Full Story
पटना। सोन नदी के पानी का हिसाब अब इंजीनियरों की फाइलों और सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रह गया है। यह बिहार के खेतों, किसानों और आने वाली पीढ़ियों के पानी का सवाल है। सांसद सुधाकर सिंह ने केंद्रीय जलशक्ति मंत्री को लिखे पत्र में इसी सवाल को सामने रखा है कि 1973 में सोन बेसिन की जल उपलब्धता 14.25 मिलियन एकड़-फुट (एमएएफ) आंकी गई थी तो अब यह बढ़कर 19.6335 एमएएफ कैसे हो गई? करीब 5.38 एमएएफ की यह बढ़ोतरी किस आधार पर हुई और इसमें से वास्तव में कितना पानी सिंचाई के लिए उपयोग योग्य है? पानी बढ़ा तो खेतों की प्यास क्यों नहीं बुझी सवाल जितना सीधा है, उसका जवाब उतना ही जरूरी। यदि सोन बेसिन में सचमुच इतना अतिरिक्त पानी उपलब्ध हो गया है तो बिहार के खेत अब भी पानी के लिए क्यों तरस रहे हैं? नहरें अपनी पूरी क्षमता से क्यों नहीं चल रहीं? सिंचाई परियोजनाएं पानी की प्रतीक्षा क्यों कर रही हैं? और यदि यह पानी वास्तव में उपलब्ध और उपयोग योग्य नहीं है तो उसे ‘अतिरिक्त जल’ मानकर भविष्य की हिस्सेदारी के सवाल में क्यों लाया जा रहा है? 31 अगस्त 2026 को बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी जल बंटवारे का समझौता हुआ। नई दिल्ली में हुए इस समझौते के तहत अविभाजित बिहार के हिस्से में रहे 7.75 एमएएफ पानी में से बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ देने पर सहमति बनी। इससे झारखंड गठन के बाद करीब ढाई दशक से चले आ रहे विवाद को समाप्त करने का रास्ता खुला है। समझौते के साथ शुरू हुए असली सवाल यह समझौता जरूरी था। 2000 में झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद पुराने बिहार के हिस्से के पानी का नए राज्य के साथ बंटवारा कैसे हो, यह सवाल लगातार बना रहा। अब दोनों राज्यों ने अपने हिस्से तय कर लिए हैं। लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर होते ही असली सवाल खत्म नहीं होता, शुरू होता है क्योंकि नदी में पानी होना और किसान के खेत में पानी पहुंचना एक बात नहीं है। नदी में बहने वाला कुल पानी, बैराज तक पहुंचने वाला पानी, बैराज से छोड़ा गया पानी, नहर में जाने वाला पानी और अंततः खेत तक पहुंचने वाला पानी—इन सबके बीच अंतर है। सरकारी कागज में दर्ज जल उपलब्धता और किसान के खेत में उपलब्ध पानी के बीच यही दूरी हमारे जल प्रबंधन की सबसे बड़ी विडंबना है। 5.38 एमएएफ अतिरिक्त पानी आया कहां से सुधाकर सिंह के पत्र में बिहार जल संसाधन विभाग के 20 अगस्त 2026 के एक पत्र का हवाला देते हुए कहा गया है कि 1973 में 14.25 एमएएफ की उपलब्धता के मुकाबले अब 19.6335 एमएएफ पानी उपलब्ध बताया जा रहा है। यदि यह आंकड़ा सही है तो इसकी वैज्ञानिक पड़ताल जरूरी है। पानी बढ़ा कैसे? वर्षा बढ़ी? जलग्रहण क्षेत्र बदला? नदी के प्रवाह में परिवर्तन आया? कोई नया स्रोत गणना में जुड़ा? या ऐसे बहाव को भी उपलब्ध जल में जोड़ दिया गया जिसे सिंचाई के लिए नियंत्रित करना संभव नहीं? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि पानी का हर आंकड़ा खेत का पानी नहीं होता। बाढ़ के बहाव को सिंचाई का पानी मानने का सवाल इंद्रपुरी बैराज पर एससीएडीए जैसी प्रणालियों से आने वाले प्रवाह के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन नदी में किसी समय आया पूरा पानी सिंचाई योग्य पानी नहीं बन जाता। तेज बाढ़ के दौरान आया बहाव, अनियंत्रित अतिरिक्त प्रवाह या ऐसी मात्रा जिसे बैराज और नहर प्रणाली संभाल न सके, उसका हिसाब अलग होना चाहिए। सुधाकर सिंह के पत्र में ‘अनमैनेज्ड सरप्लस डिस्चार्ज’ को इसी दृष्टि से अलग करने की मांग की गई है। यह तकनीकी शब्दावली सुनने में भले इंजीनियरिंग की लगे, लेकिन इसका असर किसान की जमीन पर पड़ता है। अगर ऐसा पानी भी नियमित सिंचाई योग्य उपलब्धता में जोड़ दिया गया जो वास्तव में खेत तक पहुंच ही नहीं सकता, तो कागज पर पानी बढ़ेगा और खेत की प्यास वहीं रहेगी इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि पानी का आंकड़ा किसने दिया। सवाल यह है कि उस आंकड़े में पानी की परिभाषा क्या है। 1973 से 2026 तक बदली परिस्थितियां 1973 में सोन जल बंटवारे की व्यवस्था बनी थी। उस समय मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच कुल 14.25 एमएएफ पानी का प्रावधान था और अविभाजित बिहार का हिस्सा 7.75 एमएएफ था। आज उसी हिस्से का बिहार और झारखंड के बीच पुनर्विन्यास हुआ है। लेकिन 1973 की परिस्थितियां और 2026 की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। आबादी बढ़ी है। सिंचाई की जरूरत बढ़ी है। शहरों और उद्योगों की पानी की मांग बढ़ी है। ऊर्जा क्षेत्र की नई जरूरतें सामने हैं। जलवायु परिवर्तन ने वर्षा का स्वभाव बदला है। कम समय में बहुत अधिक बारिश और लंबे समय तक सूखा—दोनों स्थितियां अब जल प्रबंधन को चुनौती दे रही हैं। ऐसे में पुराने आंकड़े को बिना पुनर्मूल्यांकन के स्थायी सत्य मानना ठीक नहीं, लेकिन नए आंकड़े को बिना स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच के अंतिम सत्य मान लेना भी उतना ही खतरनाक है। आठ जिलों की खेती से जुड़ी सोन की धारा सोन का पानी कई राज्यों और कई समाजों से जुड़ा है। बिहार के लिए यह रोहतास, कैमूर, भोजपुर, बक्सर, औरंगाबाद, अरवल, गया और आसपास के इलाकों की कृषि का सवाल है। सोन नहर प्रणाली ने इस इलाके की खेती को दशकों तक सहारा दिया है। लेकिन नहर तक पानी पहुंचना और नहर की टेल तक पानी पहुंचना दो अलग बातें हैं। किसान को सरकारी घोषणा नहीं, खेत की मेड़ पर पानी चाहिए इसलिए नए समझौते की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ मिल गया। असली सवाल यह है कि इनमें से कितना पानी वास्तव में इस्तेमाल हुआ और कितना खेत तक पहुंचा। सोन के पानी की स्वतंत्र लेखा-परीक्षा जरूरी यहीं एक स्वतंत्र सोन जल लेखा-परीक्षा की जरूरत है। सोन बेसिन में बारिश कितनी हुई, जलग्रहण क्षेत्र से कितना पानी आया, जलाशयों में कितना जमा हुआ, इंद्रपुरी बैराज में कितना प्रवाह आया, कितना छोड़ा गया, नहरों में कितना गया और किसानों तक कितना पहुंचा—इन सभी आंकड़ों को एक साथ रखकर देखा जाना चाहिए। पानी का हिसाब केवल नदी के मुहाने पर नहीं, खेत की मेड़ पर भी होना चाहिए। यह आंकड़ा सार्वजनिक होना चाहिए। वैज्ञानिक संस्थानों, जल विशेषज्ञों, किसान संगठनों और प्रभावित इलाकों के प्रतिनिधियों को उसे देखने और जांचने का अधिकार होना चाहिए। पानी के बंटवारे का भरोसा तभी बनेगा जब पानी के आंकड़े भी सार्वजनिक भरोसे में होंगे। टकराव नहीं, साझा विज्ञान से निकले समाधान झारखंड के साथ न्याय भी इसी पारदर्शिता से संभव है। झारखंड को अपने खेतों, गांवों और विकास के लिए पानी चाहिए। बिहार को भी चाहिए। दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना आसान राजनीति है, लेकिन सही जल नीति नहीं। एक ही नदी के पानी पर दो राज्यों की जरूरतें हैं तो समाधान भी साझा वैज्ञानिक समझ पर होना चाहिए। इसके साथ नदी का अपना हिस्सा भी बचाना होगा। नदी में बचा पानी बेकार पानी नहीं है। वह मछलियों, जलीय जीवों, भूजल पुनर्भरण और नदी की प्राकृतिक धारा के लिए जरूरी है। यदि उपलब्ध पानी का पूरा हिसाब केवल सिंचाई, उद्योग और ऊर्जा की जरूरत से होगा तो नदी के पर्यावरणीय प्रवाह का हिसाब कौन रखेगा? नई परियोजनाओं की मांग भी जांच के दायरे में आए भविष्य की नई जल मांगों पर भी यही पारदर्शिता जरूरी है। सुधाकर सिंह के पत्र में उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित कुछ पंप्ड-स्टोरेज परियोजनाओं की जल जरूरतों का उल्लेख किया गया है। इन दावों की स्वतंत्र तकनीकी जांच होनी चाहिए। किसी भी नई परियोजना को पानी देने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका जल स्रोत क्या है, उसकी मांग पहले से तय हिस्सेदारी को कैसे प्रभावित करेगी और उसका असर कृषि तथा पर्यावरण पर कितना पड़ेगा। आखिर पानी कोई ऐसा संसाधन नहीं जिसे एक बार कागज पर बांट देने के बाद हमेशा के लिए खत्म मान लिया जाए। बारिश बदलती है, नदी बदलती है, जरूरतें बदलती हैं। इसलिए जल समझौते में केवल हिस्सेदारी नहीं, पुनर्मूल्यांकन, पारदर्शी निगरानी और कम प्रवाह की स्थिति में स्पष्ट नियम भी होने चाहिए। और यहीं से सत्ता की जवाबदेही शुरू होती है। घोषणा नहीं, खेत में खड़ी फसल बने प्रमाण सरकारें समझौता कर सकती हैं। मंत्री घोषणा कर सकते हैं। अधिकारी आंकड़े जारी कर सकते हैं। लेकिन किसान के लिए इन सबका अर्थ तभी है जब नहर में पानी आए और खेत में फसल खड़ी हो इसलिए सरकारों को अब केवल यह नहीं बताना चाहिए कि बिहार को कितना पानी मिला और झारखंड को कितना। उन्हें यह भी बताना होगा कि सोन में उपलब्ध पानी की गणना किस वैज्ञानिक आधार पर हुई; 14.25 एमएएफ से 19.6335 एमएएफ तक पहुंचने का आधार क्या है; उसमें कितना पानी वास्तव में सिंचाई योग्य है; कितना पानी अनियंत्रित बहाव में चला जाता है; बिहार के हिस्से के 5.75 एमएएफ में से कितना पानी खेतों तक पहुंचता है और कितना रास्ते में छूट जाता है। तीन सवाल जो व्यवस्था से जवाब मांगते हैं अगर पानी उपलब्ध है तो खेत प्यासे क्यों हैं? अगर पानी उपलब्ध नहीं है तो उपलब्धता बढ़ने के आंकड़े किस आधार पर हैं? और अगर सिंचाई परियोजनाएं पानी की प्रतीक्षा कर रही हैं तो वर्षों से इसकी जिम्मेदारी किसकी है? यह सवाल केवल अधिकारियों से नहीं, सरकार से है क्योंकि सत्ता का काम सिर्फ समझौते करना नहीं, उसके परिणाम की जिम्मेदारी लेना भी है। नदी को आंकड़ों में मापना आसान है, किसान की प्यास को मापना कठिन। लेकिन लोकतंत्र में कठिन सवालों से बचकर आसान आंकड़ों के पीछे छिप जाना जवाबदेही नहीं है। नदी साझी धरोहर, हिसाब भी जनता का अधिकार नदी किसी सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। वह किसानों, गांवों, शहरों, जंगलों, जीव-जंतुओं और आने वाली पीढ़ियों की साझा प्राकृतिक धरोहर है। इसलिए सरकारों को पानी का हिसाब जनता के सामने रखना होगा—कितना आया, कितना बांटा, कितना इस्तेमाल हुआ, कितना खेत तक पहुंचा, कितना बह गया और जहां पानी नहीं पहुंचा, वहां जिम्मेदार कौन है। समझौते का असली फैसला खेत की मेड़ पर समझौते पर हस्ताक्षर करना सत्ता की उपलब्धि हो सकती है, लेकिन किसान के खेत तक पानी पहुंचाना उसकी जवाबदेही है। सोन के पानी का असली फैसला दिल्ली या पटना की मेज पर नहीं, खेत की मेड़ पर होगा। वहां अगर किसान अब भी बारिश की ओर देख रहा है तो समझौते की स्याही चाहे जितनी गहरी हो, उसका अर्थ अधूरा है। सोन में पानी बढ़ा तो बिहार के खेत अब भी प्यासे क्यों हैं? इस सवाल का जवाब अब सरकारों को देना होगा—आंकड़ों से नहीं, पानी से; दावों से नहीं, खेतों से। क्योंकि सहकारी संघवाद की असली परीक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करते समय नहीं, पानी खेत की मेड़ तक पहुंचते समय होती है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



Comments
0