भारत के गिद्धों का संरक्षण’ महत्वपूर्ण केंद्र: जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र, पिंजोर संयुक्त पहल: हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी प्रमुख भूमिका: संरक्षण प्रजनन और तकनीकी क्षमता निर्माण गिद्धों के लिए प्रमुख चुनौती: खाद्य श्रृंखला में व्यवधान और पशुओं में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवाएं पारिस्थितिक भूमिका: मृत पशुओं की सफाई, पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण और पारिस्थितिक संतुलन मुख्य परीक्षा में सवाल आया तो कैसे लिखें संभावित प्रश्न “गिद्धों की घटती आबादी केवल वन्यजीव संरक्षण की समस्या नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौती है। चर्चा कीजिए।” उत्तर की शुरुआत गिद्धों की ‘प्रकृति के सफाईकर्मी’ वाली भूमिका से की जा सकती है। इसके बाद 1990 के दशक से आबादी में गिरावट, खाद्य श्रृंखला में व्यवधान और पशुओं में दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल का उल्लेख किया जा सकता है। समाधान में गिद्ध-सुरक्षित क्षेत्र, सुरक्षित पशु चिकित्सा, सुरक्षित भोजन, वैज्ञानिक संरक्षण प्रजनन, आनुवंशिक प्रबंधन, तकनीकी क्षमता और सामुदायिक भागीदारी को शामिल किया जा सकता है। अंत में पिंजोर के जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र को उदाहरण के रूप में पेश करके उत्तर को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। परीक्षा के लिए एक लाइन में पूरा सार गिद्ध केवल मृत पशुओं को खाने वाले पक्षी नहीं, बल्कि प्रकृति की सफाई व्यवस्था और पोषक चक्र की अहम कड़ी हैं; इसलिए भारत की संरक्षण रणनीति अब केवल उनकी संख्या बढ़ाने तक सीमित न रहकर सुरक्षित भोजन, सुरक्षित पशु चिकित्सा, वैज्ञानिक प्रजनन, आनुवंशिक प्रबंधन, सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्र और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़ रही है।



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