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मुंगेर। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गुरु केवल पूजनीय व्यक्तित्व नहीं बल्कि जागृत चेतना हैं, जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश और सीमित सोच से अनंत संभावनाओं की ओर ले जाती हैं। गुरु का एक उपदेश भी जीवन बदल सकता है स्वामी निरंजनानंद ने बिहार स्कूल ऑफ योग से जुड़े संन्यास पीठ, पादुका दर्शन परिसर में बुधवार को आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव के समापन अवसर पर कहा कि यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन गुरु के एक भी उपदेश का ईमानदारी से पालन करे तो उसके जीवन में व्यापक परिवर्तन संभव है। उन्होंने कहा कि संन्यास पीठ केवल एक आश्रम नहीं बल्कि श्रद्धा, समर्पण और साधना का ऐसा केंद्र है, जहां हर साधक गुरु की चेतना का साक्षात अनुभव करता है। उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा का वास्तविक उद्देश्य केवल गुरु की पूजा करना नहीं, बल्कि उनके आदर्शों और शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारना है। चेतना का रूपांतरण ही इस वर्ष का संदेश उन्होंने बताया कि इस वर्ष गुरु पूर्णिमा महोत्सव का विषय "चेतना का रूपांतरण" रखा गया है। उनके अनुसार, मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहरी दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार, लोभ और नकारात्मक प्रवृत्तियों से होता है। उन्होंने कहा कि योग और आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य इन्हीं विकारों का परिष्कार कर व्यक्ति को उसकी वास्तविक चेतना से जोड़ना है। जब मन शुद्ध होता है, तभी गुरु तत्व का वास्तविक अनुभव संभव होता है। सकारात्मक विचारों से ही होगा आत्मविकास स्वामीजी ने कहा कि मनुष्य को हमेशा ऐसे विचारों, व्यक्तियों और परिस्थितियों से जुड़ना चाहिए, जो सकारात्मकता, रचनात्मकता, आध्यात्मिकता और आत्मविकास को प्रेरित करें। यही योग का मूल संदेश है और यही गुरु पूर्णिमा का भी सार है। पद्म जयंती को बताया जागृत चेतना का उत्सव स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने बताया कि वर्ष 2023 से 2031 तक स्वामी सत्यानंद सरस्वती की पद्म जयंती मनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि "पद्म" केवल कमल का प्रतीक नहीं, बल्कि जागृत चेतना का प्रतीक है। यह आयोजन स्वामी सत्यानंद सरस्वती की उस आध्यात्मिक विरासत का उत्सव है, जिसने योग को विश्वव्यापी आंदोलन का स्वरूप दिया। उन्होंने छह मई 2026 को भगवान श्री तिरुपति बालाजी के मुंगेर आगमन को भी एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक घटना बताते हुए कहा कि इससे पूरे क्षेत्र में नई आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार हुआ। वैदिक परंपरा के बीच संपन्न हुआ महोत्सव चार दिनों तक चले इस महोत्सव में काशी से आए विद्वान आचार्यों ने वैदिक विधि-विधान से गुरु पूजन, रुद्राभिषेक, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। पूरे परिसर में महामृत्युंजय मंत्र, गुरु स्तोत्र, शिव स्तुति और वैदिक ऋचाओं का गूंजता स्वर श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता रहा। भजन, सामूहिक आरती, दीप प्रज्ज्वलन और गुरु पादुका पूजन में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और सेवा, संयम, साधना तथा सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। दुनिया भर के साधकों की रही भागीदारी गुरु पूर्णिमा महोत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका और एशिया के कई देशों से भी बड़ी संख्या में साधक पहुंचे। स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि यह इस बात का प्रमाण है कि स्वामी शिवानंद, स्वामी सत्यानंद और बिहार स्कूल ऑफ योग की परंपरा आज वैश्विक चेतना का हिस्सा बन चुकी है। भीतर का परिवर्तन ही सबसे बड़ी साधना अपने संदेश के अंत में स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि आज जब समाज मानसिक तनाव, भौतिक प्रतिस्पर्धा और मूल्यों के संकट से गुजर रहा है तब गुरु-शिष्य परंपरा पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। उन्होंने कहा कि जीवन का वास्तविक परिवर्तन बाहर नहीं बल्कि भीतर से शुरू होता है और गुरु उसी आंतरिक जागरण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यही गुरु पूर्णिमा महोत्सव का सबसे बड़ा संदेश है।