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नई दिल्ली। बिहार के भागलपुर की किसी सड़क पर जनवरी 1809 में घटी एक घटना को आज पढ़ना महज इतिहास को याद करना नहीं है। यह उस दौर की सत्ता-व्यवस्था को समझने का अवसर भी है, जब अंग्रेजी शासन के सामने भारतीयों से आज्ञाकारिता और अधीनता की अपेक्षा की जाती थी। इसी माहौल में एक भारतीय ने एक अंग्रेज कलेक्टर के कथित दुर्व्यवहार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का साहस किया और मामला तत्कालीन गवर्नर जनरल तक पहुंचा। नवजागरण का स्वाभिमानी चेहरा वह भारतीय थे राजा राममोहन राय। राममोहन राय को भारतीय नवजागरण के अग्रदूत, महान समाज सुधारक और सती प्रथा के उन्मूलन के लिए निर्णायक वैचारिक संघर्ष करने वाले व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है लेकिन उनके जीवन का भागलपुर प्रसंग उनके व्यक्तित्व के एक दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है आत्मसम्मान, तर्क और सत्ता से सवाल करने का साहस। उपलब्ध ऐतिहासिक शोध के अनुसार, राममोहन राय 1809 के आरंभिक महीनों में भागलपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासनिक तंत्र से जुड़े हुए थे। इसी दौरान जिले के कलेक्टर सर फ्रेडरिक हैमिल्टन के साथ उनकी एक घटना हुई, जिसने आगे चलकर एक औपचारिक प्रशासनिक शिकायत का रूप लिया। राममोहन राय ने 12 अप्रैल 1809 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड मिंटो को इस संबंध में याचिका दी थी। इस याचिका का उल्लेख बाद के शोध और राममोहन राय के जीवन से जुड़े ऐतिहासिक अध्ययनों में मिलता है। लोककथा से आगे दस्तावेज घटना को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे पास केवल बाद की लोककथा नहीं बल्कि स्वयं राममोहन राय की लिखित शिकायत का आधार मौजूद है। हालांकि कलेक्टर हैमिल्टन ने बाद में आरोपों का अपना अलग विवरण दिया था इसलिए इतिहास के प्रति ईमानदार तरीका यही है कि दोनों पक्षों के विवरण को ध्यान में रखते हुए घटना को समझा जाए।कहा जाता है कि जनवरी 1809 में एक दिन राममोहन राय पालकी में सवार होकर गंगा घाट की ओर से भागलपुर शहर की तरफ जा रहे थे, रास्ते में कलेक्टर हैमिल्टन घोड़े पर सवार दिखाई दिए। पालकी का पर्दा लगा हुआ था और राममोहन उन्हें देख नहीं पाए। परिणामतः उन्होंने वह औपचारिक अभिवादन नहीं किया, जिसकी उस समय अंग्रेज अधिकारियों से अपेक्षा की जाती थी।हैमिल्टन ने इसे असम्मान के रूप में लिया। अनदेखी या अपमान? राममोहन राय ने बाद में अपनी शिकायत में जो विवरण दिया, उसके अनुसार कलेक्टर ने उनसे पालकी से उतरने को कहा और उनके प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। राममोहन ने स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उनका कहना था कि उन्होंने कलेक्टर को देखा ही नहीं था इसलिए जानबूझकर अभिवादन न करने का सवाल नहीं उठता। यहां घटना का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।राममोहन राय ने तत्काल टकराव का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने अधिकारी के पद का सम्मान करते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की लेकिन जब मामला केवल शिष्टाचार के सवाल से आगे बढ़कर कथित अपमान का रूप लेने लगा, तब उन्होंने इसे निजी अपमान मानकर चुप रहना भी स्वीकार नहीं किया। रास्ते पर हुई बातचीत राममोहन के विवरण के अनुसार कलेक्टर कुछ दूरी तक उनकी पालकी के पीछे गए और फिर उनसे बातचीत हुई। राममोहन ने अपनी ओर से स्पष्टीकरण दिया और उसके बाद अपनी राह चले गए। यहीं यह प्रसंग सामान्य विवाद से अलग हो जाता है। अगर यह घटना केवल सड़क पर हुई बहस होती तो शायद इतिहास में उसका कोई स्थान नहीं बनता लेकिन राममोहन राय ने इसे वहीं समाप्त नहीं होने दिया। उन्होंने 12 अप्रैल 1809 को लॉर्ड मिंटो को लिखित शिकायत भेजी।यह पत्र इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। सवाल सिर्फ सम्मान का नहीं था राममोहन राय ने शिकायत में यह प्रश्न उठाया कि किसी अंग्रेज अधिकारी को केवल अपनी नाराजगी के आधार पर किसी भारतीय प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ अपमानजनक व्यवहार करने का अधिकार कैसे हो सकता है। उनके लिए यह केवल व्यक्तिगत सम्मान का मामला नहीं था। यह शासन और शासित के बीच संबंध में न्याय और मर्यादा का सवाल था। यहीं राममोहन राय की दृष्टि साधारण व्यक्तिगत प्रतिरोध से आगे जाती दिखाई देती है। वे अंग्रेज शासन की प्रशासनिक व्यवस्था में काम कर चुके थे और अधिकारियों के पद का महत्व समझते थे लेकिन पद का सम्मान और व्यक्ति की गरिमा दोनों को वे अलग-अलग समझते थे। उनके लिए सरकारी अधिकारी का पद भारतीय नागरिक के सम्मान को समाप्त करने का अधिकार नहीं देता था। कलेक्टर का दूसरा पक्ष कलेक्टर हैमिल्टन ने राममोहन के आरोपों को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी ओर से घटना का अलग विवरण दिया। इस तथ्य को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा क्योंकि इतिहास किसी एक पक्ष की स्मृति भर नहीं होता। उपलब्ध शोध के अनुसार मामले पर प्रशासनिक स्तर पर विचार हुआ और अंततः कलेक्टर को भारतीयों के साथ अनावश्यक विवाद से बचने के लिए चेतावनी दी गई। बाद की लोकप्रिय कथाओं में यह प्रसंग अक्सर इस रूप में सामने आता है कि “राममोहन राय ने अंग्रेज कलेक्टर को झुकने पर मजबूर कर दिया।” लेकिन, दस्तावेजी इतिहास के लिहाज से इससे अधिक सावधानीपूर्ण भाषा बेहतर होगी। उपलब्ध प्रमाण यह बताते हैं कि राममोहन ने शिकायत की, कलेक्टर ने अपना पक्ष रखा और प्रशासनिक स्तर पर मामले पर कार्रवाई हुई। फिर भी इस घटना का महत्व कम नहीं होता बल्कि असली महत्व इसी में है कि एक भारतीय ने औपनिवेशिक सत्ता के सामने अपनी गरिमा का प्रश्न उठाया। 1809 का कठिन समय आज के लोकतांत्रिक भारत में किसी अधिकारी के व्यवहार के खिलाफ शिकायत करना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन 1809 का भारत आज का भारत नहीं था। अंग्रेजी सत्ता अपने प्रभाव और अधिकार को स्थापित कर रही थी। भारतीय समाज में अंग्रेज अधिकारी के सामने प्रतिवाद करने का साहस सामान्य बात नहीं थी। राममोहन राय ने इस भय की संस्कृति को चुनौती दी। भागलपुर का यह प्रसंग उनके आगे के जीवन को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी है। कुछ वर्षों बाद यही व्यक्ति सती प्रथा जैसी अमानवीय सामाजिक प्रथा के खिलाफ निर्णायक वैचारिक संघर्ष करता दिखाई देता है। वह धार्मिक रूढ़ियों से प्रश्न करता है, स्त्रियों की स्थिति पर सवाल उठाता है, प्रेस की स्वतंत्रता की बात करता है और प्रशासनिक सुधारों के पक्ष में तर्क देता है। तर्क और न्याय की कसौटी अर्थात उनके जीवन में सामाजिक सुधार और सत्ता से सवाल दो अलग-अलग धाराएं नहीं थीं। उनके पीछे एक साझा बौद्धिक आग्रह था कि किसी स्थापित व्यवस्था को केवल इसलिए स्वीकार मत करो कि वह शक्तिशाली है। उसे तर्क और न्याय की कसौटी पर परखो। भागलपुर की पालकी की घटना में भी यही आग्रह दिखाई देता है। एक तरफ औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिनिधि था। दूसरी तरफ एक भारतीय, जो उसी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा होने के बावजूद अपने सम्मान के प्रश्न पर चुप रहने को तैयार नहीं था। यही वजह है कि यह घटना भागलपुर के इतिहास में एक विशेष स्थान रखती है। विनम्रता, तर्क और प्रतिरोध भागलपुर केवल राममोहन राय के जीवन का एक प्रशासनिक पड़ाव नहीं था। यह वह स्थान भी बना जहां उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष दिखाई देता है, जिसमें विनम्रता कमजोरी नहीं है और प्रतिरोध हमेशा शोर नहीं करता।राममोहन पहले अपनी बात समझाते हैं। फिर शिकायत दर्ज कराते हैं। यानी उनका प्रतिरोध भावनात्मक उबाल नहीं बल्कि तर्क और संस्थागत प्रक्रिया पर आधारित था। यह बात आज की पत्रकारिता और लोकतंत्र के लिए भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सत्ता से सवाल पूछने का अर्थ केवल विरोध करना नहीं है। सवाल पूछने के लिए तथ्य चाहिए, तर्क चाहिए और अपने पक्ष की जिम्मेदारी स्वीकार करने का साहस चाहिए। राममोहन राय का भागलपुर प्रसंग इसी अर्थ में आधुनिक सार्वजनिक चेतना की शुरुआती झलक देता है। शहर की पहचान में इतिहास आज भागलपुर के लिए इस इतिहास को याद करना इसलिए भी जरूरी है कि शहर की पहचान केवल उसके वर्तमान से नहीं बनती। उसके अतीत में ऐसे अनेक प्रसंग हैं, जिनमें भारतीय समाज के आधुनिक होने की प्रक्रिया दिखाई देती है। राममोहन राय की स्मृति से जुड़ा सड़क का नाम और उनके भागलपुर प्रवास से जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री इसी विरासत की याद दिलाती है लेकिन स्मृति केवल नामकरण से जीवित नहीं रहती। स्मृति तब जीवित रहती है, जब समाज उस इतिहास से सवाल करना सीखता है। राममोहन राय की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है। अधिकार के साथ जवाबदेही उन्होंने समाज से कहा कि रूढ़ि के सामने प्रश्न करो। सत्ता से कहा कि अधिकार के साथ जवाबदेही भी आती है और व्यक्ति के स्तर पर यह दिखाया कि सम्मान मांगने के लिए हमेशा ताकतवर होना जरूरी नहीं; कभी-कभी अपने अधिकार के प्रति सजग होना ही पर्याप्त होता है। भागलपुर की वह पालकी आज दिखाई नहीं देती। वह सड़क भी वैसी नहीं रही होगी। कलेक्टर की सत्ता भी इतिहास का हिस्सा बन चुकी है लेकिन उस घटना से निकला प्रश्न आज भी जीवित है कि क्या किसी सत्ता को यह अधिकार है कि वह नागरिक से सम्मान तो मांगे, लेकिन नागरिक को उसी सत्ता से सम्मान और न्याय मांगने का अधिकार न दे? राजा राममोहन राय के जीवन का उत्तर स्पष्ट था—नहीं इसीलिए उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल सती प्रथा के उन्मूलन के महानायक को नमन करना नहीं है। यह उस भारतीय को याद करना भी है, जिसने बहुत पहले यह समझ लिया था कि सामाजिक सुधार और नागरिक आत्मसम्मान एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। भागलपुर की उस घटना को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। एक शिकायत, एक बड़ा सवाल एक पालकी रुकी थी, एक अधिकारी नाराज हुआ था और एक भारतीय ने शिकायत लिखी थी लेकिन इतिहास के लिए उस दिन उससे कहीं बड़ा कुछ घटा था—एक व्यक्ति ने भय से ऊपर उठकर अपने सम्मान को सार्वजनिक प्रश्न बना दिया था और शायद यही किसी भी नवजागरण की पहली शर्त होती है सवाल पूछने का साहस। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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