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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू / मोतिहारी। भोटेकोशी की प्रलयंकारी बाढ़ ने नेपाल से न जाने कितने घरों की खुशियां छीन लीं। नदी के उफनते पानी में बहते शरीर पत्थरों से टकराकर इतने क्षत-विक्षत हो गए कि कई शवों की पहचान तक संभव नहीं रह गई। अब इस प्राकृतिक आपदा ने एक और भयावह संकट खड़ा कर दिया है, उन शवों का क्या किया जाए, जिन्हें कोई अपना कहकर लेने नहीं आया। अस्पतालों के मुर्दाघरों में जगह खत्म होने लगी है। शवों की संख्या बढ़ती जा रही है और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त फ्रीजर उपलब्ध नहीं हैं। सड़ते शवों से उत्पन्न संभावित जनस्वास्थ्य संकट को देखते हुए नेपाल सरकार ने अज्ञात और लावारिस शवों के अस्थायी दफन का आपातकालीन रास्ता अपनाया है। यह फैसला उस देश के लिए असाधारण है, जहां हिंदू और बौद्ध परंपराओं में मृतकों के अंतिम संस्कार की अपनी गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं। लेकिन, भोटेकोशी की बाढ़ ने परिस्थितियों को इतना विकट बना दिया है कि पहचान होने और परिजनों तक पहुंचने से पहले ही सैकड़ों शवों को फिलहाल मिट्टी की आगोश में सुलाना पड़ रहा है। मौत के बाद भी अपनों का इंतजार नेपाल पुलिस के अद्यतन आंकड़ों के अनुसार अब तक 768 शव बरामद किए जा चुके हैं। इनमें केवल 29 शवों की पहचान हो पाई है। पश्चिम नवलपरासी में एक, रसुवा में तीन, नुवाकोट में तीन, धादिंग में एक, चितवन में नौ, पूर्वी नवलपरासी में नौ और गोरखा में तीन शवों की पहचान की गई है। 60 शव पहुंचे अस्पताल, 52 अब भी बेनाम भोटेकोशी की विनाशकारी बाढ़ में जान गंवाने वाले 60 लोगों के शव महाराजगंज स्थित त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल लाए गए हैं। इनमें महज आठ की पहचान हो सकी है जबकि 52 शव अब भी अपनों के नाम की प्रतीक्षा में हैं। अधिकांश शव बुरी तरह क्षत-विक्षत और सड़ चुके हैं। मुर्दाघर में जगह भी लगभग खत्म हो चुकी है। अस्पताल के फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. गोपाल चौधरी ने ऐसे अज्ञात शवों के वैज्ञानिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखते हुए तत्काल अस्थायी दफन की व्यवस्था करने की जरूरत बताई है ताकि मौत के बाद भी इन बेनाम चेहरों के अपनों तक पहुंचने की आखिरी उम्मीद बची रहे। वहीं, 384 अज्ञात शवों का अंतिम संस्कार किया जा चुका है। इन शवों में से कई इतने क्षत-विक्षत हैं कि पूरा शरीर भी सुरक्षित नहीं बचा। पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में केवल हाथ, पैर, पसलियां अथवा शरीर के अन्य हिस्से ही बरामद हुए हैं। तेज बहाव के साथ बहकर आए पत्थरों ने कई शवों को इस कदर क्षतिग्रस्त कर दिया कि चेहरा पहचानना भी मुश्किल हो गया है। इन शवों की कहानी शायद कभी किसी नाम तक पहुंचे, शायद किसी मां की आंखों में वर्षों से अटकी प्रतीक्षा को विराम मिले, इसी उम्मीद के साथ नेपाल प्रशासन वैज्ञानिक पहचान की प्रक्रिया को प्राथमिकता दे रहा है। देवघाट के जंगलों में 96 अज्ञात शव चितवन में स्थिति विशेष रूप से भयावह है। भरतपुर महानगरपालिका के देवघाट धाम के जंगल क्षेत्र में 96 अज्ञात शवों को दफनाया गया है। चितवन पुलिस के अनुसार जिले में बरामद कुल 259 शवों में से 96 की पहचान नहीं हो सकी और उन्हें दफनाया गया। पूर्वी नवलपरासी में 100 अज्ञात शवों को टैग लगाकर दफनाया गया है। जिला पुलिस कार्यालय के डीएसपी अनिल पंडित के अनुसार प्रत्येक शव को टैग किया गया और उसके दफन स्थल का रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया है। गोरखा में भी 29 अज्ञात शवों को दफनाया गया है। पुलिस का कहना है कि दफनाने के दौरान शवों से संबंधित विस्तृत विवरण दर्ज किया गया है, ताकि भविष्य में पहचान होने पर उन्हें वापस निकाला जा सके। मिट्टी के नीचे भी छोड़ी जा रही है पहचान की एक उम्मीद नेपाल सरकार ने अज्ञात तथा लावारिस शवों के प्रबंधन से संबंधित नियमों में आपातकालीन परिस्थितियों के अनुरूप बदलाव किया है। गृह मंत्रालय ने 'अज्ञात तथा लावारिस शव प्रबंधन (प्रथम संशोधन) निर्देशिका, 2083 बीएस' को मंजूरी दी है। संशोधित व्यवस्था में अंतिम संस्कार से पहले शवों के अस्थायी प्रबंधन, जिसमें दफनाना भी शामिल है, का प्रावधान किया गया है। लेकिन, प्रशासन की कोशिश यह है कि मिट्टी के नीचे जाने के बाद भी शव की पहचान की संभावना खत्म न हो। दफनाने से पहले मेडिकल और पुलिस टीमों द्वारा डीएनए नमूना, फिंगरप्रिंट और तस्वीरें सुरक्षित की जा रही हैं। शवों को विशिष्ट टैग और संदर्भ नंबर दिए जा रहे हैं तथा दफनाने के स्थान का रिकॉर्ड और मैपिंग की जा रही है। यानी आज जिस शव को कोई नाम नहीं मिला, उसे कल कोई परिवार अपना कह सके, इसके लिए उसकी पहचान के निशान मिट्टी के नीचे भी सुरक्षित रखे जा रहे हैं। कल कोई आए तो शव वापस निकाला जा सकेगा प्रशासन का उद्देश्य केवल शवों को हटाना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए उनकी पहचान सुरक्षित रखना है। यदि आने वाले समय में किसी लापता व्यक्ति के परिजन का डीएनए किसी दफन शव से मेल खाता है, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत शव को बाहर निकालकर परिजनों को सौंपे जाने की व्यवस्था रहेगी। तब शायद किसी परिवार को अपने बिछड़े हुए व्यक्ति का चेहरा न मिले, लेकिन कम से कम यह भरोसा मिल सकेगा कि वह अजनबी मिट्टी में हमेशा के लिए अनाम नहीं सोया है। नेपाल पुलिस ने खोला अपनों को तलाशने का डिजिटल रास्ता लापता लोगों के परिजनों के लिए नेपाल पुलिस ने ऑनलाइन व्यवस्था भी की है। अज्ञात शवों की तस्वीरें और उनसे जुड़ी जानकारियां आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। शव कहां मिला, उसने कौन से कपड़े पहने थे, शरीर पर कोई टैटू, आभूषण अथवा अन्य पहचान चिह्न थे, इन विवरणों को दर्ज किया जा रहा है। दूर बैठे परिजन अब स्क्रीन पर तस्वीरों में अपने किसी प्रिय चेहरे की तलाश कर रहे हैं। उम्मीद और भय के बीच चल रही यह तलाश शायद इस आपदा की सबसे पीड़ादायक तस्वीरों में से एक है। नेपाल ने दुनिया से मांगे 1000 से अधिक डीप-फ्रीजर शवों के सुरक्षित संरक्षण की चुनौती इतनी बड़ी है कि नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की है। नेपाल के विदेश सचिव अमृत बहादुर राई ने विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 1,000 से अधिक डीप-फ्रीजर स्टोरेज यूनिट और डीएनए टेस्टिंग किट उपलब्ध कराने का आग्रह किया है। अस्पतालों के मुर्दाघरों की क्षमता लगभग 350-400 शवों तक सीमित बताई जा रही है। ऐसे में लगातार बरामद हो रहे शवों को सुरक्षित रखना प्रशासन के सामने गंभीर चुनौती बन गया है। यह सिर्फ शवों का संकट नहीं, हजारों परिवारों की प्रतीक्षा है भोटेकोशी की बाढ़ में बह गए लोगों के आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। हर संख्या के पीछे एक घर है, एक परिवार है, किसी मां की उम्मीद है, किसी बच्चे की प्रतीक्षा है और किसी जीवनसाथी की आंखों में ठहरा हुआ सवाल है, 'वह लौटेगा या नहीं?' नदी ने जिन जिंदगियों को निगल लिया, उनमें से कई अब भी नाम की तलाश में हैं। कुछ शव अस्पतालों की ठंडी दीवारों के बीच पहचान का इंतजार कर रहे हैं, कुछ मिट्टी के नीचे सुरक्षित रखे गए हैं और कुछ के सिर्फ शरीर के टुकड़े ही बचे हैं। नेपाल इस समय केवल बाढ़ से नहीं लड़ रहा। वह मौत के बाद भी इंसान को उसका नाम लौटाने की लड़ाई भी लड़ रहा है। और शायद इस त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर यही है। जिन्हें नदी ने अपनों से छीन लिया, उन्हें अब मिट्टी भी अनाम न निगल जाए, इसके लिए पूरा एक देश उनकी पहचान बचाने में जुटा है।



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