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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला सात नोएडा (यूपी)। दिल्ली से दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ते हुए जैसे ही बुलंदशहर जनपद का खुर्जा नगर सामने आता है, हवा में एक अलग-सी गंध महसूस होती है। यह गंध भीगी मिट्टी की है, भट्टों की तपिश की है और उन हजारों कारीगरों के श्रम की है, जिनकी हथेलियों ने छह शताब्दियों से अधिक समय से मिट्टी को ऐसी पहचान दी है कि आज दुनिया इस नगर को "सिरेमिक सिटी" और "पॉटरी सिटी" के नाम से जानती है। यहां मिट्टी केवल कच्चा पदार्थ नहीं है; यह अर्थव्यवस्था भी है, परंपरा भी, कला भी और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत भी। छह सौ वर्षों की अनवरत साधना खुर्जा की पॉटरी का इतिहास लगभग छह सौ वर्ष पुराना माना जाता है। इतिहासकारों में इसकी सटीक उत्पत्ति को लेकर मतभेद अवश्य हैं, लेकिन इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि 14वीं और 15वीं शताब्दी के बीच मध्य एशिया और फ़ारस से आए कारीगरों तथा स्थानीय भारतीय कुम्हारों की परंपरा के अद्भुत संगम ने इस शिल्प को जन्म दिया। लोककथाएं इसे कभी तैमूर के साथ आए कारीगरों से जोड़ती हैं, तो कभी मुहम्मद बिन तुगलक और मुगल संरक्षण से। खुर्जा के अनेक कुम्हार स्वयं को मुल्तानी कुम्हार बताते हैं और अपने पूर्वजों का संबंध वर्तमान पाकिस्तान के मुल्तान से जोड़ते हैं। इतिहास चाहे जिस कथा की पुष्टि करे, पर एक सत्य निर्विवाद है—खुर्जा ने विदेशी तकनीक को भारतीय सौंदर्यबोध के साथ इस तरह आत्मसात किया कि उसने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना ली। जब मिट्टी पर उतर आए फूल खुर्जा की पॉटरी की सबसे बड़ी पहचान उसकी चित्रकारी है। हल्की सफ़ेद या क्रीम पृष्ठभूमि पर गहरे नीले, भूरे, हरे और फ़िरोज़ी रंगों से बने फूल, बेल-बूटे और ज्यामितीय आकृतियां किसी चित्रकार की कूची का कमाल प्रतीत होती हैं। हर प्लेट, हर मग, हर कटोरी और हर फूलदान अपने भीतर एक छोटी-सी चित्रकला समेटे होता है। यह केवल सजावट नहीं, बल्कि भारतीय और फ़ारसी कलात्मक परंपराओं का संगम है। खुर्जा के कारीगर मिट्टी को कैनवास बना देते हैं। मिट्टी नहीं, विज्ञान का चमत्कार साधारण कुम्हार की मिट्टी और खुर्जा की सिरेमिक में अंतर है। यहाँ केवल चिकनी मिट्टी का उपयोग नहीं होता। उसमें क्वार्ट्ज, फेल्डस्पार और अन्य खनिजों का संतुलित मिश्रण मिलाया जाता है। यही कारण है कि खुर्जा के उत्पाद अधिक मजबूत, अधिक टिकाऊ और प्राकृतिक चमक वाले होते हैं। उच्च तापमान पर भट्टों में पकने के बाद इन बर्तनों पर विशेष ग्लेज़ चढ़ाई जाती है, जो उन्हें चमक, मजबूती और खाद्य उपयोग के लिए सुरक्षित बनाती है। यही कारण है कि खुर्जा की पॉटरी कला और विज्ञान का अद्भुत मेल मानी जाती है। रेल आई और दुनिया बदल गई उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब दिल्ली–कोलकाता रेलमार्ग खुर्जा तक पहुँचा, तब इस छोटे से शिल्प नगर की नियति बदल गई। अब तक जो मिट्टी के बर्तन आसपास के क्षेत्रों तक सीमित थे, वे देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचने लगे। रेल ने केवल परिवहन का रास्ता नहीं खोला, उसने खुर्जा के लिए राष्ट्रीय बाज़ार के द्वार खोल दिए। स्वतंत्रता के बाद सरकारी प्रशिक्षण केंद्र, डिज़ाइन विकास संस्थान, आधुनिक भट्टियाँ और तकनीकी सहयोग ने इस उद्योग को नई गति दी। 1990 के दशक में कोयले के पारंपरिक भट्टों की जगह गैस आधारित आधुनिक भट्टियाँ आने लगीं, जिससे गुणवत्ता और पर्यावरण—दोनों में सुधार हुआ। मिट्टी से खड़ी हुई करोड़ों की अर्थव्यवस्था खुर्जा केवल सांस्कृतिक विरासत का नगर नहीं, बल्कि भारत के सबसे बड़े सिरेमिक औद्योगिक क्लस्टरों में से एक है। आज यहां लगभग 500 से अधिक पंजीकृत एवं अपंजीकृत सिरेमिक इकाइयां कार्यरत हैं। इन उद्योगों में 25,000 से 30,000 से अधिक कारीगर और श्रमिक प्रत्यक्ष रूप से कार्य करते हैं, जबकि परिवहन, पैकेजिंग, रंगाई, विपणन और कच्चे माल की आपूर्ति जैसे क्षेत्रों को जोड़ दिया जाए तो एक लाख से अधिक लोगों की आजीविका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग पर निर्भर है। मिट्टी से विश्व बाज़ार तक आज खुर्जा केवल घड़े और सुराहियां नहीं बनाता। यहाँ डिनर सेट, कॉफी मग, टी-सेट, सर्विंग बाउल, सजावटी फूलदान, टाइलें, प्लांटर, सैनिटरीवेयर, विद्युत इन्सुलेटर, होटलवेयर, स्टोनवेयर तथा वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में प्रयुक्त पोर्सिलेन उत्पाद भी बनाए जाते हैं। खुर्जा के उत्पाद आज 50 से अधिक देशों के बाजारों तक पहुँच चुके हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात और खाड़ी देशों में इसकी विशेष मांग है। भारत से निर्यात होने वाले हस्तनिर्मित एवं कलात्मक सिरेमिक उत्पादों में खुर्जा की उल्लेखनीय हिस्सेदारी है। जीआई टैग से मिली वैश्विक पहचान वर्ष 2008 में खुर्जा पॉटरी को भौगोलिक संकेत का दर्जा प्राप्त हुआ। इसके बाद इस शिल्प को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। आज यह उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला–एक उत्पाद' योजना का प्रमुख उत्पाद भी है। डिज़ाइन विकास, आधुनिक मशीनें, गैस आधारित भट्टियाँ, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं ने खुर्जा की पारंपरिक कला को आधुनिक उद्योग का स्वरूप प्रदान किया है। तकनीक ने बदली तकदीर आधुनिक मशीनें आई हैं। साँचे भी बने हैं। गैस आधारित भट्टियां भी लग गई हैं। लेकिन खुर्जा की असली पहचान आज भी मशीन नहीं, इंसान के हाथ हैं। अंतिम सौंदर्य आज भी कारीगर की कूची ही रचती है। मशीन आकार दे सकती है, लेकिन मिट्टी को आत्मा केवल कलाकार के हाथ ही देते हैं। हर फूल की पंखुड़ी में उसकी उँगलियों की लय दिखाई देती है। हर रेखा भारतीय हस्तशिल्प की बारीक और समृद्ध सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करती है। आर्थिक शक्ति और सांस्कृतिक विरासत का संगम राष्ट्रीय स्तर पर भारत का सिरेमिक उद्योग विश्व के प्रमुख सिरेमिक उत्पादक देशों में गिना जाता है और इसका वार्षिक कारोबार 50,000 करोड़ रुपये से अधिक आँका जाता है। इस विशाल उद्योग में खुर्जा का योगदान ऐतिहासिक भी है और आर्थिक भी। यही कारण है कि विशेषज्ञ खुर्जा को केवल "पॉटरी सिटी" नहीं, बल्कि भारत की सिरेमिक राजधानी भी कहते हैं। खुर्जा हमें सिखाता है खुर्जा की कहानी केवल एक शहर की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जिसने बाहर से आई तकनीक को आत्मसात किया, उसे अपनी संस्कृति में ढाला और फिर उसे दुनिया के सामने अपनी पहचान के रूप में प्रस्तुत किया। यह नगर बताता है कि परंपरा और आधुनिकता विरोधी नहीं हैं। यदि कौशल, नवाचार और बाज़ार साथ चलें, तो सदियों पुराना शिल्प भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकता है। और शायद यही कारण है कि खुर्जा केवल "सिरेमिक सिटी" नहीं, बल्कि भारतीय कारीगरी के जीवित आत्मविश्वास का प्रतीक है। जब भी किसी घर की मेज़ पर खुर्जा का एक मग रखा होता है, किसी बैठक में उसका फूलदान सजता है या किसी बगीचे में उसका गमला मुस्कुराता है, तब वहाँ केवल एक सिरेमिक उत्पाद नहीं होता, वहाँ छह सौ वर्षों की परंपरा, हजारों कारीगरों का श्रम और भारतीय मिट्टी की अमर सृजनशीलता उपस्थित होती है।