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मुंगेर: परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि शिष्यत्व का असली आधार गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण है और केवल ज्ञान हासिल कर लेना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि गुरु की शिक्षा, चेतना और आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्चे शिष्य की पहचान है। अहंकार का त्याग ही वास्तविक शिष्यत्व की शुरुआत पादुका दर्शन स्थित संन्यास पीठ में आयोजित चार दिवसीय गुरु पूर्णिमा महोत्सव के तीसरे दिन पूरा परिसर भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि साधना साधक के मन और हृदय को पवित्र बनाती है। जब शिष्य अपने अहंकार को छोड़कर गुरु की चेतना को अपने भीतर जगह देता है तभी वास्तविक शिष्यत्व की शुरुआत होती है। उन्होंने कहा कि गुरु-कृपा पाने के लिए केवल भावनात्मक जुड़ाव काफी नहीं है बल्कि शिष्य को सेवा, अनुशासन और श्रद्धा के रास्ते पर लगातार चलना पड़ता है। श्रद्धा गुरु और शिष्य के बीच मजबूत सेतु स्वामी निरंजनानंद ने श्रद्धा को गुरु और शिष्य के बीच का सबसे मजबूत सेतु बताया और कहा कि सच्ची श्रद्धा का मतलब केवल सुख, समृद्धि या सफलता की इच्छा करना नहीं है। श्रद्धा साधना की वह अनुभूति है जो व्यक्ति को भीतर से परिपक्व बनाती है। गुरु की शिक्षा जीवन को सही दिशा देती है, जबकि सेवा से अहंकार समाप्त होता है और व्यक्तित्व निखरता है। उन्होंने कहा कि जिस शिष्य के जीवन में श्रद्धा, सेवा और साधना का संतुलन होता है, वही गुरु-कृपा का वास्तविक अधिकारी बनता है। गुरु पूर्णिमा आत्मचिंतन और कृतज्ञता का पर्व इससे पहले बिहार योग विद्यालय के अध्यक्ष स्वामी शिवध्यानम ने देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल पूजा का अवसर नहीं बल्कि आत्मचिंतन, कृतज्ञता और आध्यात्मिक पूर्णता का पर्व है। उन्होंने भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान का प्रकाश स्तंभ बताते हुए कहा कि गुरु साधक को अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मबोध और ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं। भक्ति और साधना से सराबोर रहा पूरा परिसर बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने ध्यान, प्रार्थना और मंत्रोच्चार के माध्यम से गुरु के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। पूरे आयोजन स्थल पर देर तक भक्ति, शांति और आध्यात्मिक चेतना का वातावरण बना रहा।