Full Story

(जन्मदिन 10 सितंबर पर विशेष) नई दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल उन नेताओं और सेनानियों की कहानी नहीं है, जिन्होंने भारत की धरती पर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। इसका एक महत्वपूर्ण अध्याय उन राष्ट्रवादियों से भी जुड़ा है, जिन्होंने विदेशों में रहकर भारतीय स्वतंत्रता के पक्ष में राजनीतिक समर्थन जुटाया, प्रवासी भारतीयों को संगठित किया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय वातावरण बनाने का प्रयास किया। आनंद मोहन सहाय इसी धारा के उल्लेखनीय व्यक्तित्व थे। जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में लंबे समय तक सक्रिय रहकर उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादियों और प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच संपर्क विकसित किया। आगे चलकर वे आजाद हिंद आंदोलन और अस्थायी आजाद हिंद सरकार से जुड़े महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं राजनीतिक कार्यों में दिखाई देते हैं। उनका योगदान विशेष रूप से संगठन, प्रचार, राजनीतिक संपर्क और कूटनीतिक संवाद के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माना जाता है। किशोरावस्था में ही गूंजा ‘वंदे मातरम्’ 10 सितंबर 1898 को भागलपुर जिले के पुरानी सराय, नाथनगर में जन्मे आनंद मोहन सहाय की राष्ट्रवादी चेतना किशोरावस्था में ही दिखाई देने लगी थी। 1916 में टीएनजे कॉलेजिएट हाई स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने कक्षा में ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष किया, जिसके कारण उन्हें दंडित किया गया। उस समय ब्रिटिश शासन में राष्ट्रवादी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रहती थी। स्कूली जीवन में ही उनका संपर्क ढाका के क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से हुआ। इस संपर्क ने उनके राजनीतिक संस्कार को प्रभावित किया। हालांकि उनके आगे के सार्वजनिक जीवन में गांधीवादी आंदोलन और कांग्रेस की राजनीति का भी महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देता है। गांधी के आह्वान पर छोड़ी पढ़ाई, स्वतंत्रता आंदोलन में उतरे 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए। गांधी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के संपर्क में काम करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के संगठनात्मक पक्ष को करीब से समझा। 1921 से 1923 के बीच वे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निजी सचिव रहे। यह अनुभव उनके आगे के सार्वजनिक जीवन में उपयोगी साबित हुआ। गया कांग्रेस में सुभाष चंद्र बोस से हुई पहली महत्वपूर्ण मुलाकात 1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन में उनकी मुलाकात सुभाष चंद्र बोस से हुई। बोस उस समय देशबंधु चितरंजन दास के साथ कांग्रेस अधिवेशन में आए थे। सहाय को उनकी आवभगत की जिम्मेदारी दी गई थी। बाद के वर्षों में दोनों के बीच राजनीतिक संपर्क गहरा हुआ और यही संबंध आजाद हिंद आंदोलन के दौर में अधिक महत्वपूर्ण हो गया। 1923 में आनंद मोहन सहाय जापान चले गए। जापान में उनका प्रवास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय पक्ष से उनके जुड़ाव का महत्वपूर्ण चरण बना। उन्होंने वहां बसे भारतीयों के बीच राजनीतिक संपर्क स्थापित किए और भारत की स्वतंत्रता के समर्थन में गतिविधियां शुरू कीं। उनकी गतिविधियां जापान तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने एशिया के विभिन्न हिस्सों में बसे भारतीय समुदायों से संपर्क किया। उनका प्रयास था कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों को भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा जाए और स्वतंत्रता के पक्ष में एक व्यापक वातावरण तैयार किया जाए। ब्रिटिश निगरानी के बीच संगठन खड़ा करने की चुनौती यह कार्य उस समय आसान नहीं था। ब्रिटिश सरकार विदेशों में सक्रिय भारतीय राष्ट्रवादियों की गतिविधियों पर नजर रखती थी। ऐसे वातावरण में सहाय ने सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के संपर्कों का इस्तेमाल किया। उनके काम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे राजनीतिक विचार को संगठित गतिविधि में बदलने की कोशिश करते थे। जापान में भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों को संगठित करने के साथ उन्होंने प्रचार के क्षेत्र में भी काम किया। 1930 में ‘वॉयस ऑफ एशिया’ नामक पत्रिका शुरू की गई, जो अंग्रेजी और जापानी भाषाओं में प्रकाशित होती थी। इसका उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों और भारत की राजनीतिक स्थिति को जापानी पाठकों तक पहुंचाना था। श्री सहाय विभिन्न सामाजिक और शैक्षणिक समूहों के बीच भी संपर्क बनाते थे। गांवों, मंदिरों और विश्वविद्यालयों में बैठकों तथा संवाद के माध्यम से वे भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास करते रहे। इस तरह उनकी गतिविधियां संगठन और प्रचार दोनों स्तरों पर चलती रहीं। प्रवासी भारतीयों को जोड़ने में निभाई अहम भूमिका 1930 के दशक में दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता लीग जैसी संस्थाओं ने प्रवासी भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में भूमिका निभाई। आनंद मोहन सहाय इस व्यापक गतिविधि से जुड़े प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों में थे। उनका अनुभव आगे चलकर आजाद हिंद आंदोलन के लिए उपयोगी हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध ने दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीतिक परिस्थितियों को बदल दिया। जापान के युद्ध में प्रवेश के बाद ब्रिटिश नियंत्रण वाले कई क्षेत्रों में सत्ता-संतुलन बदला और बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक युद्धबंदी बने। इसी परिस्थिति में भारतीय स्वतंत्रता लीग और भारतीय राष्ट्रीय सेना, यानी आजाद हिंद फौज, के पुनर्गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस दौर में भारतीय राष्ट्रवादी नेतृत्व के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण था कि आंदोलन को किस प्रकार राजनीतिक दिशा दी जाए। आनंद मोहन सहाय उन लोगों में थे जो सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व को उपयुक्त मानते थे। 1943: नेताजी पहुंचे दक्षिण-पूर्व एशिया, सहाय को मिली महत्वपूर्ण जिम्मेदारी 1943 में सुभाष चंद्र बोस के दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचने और आजाद हिंद आंदोलन का नेतृत्व संभालने के बाद सहाय ने उनके साथ काम किया। इसी वर्ष अस्थायी आजाद हिंद सरकार की स्थापना हुई और सहाय को उसमें महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए।उनकी भूमिका को समझने के लिए आजाद हिंद आंदोलन को केवल सैन्य संगठन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। आजाद हिंद फौज के संचालन के लिए सैनिक व्यवस्था के साथ प्रशासनिक ढांचा, वित्तीय संसाधन, राजनीतिक संपर्क और प्रचार व्यवस्था भी आवश्यक थी। आनंद मोहन सहाय का योगदान मुख्यतः इन्हीं क्षेत्रों से जुड़ा था। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय समुदायों से सहयोग जुटाने, संगठनात्मक गतिविधियों को समन्वित करने तथा आजाद हिंद सरकार के प्रशासनिक कामकाज में योगदान दिया। जापान के साथ राजनीतिक और प्रशासनिक संवाद में भी वे सक्रिय रहे। संगठनकर्ता और कूटनीतिक संपर्क-सूत्र के रूप में पहचान इस संदर्भ में उन्हें आजाद हिंद आंदोलन के महत्वपूर्ण संगठनकर्ताओं और कूटनीतिक संपर्क-सूत्रों में से एक कहना अधिक उपयुक्त होगा। उन्हें अकेले किसी व्यवस्था का निर्माता या निर्णायक व्यक्ति बताना इतिहास की जटिलता को सरल कर देगा, क्योंकि आजाद हिंद आंदोलन अनेक नेताओं, संगठनों और कार्यकर्ताओं के सामूहिक प्रयास का परिणाम था। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का प्रश्न भी आजाद हिंद सरकार की राजनीतिक पहचान से जुड़ा था। जापान के नियंत्रण में रहे इन द्वीपों को आजाद हिंद सरकार के अधीन लाने की प्रक्रिया में भारतीय नेतृत्व ने बातचीत की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने बाद में इन द्वीपों का नाम ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ रखा। इस पूरे प्रसंग में भारतीय पक्ष की राजनीतिक स्थिति को रखने वाले लोगों में आनंद मोहन सहाय की भूमिका का उल्लेख मिलता है। इम्फाल-कोहिमा अभियान और बदलती युद्ध परिस्थितियां 1944 में आजाद हिंद फौज ने भारत की सीमा में प्रवेश किया और इम्फाल तथा कोहिमा की दिशा में सैन्य अभियान में भाग लिया। अभियान अंततः सफल नहीं हुआ। जापान की सैन्य स्थिति कमजोर होने, रसद संबंधी कठिनाइयों और युद्ध की बदलती परिस्थितियों ने आजाद हिंद फौज की स्थिति को प्रभावित किया। अगस्त 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के साथ आजाद हिंद फौज का सैन्य अभियान समाप्ति की ओर चला गया। लेकिन, आजाद हिंद फौज का प्रभाव सैन्य पराजय के साथ समाप्त नहीं हुआ। उसके अधिकारियों और सैनिकों पर चले मुकदमों ने भारत में व्यापक जनभावना पैदा की। लाल किले के मुकदमों ने आजाद हिंद फौज के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। इससे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहले से मौजूद असंतोष को और बल मिला। भारत की आजादी को एक ही कारण में समेटना उचित नहीं आजाद हिंद फौज के प्रभाव का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि भारत की स्वतंत्रता अनेक कारकों के सम्मिलित परिणाम से आई। गांधी के नेतृत्व में जनआंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियां, कांग्रेस की राजनीतिक भूमिका, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक-सामरिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां और भारतीय सैनिकों के बीच बदलती राजनीतिक चेतना—इन सभी ने मिलकर स्वतंत्रता की प्रक्रिया को प्रभावित किया। इसलिए आजाद हिंद फौज को स्वतंत्रता का अकेला या निर्णायक कारण मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। इसी संतुलित परिप्रेक्ष्य में आनंद मोहन सहाय की भूमिका भी देखी जानी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वतंत्रता आंदोलन की जमीन तैयार करने वाला राष्ट्रवादी उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय पक्ष को गंभीरता से लिया। विदेशों में बसे भारतीयों के बीच संगठन खड़ा करना, भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में प्रचार करना और विभिन्न राजनीतिक तथा सामाजिक समूहों से संपर्क बनाना उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिंद सरकार के गठन के बाद उनके पहले के अनुभवों का उपयोग संगठनात्मक और प्रशासनिक कार्यों में हुआ। स्वतंत्रता के बाद उनके जीवन ने एक अलग दिशा ली। भारत सरकार ने उनके विदेशों के अनुभव का उपयोग राजनयिक सेवा में किया। उन्होंने विभिन्न देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और हनोई तथा बैंकाक में महत्वपूर्ण राजनयिक जिम्मेदारियां निभाईं। यह उनके जीवन की एक उल्लेखनीय विडंबना भी है कि जिस एशियाई भूभाग में उन्होंने कभी गुलाम भारत की स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक संपर्क बनाए थे, स्वतंत्र भारत में वहीं उन्होंने भारतीय राज्य का राजनयिक प्रतिनिधित्व किया। विदेश सेवा के बाद शिक्षा और सामाजिक कार्यों की राह 1 जनवरी 1960 को उन्होंने विदेश सेवा से स्वैच्छिक अवकाश लिया। इसके बाद उनका झुकाव शिक्षा और सामाजिक कार्यों की ओर रहा। विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान का उल्लेख किया जाता है। नाथनगर बालिका उच्च विद्यालय और सुंदरवती महिला महाविद्यालय जैसे संस्थानों से उनका जुड़ाव उनके सामाजिक सरोकारों को रेखांकित करता है। 13 फरवरी 1991 को आनंद मोहन सहाय का निधन हुआ। उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी उनका जीवन एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है—हम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को कितनी व्यापकता से देखते हैं? स्वतंत्रता की लड़ाई के पीछे अनगिनत अनसुने चेहरे स्वतंत्रता का इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध युद्धों का इतिहास नहीं है। यह उन असंख्य लोगों का इतिहास भी है जिन्होंने संगठन बनाए, संसाधन जुटाए, जनमत तैयार किया और राजनीतिक संपर्कों के माध्यम से आंदोलन को विस्तार दिया। आनंद मोहन सहाय का महत्व इसी संदर्भ में सामने आता है। उनका योगदान नेताजी के योगदान से अलग करके देखने की जरूरत नहीं, लेकिन उसे केवल नेताजी के सहयोगी की भूमिका तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। वे अपने समय के ऐसे राष्ट्रवादी थे जिन्होंने भारत के बाहर रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की अंतरराष्ट्रीय जमीन तैयार करने में वर्षों लगाए। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही थी कि उन्होंने प्रवासी भारतीय समुदाय को केवल भावनात्मक रूप से भारत से जोड़ने के बजाय उसे स्वतंत्रता के राजनीतिक उद्देश्य से जोड़ने का प्रयास किया। सुर्खियों से दूर रहने वाले संगठनकर्ताओं की कहानी आज जब स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को नए सिरे से पढ़ने की आवश्यकता महसूस होती है, तब आनंद मोहन सहाय जैसे व्यक्तित्वों को याद करना जरूरी है। उनकी कहानी हमें बताती है कि बड़े आंदोलनों की सफलता के पीछे केवल लोकप्रिय नेता नहीं होते। उनके पीछे संगठनकर्ता, प्रचारक, संपर्क-सूत्र, प्रशासक और कूटनीतिज्ञ भी होते हैं, जिनका काम अक्सर सुर्खियों से दूर रहता है। आनंद मोहन सहाय ऐसे ही एक राष्ट्रवादी थे। न वे आजाद हिंद फौज के अकेले निर्माता थे, न स्वतंत्रता संग्राम के अकेले निर्णायक पात्र। लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय राष्ट्रवादी गतिविधियों को संगठित करने और आजाद हिंद आंदोलन के प्रशासनिक तथा कूटनीतिक पक्ष को मजबूत करने में उनकी भूमिका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। नेताजी की आवाज को संगठन और संपर्कों की जमीन इतिहास के बड़े अध्याय अक्सर अनेक हाथों से लिखे जाते हैं। नेताजी उस अध्याय की सबसे तेजस्वी आवाज थे; आनंद मोहन सहाय उन अनेक कार्यकर्ताओं में थे, जिन्होंने उस आवाज को संगठन और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की जमीन देने में अपना योगदान दिया। इसीलिए, आनंद मोहन सहाय को याद करना केवल एक अपेक्षाकृत कम चर्चित स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह स्वतंत्रता संग्राम के उस व्यापक स्वरूप को स्वीकार करना भी है, जिसमें भारत की आजादी की लड़ाई सीमाओं के भीतर ही नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भी लड़ी जा रही थी। और शायद यही आनंद मोहन सहाय की सबसे स्थायी पहचान है—एक राष्ट्रवादी संगठनकर्ता, एक सक्रिय कूटनीतिक सेतु और आजाद हिंद आंदोलन के उन महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं में से एक, जिनके योगदान के बिना उस दौर की पूरी तस्वीर अधूरी रह जाती है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)