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(115वीं जयंती पर विशेष) नई दिल्ली। "ईमान बेचता फिरता तो मैं भी महलों में रह लेता…" यह केवल एक कविता की पंक्ति नहीं बल्कि राष्ट्रकवि गोपाल सिंह 'नेपाली' के संपूर्ण जीवन-दर्शन का उद्घोष है। उन्होंने साहित्य को कभी यश, वैभव या सत्ता तक पहुंचने का साधन नहीं बनाया बल्कि उसे राष्ट्रजागरण, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों की स्थापना का माध्यम माना। यही कारण है कि छह दशक से अधिक समय बाद भी उनकी कविताएं राष्ट्रीय स्वाभिमान, नैतिक साहस और स्वतंत्र चिंतन की प्रेरणा देती हैं। 115वीं जयंती पर राष्ट्रीय चेतना को याद करने का अवसर राष्ट्रकवि गोपाल सिंह 'नेपाली' की 115वीं जयंती केवल एक साहित्यकार का स्मरण नहीं बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना को पुनः याद करने का अवसर है, जिसकी आवश्यकता आज भी उतनी ही है जितनी स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में थी। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और तात्कालिक लोकप्रियता के इस समय में नेपाली का साहित्य याद दिलाता है कि साहित्य का सर्वोच्च दायित्व समाज को नैतिक दिशा देना, मनुष्य के भीतर आत्मविश्वास जगाना और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करना है। स्वतंत्रता आंदोलन की उथल-पुथल के बीच शुरू हुई साहित्य यात्रा 11 अगस्त 1911 को जन्मे गोपाल सिंह 'नेपाली' ने ऐसे समय में साहित्य-सृजन आरंभ किया, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन की तीव्र उथल-पुथल से गुजर रहा था। गीत, राष्ट्रकाव्य, प्रकृति, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं से समृद्ध उनकी रचनात्मक यात्रा ने उन्हें हिंदी के सबसे लोकप्रिय मंचीय कवियों में प्रतिष्ठित किया। उनकी भाषा सहज, मधुर और जनसुलभ थी, इसलिए उनकी कविताएं साहित्यिक गोष्ठियों से निकलकर गांव-गांव और जन-जन तक पहुंचीं। कवि ही नहीं, पत्रकार-संपादक और प्रतिष्ठित गीतकार भी नेपाली केवल कवि नहीं थे; वे सफल पत्रकार, संपादक और हिंदी फिल्मों के प्रतिष्ठित गीतकार भी थे। उन्होंने लोकप्रियता और साहित्यिक गरिमा के बीच ऐसा संतुलन स्थापित किया, जो विरले ही देखने को मिलता है। उनके फिल्मी गीतों में भी भारतीय संस्कृति, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं की गहरी छाप दिखाई देती है। उन्होंने सिद्ध किया कि साहित्यिक गुणवत्ता बनाए रखते हुए भी व्यापक जनस्वीकृति प्राप्त की जा सकती है। उनके काव्य में धड़कता रहा जीवंत भारत उनके साहित्य में भारत केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सभ्यता के रूप में उपस्थित है। हिमालय, गंगा, खेत-खलिहान, किसान, गांव और साधारण भारतीय उनके काव्य के स्थायी प्रतीक हैं। वे भारतीयता को किसी राजनीतिक नारे के रूप में नहीं बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति का सौंदर्य, सांस्कृतिक गौरव, मानवीय करुणा और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ‘मेरा धन है स्वाधीन कलम’- सत्ता के आगे नहीं झुकी लेखनी गोपाल सिंह 'नेपाली' के व्यक्तित्व का सबसे प्रेरक पक्ष उनका अदम्य स्वाभिमान था। उन्होंने अपनी लेखनी को कभी सत्ता के सामने नहीं झुकाया। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—"ईमान बेचता फिरता तो मैं भी महलों में रह लेता" आज भी साहित्यकारों, पत्रकारों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए नैतिक साहस का घोष है। वहीं, उनका उद्घोष—"मेरा धन है स्वाधीन कलम"—लेखकीय स्वतंत्रता और वैचारिक स्वाभिमान का कालजयी संदेश है। 1962 में उनकी कविता बनी राष्ट्रीय जागरण का घोष राष्ट्रवादी चेतना उनकी काव्य-प्रतिभा का सबसे उज्ज्वल पक्ष रही। उन्होंने देशभक्ति को केवल भावनात्मक उद्घोष तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसे राष्ट्रीय उत्तरदायित्व और जनजागरण का माध्यम बनाया। विशेष रूप से 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय उनकी कविताएं पूरे देश में राष्ट्रीय मनोबल की आवाज बनकर गूंजीं। उनकी ऐतिहासिक कविता "चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा" उस समय राष्ट्रीय जागरण का घोष बन गई। हिमालय उनके यहां केवल पर्वत नहीं बल्कि भारत की अस्मिता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है। इसी प्रकार "ओ राही दिल्ली जाना" के माध्यम से उन्होंने सत्ता का ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमाओं की ओर आकृष्ट किया। उनका राष्ट्रवाद भावुकता का नहीं बल्कि सजग, उत्तरदायी और लोकतांत्रिक चेतना का राष्ट्रवाद था। भागलपुर से रहा गहरा रिश्ता, यहीं थमी अंतिम यात्रा गोपाल सिंह 'नेपाली' का जीवन जितना उनकी कविताओं से जुड़ा था, उतना ही जनमानस से भी। वे देशभर में घूम-घूमकर अपनी ओजस्वी कविताओं का पाठ करते रहे और हजारों श्रोताओं के भीतर राष्ट्रप्रेम तथा आत्मविश्वास का संचार किया। अंग प्रदेश, विशेषकर बिहार के भागलपुर, से उनका गहरा आत्मीय संबंध रहा। वे अनेक साहित्यिक आयोजनों और कवि सम्मेलनों में यहां आते रहे और अपनी प्रभावशाली वाणी से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते रहे। संयोग से यही शहर उनकी अंतिम यात्रा का भी साक्षी बना, जिसने उन्हें केवल अतिथि कवि नहीं बल्कि अपने प्रिय राष्ट्रकवि के रूप में विदा किया। राष्ट्र संकट में था तो कविता को बनाया जनचेतना का हथियार 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद गोपाल सिंह 'नेपाली' ने स्वयं को राष्ट्रीय जागरण के अभियान में पूरी तरह समर्पित कर दिया। वे देशभर में घूम-घूमकर अपनी राष्ट्रवादी कविताओं का पाठ करते रहे। उनके लिए कविता केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि जनचेतना जगाने का माध्यम थी। वे मानते थे कि जब राष्ट्र संकट में हो तब कवि का मौन रहना उसके धर्म के विरुद्ध है। यही कारण था कि उनकी लेखनी और वाणी दोनों ने उस कठिन समय में निराशा को संकल्प और आत्मविश्वास में बदलने का कार्य किया। राष्ट्रजागरण की यात्रा के बीच 17 अप्रैल 1963 को निधन इसी राष्ट्रयात्रा के क्रम में 17 अप्रैल 1963 को पश्चिम बंगाल के मालदा मंडल के एकवारी स्टेशन से भागलपुर आने के दौरान रेलयात्रा में उनका निधन हो गया। आधिकारिक रूप से उनकी मृत्यु का कारण हृदयाघात माना गया। समय-समय पर परिवार और कुछ अन्य लोगों ने अलग-अलग आशंकाएं व्यक्त कीं लेकिन उनकी कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। इतिहास के लिए प्रमाणित तथ्य यही है कि राष्ट्रकवि की जीवन-यात्रा राष्ट्रजागरण के अभियान के बीच ही समाप्त हुई। पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन को उमड़ पड़ा भागलपुर भागलपुर जंक्शन पर उनके निधन का समाचार पहुंचते ही पूरे शहर में शोक की लहर दौड़ गई। समाजसेवी एवं स्वतंत्रता सेनानी शुभकरण चुड़ीवाला की पहल पर प्रशासन ने तत्काल आवश्यक व्यवस्थाएं कीं और राष्ट्रकवि के पार्थिव शरीर को मारवाड़ी पाठशाला में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। देखते ही देखते हजारों नागरिक, साहित्यकार, शिक्षक, विद्यार्थी और उनके असंख्य प्रशंसक वहां उमड़ पड़े। वातावरण शोकाकुल था लेकिन लोगों की स्मृतियों में उनकी ओजस्वी कविताएं गूंज रही थीं। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि गोपाल सिंह 'नेपाली' केवल मंचों के लोकप्रिय कवि नहीं बल्कि जनता के हृदय में बसने वाले राष्ट्रकवि थे। राजकीय सम्मान से अंतिम विदाई, दो दिन का राजकीय शोक 18 अप्रैल 1963 को भागलपुर के बरारी श्मशान घाट पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। तत्कालीन बिहार सरकार ने उनके निधन पर दो दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की। लोकसभा, राज्यसभा, बिहार विधानसभा और बिहार विधान परिषद में भी शोक प्रस्ताव पारित किए गए। यह सम्मान इस तथ्य का प्रमाण था कि गोपाल सिंह 'नेपाली' केवल हिंदी साहित्य के प्रतिनिधि कवि नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना के सशक्त स्वर थे। छह दशक बाद भी उतने ही प्रासंगिक नेपाली समय बदलता है, साहित्य की अभिव्यक्ति भी नए रूप ग्रहण करती है लेकिन कुछ रचनाकार ऐसे होते हैं जिनकी प्रासंगिकता समय की सीमाओं से परे होती है। गोपाल सिंह 'नेपाली' ऐसे ही साहित्यकार हैं। उनकी कविताएं आज भी राष्ट्रीय चरित्र, सांस्कृतिक अस्मिता, नैतिकता और स्वतंत्र चिंतन के प्रश्नों पर उतनी ही सार्थक प्रतीत होती हैं। जब सार्वजनिक जीवन में मूल्यों का संकट, सामाजिक ध्रुवीकरण और तात्कालिक लोकप्रियता का दबाव बढ़ रहा हो तब उनका साहित्य ईमानदारी, स्वाभिमान और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश देता है। आज की पीढ़ी के लिए निर्भीक लेखनी का संदेश आज की पीढ़ी गोपाल सिंह 'नेपाली' को केवल राष्ट्रगीतों के रचनाकार के रूप में नहीं बल्कि स्वतंत्र विचार और निर्भीक लेखनी के प्रतीक के रूप में भी देख सकती है। उनकी अमर पंक्तियां "ईमान बेचता फिरता तो मैं भी महलों में रह लेता" आज भी साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए नैतिक आचरण का मानदंड हैं। वहीं, "मेरा धन है स्वाधीन कलम" लेखक की वैचारिक स्वतंत्रता का ऐसा उद्घोष है, जो हर दौर में प्रासंगिक रहेगा। 11 से 31 अगस्त तक ‘नेपाली पखबीस–2026’ का आह्वान इसी उद्देश्य से साहित्यिक संस्था 'शब्दयात्रा' तथा 'गोपाल सिंह नेपाली आंदोलन' के संयोजक पारस कुंज ने 11 से 31 अगस्त 2026 तक 'नेपाली पखबीस–2026' मनाने का आह्वान किया है। इस अभियान का उद्देश्य राष्ट्रकवि की साहित्यिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। देशभर के विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों, आकाशवाणी, दूरदर्शन तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से आग्रह किया गया है कि वे संगोष्ठी, व्याख्यान, काव्य-पाठ और राष्ट्रगीतों के सामूहिक गायन जैसे आयोजन कर राष्ट्रकवि को सच्ची श्रद्धांजलि दें। राष्ट्रीय सम्मान से स्मारक तक, उठ रहीं कई मांगें 'गोपाल सिंह नेपाली आंदोलन' लंबे समय से राष्ट्रकवि के सम्मान में कई महत्वपूर्ण मांगें भी उठाता रहा है। इनमें उन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान प्रदान करने, भागलपुर–बेतिया 'गोपाल सिंह नेपाली एक्सप्रेस' का संचालन, बेतिया स्थित उनके ऐतिहासिक निवास 'कालीबाग दरबार' और भागलपुर के 'गोपाल सिंह नेपाली सभागार' को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने, प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर उनकी प्रतिमाएं स्थापित करने तथा उनकी रचनाओं को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में समुचित स्थान देने जैसी मांगें शामिल हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल स्मारक बनाना नहीं बल्कि उनकी वैचारिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है। भागलपुर में आज भी जीवंत है राष्ट्रकवि की विरासत भागलपुर के लिए यह अवसर विशेष महत्व रखता है। यह वही शहर है जहां राष्ट्रकवि ने अपनी ओजस्वी कविताओं से असंख्य लोगों में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया और जहां उनकी जीवन-यात्रा का अंतिम अध्याय भी लिखा गया। इसलिए, भागलपुर केवल उनकी स्मृतियों का नगर नहीं बल्कि उनकी साहित्यिक विरासत का जीवंत केंद्र भी है। शब्दों की लोकप्रियता नहीं, विचारों की ईमानदारी बनी असली पहचान राष्ट्रकवि गोपाल सिंह 'नेपाली' ने अपने जीवन और साहित्य से यह सिद्ध किया कि कवि की सबसे बड़ी पहचान उसके शब्दों की लोकप्रियता नहीं बल्कि उसके विचारों की ईमानदारी होती है। उन्होंने कविता को जनजागरण का माध्यम बनाया, राष्ट्रप्रेम को नैतिकता से जोड़ा और साहित्य को समाज के प्रति उत्तरदायित्व का स्वर दिया। उनकी 115वीं जयंती हमें केवल उन्हें स्मरण करने का अवसर नहीं देती बल्कि यह भी प्रेरित करती है कि सत्य, स्वाभिमान, स्वतंत्र चिंतन और राष्ट्रहित के जिन मूल्यों के लिए उन्होंने जीवन भर लेखनी चलाई उन्हें अपने सार्वजनिक और बौद्धिक जीवन का आधार बनाया जाए। यही राष्ट्रकवि गोपाल सिंह 'नेपाली' की सबसे बड़ी और अमर साहित्यिक विरासत है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)