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पटना। बिहार सरकार ने सोन, किउल, फल्गु, मोहर और चानन नदियों के पुनर्भरण अध्ययन को मंजूरी देते हुए इन नदियों में बरसात के बाद बालू के दोबारा जमा होने की वैज्ञानिक जांच कराने का फैसला किया है, ताकि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखते हुए भविष्य में बालू निकासी की नीति को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बनाया जा सके। मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग के सूत्रों ने बुधवार को बताया कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में यहां हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया है। पांच नदियों पर होगा वैज्ञानिक अध्ययन कैबिनेट ने वर्ष 2026 में सोन, किउल, फल्गु, मोहर और चानन नदी के पुनर्भरण अध्ययन के लिए 2 करोड़ 32 लाख 69 हजार 600 रुपये की राशि स्वीकृत की है। यह अध्ययन सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड यानी सीएमपीडीआई से कराया जाएगा। बालू निकासी पर बनेगा ठोस आधार सरकार का मानना है कि अध्ययन से यह पता चल सकेगा कि बरसात के बाद इन नदियों में कितना बालू फिर से जमा होता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार की जाएगी और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए बालू निकासी की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी। पर्यावरण सुरक्षा पर खास जोर बिना वैज्ञानिक अध्ययन के बालू खनन से नदियों की धारा, जलस्तर और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। इसलिए सरकार अब नदियों में बालू की उपलब्धता और पुनर्भरण की स्थिति को समझकर ही आगे की योजना बनाना चाहती है। खनन और विकास दोनों को मिलेगी दिशा इस फैसले से एक ओर अवैध या अनियंत्रित खनन पर नियंत्रण में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर निर्माण कार्यों के लिए बालू की उपलब्धता सुनिश्चित करने में भी आसानी होगी। इससे सड़क, भवन और अन्य आधारभूत संरचना परियोजनाओं को भी गति मिल सकती है। क्यों अहम है यह फैसला सोन, किउल, फल्गु, मोरहर और चानन जैसी नदियां बिहार के कई इलाकों में खनन, निर्माण और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं। पुनर्भरण अध्ययन से सरकार को यह तय करने में मदद मिलेगी कि कहां और कितनी मात्रा में बालू निकासी पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित होगी। सरकार को मिलेगा राजस्व, लोगों को मिलेगा संतुलित लाभ वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर बालू निकासी होने से राज्य सरकार को समय पर राजस्व मिल सकेगा और आम लोगों को निर्माण सामग्री की उपलब्धता में भी राहत मिल सकती है। साथ ही नदियों के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।