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(पुण्यतिथि 30 अगस्त पर विशेष) नई दिल्ली। हिन्दी साहित्य का इतिहास केवल कवियों, कथाकारों और उपन्यासकारों की कृतियों से नहीं बनता। उसे दिशा देने वाले आलोचक, अध्येता और साहित्य-संस्कृति के कर्मयोगी भी उसकी स्मृति का हिस्सा होते हैं। डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ ऐसे ही बहुआयामी साहित्य-मनीषी थे, जिनके लिए साहित्य केवल लेखन नहीं, मनुष्य और समाज के बीच संवाद का माध्यम था। वे समर्थ आलोचक होने के साथ कवि, कथाकार, नाटककार, संपादक, शिक्षक, पुस्तकालयकर्मी और अद्भुत संगठनकर्ता भी थे। ज्ञान की गंभीरता और आत्मीय व्यवहार का ऐसा मेल उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता था कि जो भी उनके संपर्क में आया, उनके स्नेह से अछूता नहीं रहा। जन्म, परिवार और शिक्षा 04 सितम्बर 1933 को भागलपुर के भगवान पुस्तकालय में जन्मे डॉ. बेचन का जीवन आरंभ से ही ज्ञान और पुस्तकों के संसार से जुड़ा रहा। उनकी पैतृक भूमि सहरसा का लगमा गांव था। उनके पिता पंडित उग्र नारायण झा हिन्दी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान तथा प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य थे। पारिवारिक विद्वत्ता उन्हें विरासत में मिली लेकिन उन्होंने अपनी पहचान केवल विरासत के सहारे नहीं बनाई। स्वाध्याय, अध्यवसाय और कर्मठता से उन्होंने विद्वान पिता के विद्वान पुत्र होने की उक्ति को सार्थक किया। शिक्षक से कुलपति तक का सफर 1955 में हिन्दी से एमए करने के बाद 1963 में उन्होंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की और भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रथम डॉक्टरेट उपाधिधारी होने का गौरव पाया। भगवान पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष के रूप में उनके कार्यजीवन की शुरुआत हुई। इसके बाद मुरारका कॉलेज, सुल्तानगंज और मारवाड़ी कॉलेज, भागलपुर में अध्यापन किया। मारवाड़ी कॉलेज में वे व्याख्याता, रीडर, प्रोफेसर, हिन्दी विभागाध्यक्ष और प्राचार्य रहे। बाद में भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति पद को भी सुशोभित किया। 1996 में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए और 2000 तक इस पद पर रहे। आलोचना में मानवीय दृष्टि डॉ. बेचन की सबसे विशिष्ट पहचान हिन्दी के मौलिक समालोचक के रूप में बनी। उनकी आलोचना में विचार था, किंतु वैचारिक जड़ता नहीं; तर्क था, किंतु संवेदना का अभाव नहीं। वे प्रगतिशील और मार्क्सवादी दृष्टि से प्रभावित थे, पर किसी विचारधारा को साहित्य की अंतिम कसौटी नहीं मानते थे। उनके लिए साहित्य का केंद्र मनुष्य था। वे रचना को उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ में देखते थे, लेकिन उसके कलात्मक सौंदर्य और शाश्वत मानवीय मूल्यों की उपेक्षा नहीं करते थे। समरस आलोचना की पहचान इसी संतुलन ने उनकी आलोचना को विशिष्ट बनाया। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष अनिल सुलभ ने उनके बारे में कहा है कि उन्होंने ‘नीरस’ समझे जाने वाले साहित्यालोचन को समरसता प्रदान की। यह टिप्पणी उनकी आलोचना की प्रकृति को ठीक-ठीक सामने रखती है। उनकी भाषा में अकादमिक गंभीरता के साथ साहित्यिक लालित्य था। वे रचना का फैसला सुनाने के बजाय उसके भीतर प्रवेश करते थे और पाठक को भी उसके अर्थ-संसार तक ले जाते थे। नागार्जुन, पंत और प्रेमचंद पर उल्लेखनीय अध्ययन राजकमल प्रकाशन की प्रतिष्ठित त्रैमासिक पत्रिका ‘आलोचना’ में उनके लेख प्रकाशित होते रहे। शिवदान सिंह चौहान के संपादन काल में इसी पत्रिका में नागार्जुन पर उनका विस्तृत अध्ययन प्रकाशित हुआ। नागार्जुन की कविता में लोकजीवन, जनचेतना, भाषा और सामाजिक प्रतिबद्धता को उन्होंने जिस गंभीरता से देखा, वह हिन्दी आलोचना में उल्लेखनीय है। इसी प्रकार सुमित्रानंदन पंत पर उनका अध्ययन पंत-साहित्य को समझने की नई दृष्टि देता है। पंत को केवल प्रकृति और सौंदर्य का कवि मानने के बजाय उन्होंने उनकी वैचारिक और मानवीय यात्रा को भी रेखांकित किया। प्रेमचंद पर उनका आलोचनात्मक अध्ययन सामाजिक यथार्थ और साहित्यिक सौंदर्य के संतुलन का उदाहरण है। आलोचना की प्रमुख कृतियां उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों में ‘अध्ययन के विचार’, ‘आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य और चरित्र विकास’, ‘समकालीन साहित्य और समीक्षा’, ‘बिहार का साहित्य और साहित्यिक मानमूल्यों की प्रेरणा’ और ‘प्रेमचंद’ उल्लेखनीय हैं। ‘अध्ययन के विचार’ ने उन्हें आलोचक के रूप में व्यापक प्रतिष्ठा दी। उनकी दृष्टि में आलोचना रचना को खारिज करने का औजार नहीं, उसके भीतर छिपे अर्थ, सौंदर्य और मानवीय अनुभव को प्रकाशित करने का माध्यम थी। रचनाकार के रूप में भी विशिष्ट पहचान पर डॉ. बेचन केवल आलोचक नहीं थे। साहित्य में उनका प्रवेश कविता से हुआ और जीवन के अंतिम दौर तक सृजनात्मक लेखन से उनका मोह नहीं छूटा। उनकी चर्चित कहानी ‘भात’ 1957 में पत्रिका ‘कहानी’ में प्रकाशित हुई। निम्नवर्गीय मैथिल समाज के अभाव और पीड़ा को केंद्र में रखने वाली यह कहानी करुणा, सहजता और यथार्थ के कारण चर्चित हुई। इसमें भूख केवल पेट की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक विषमता और मनुष्य की गरिमा का प्रश्न बन जाती है। ‘भागलपुर भागता हुआ शहर’ की अलग पहचान ‘भागलपुर भागता हुआ शहर’ उनकी प्रयोगधर्मी गद्य-दृष्टि का दूसरा महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। मार्च 1971 में अमृत राय ने इसे प्रकाशित किया। इस चर्चित रचना में पत्रकारिता की तथ्यपरकता और साहित्य की संवेदनात्मक शक्ति का सुंदर मेल दिखाई देता है। बदलते शहर, सामाजिक जीवन और मनुष्य की बेचैनी को उन्होंने ऐसी शैली में व्यक्त किया, जो न तो पारंपरिक कहानी है और न महज रिपोर्ट। इसी मौलिकता ने हिन्दी गद्य में उन्हें अलग पहचान दी। कविता, नाटक और कहानी में भी योगदान ‘शहादत की शाम’ उनका चर्चित कविता-संग्रह था। ‘बसेरा’ नाटक भी विषय और संवाद की दृष्टि से लोकप्रिय हुआ और 1966 से 1969 के बीच रेडियो से श्रोताओं की मांग पर बार-बार प्रसारित किया गया। ‘इंसान की लाश’, ‘मेरी प्रिय कहानियां’, ‘चीन के मोर्चे पर’, ‘दो लघु उपन्यास’ और ‘जेल के अंतराल से’ जैसी कृतियाँ उनके रचनात्मक विस्तार को प्रमाणित करती हैं। अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों के संपादन के माध्यम से भी उन्होंने साहित्य की समृद्धि में योगदान दिया। भगवान पुस्तकालय को बनाया साहित्यिक केंद्र उनके व्यक्तित्व का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष भगवान पुस्तकालय से उनका संबंध था। उन्होंने इस संस्था को केवल पुस्तकों के संग्रह के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र बनाया। उनके संयुक्त सचिव के कार्यकाल से ही पुस्तकालय में राष्ट्रीय नेताओं से लेकर हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों का आगमन होने लगा था। तात्कालीन रेल मंत्री जगजीवन राम, राज्यपाल डॉ. जाकिर हुसैन और मुख्यमंत्री पंडित विनोदानंद झा के साथ हजारी प्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, डॉ. नामवर सिंह, शिवपूजन सहाय, गोपाल सिंह नेपाली, रामधारी सिंह दिनकर, विष्णु प्रभाकर, बलाईचांद मुखोपाध्याय ‘वनफूल’, डॉ. रामदयाल पांडेय, डॉ. खगेन्द्र ठाकुर, राबिन शॉ पुष्प और अनेक साहित्यकार पुस्तकालय से जुड़े। नई प्रतिभाओं के संरक्षक 1950 से 1990 तक भगवान पुस्तकालय भागलपुर की साहित्यिक गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बना रहा। इसमें डॉ. बेचन की सक्रियता की बड़ी भूमिका थी। वे नई प्रतिभाओं को पहचानते, उनकी रचनाएँ पढ़ते और समीक्षा के माध्यम से उन्हें तराशते थे। साहित्य को वे स्थापित नामों का बंद संसार नहीं मानते थे। उनका विश्वास था कि किसी भाषा का भविष्य नई प्रतिभाओं के विकास से तय होता है। पुस्तकालय आंदोलन के अग्रदूत पुस्तकालय आंदोलन से उनका जुड़ाव इसी व्यापक दृष्टि का विस्तार था। अनुज शास्त्री, डॉ. रामशोभित सिंह और रंग शाही के साथ मिलकर उन्होंने बिहार राज्य पुस्तकालय संघ के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1980 से जीवन के अंतिम समय तक वे इसके अध्यक्ष रहे। उन्होंने अपनी पैतृक संपत्ति ‘स्व. कुंजीलाल पं. उग्रनारायण योगमाया स्मारक पुस्तकालय’ को दान कर दी। पुस्तक और पुस्तकालय के प्रति ऐसी निष्ठा आज के समय में विशेष रूप से प्रेरक है। असाधारण संगठन क्षमता डॉ. बेचन की संगठन क्षमता असाधारण थी। वे जिस संस्था से जुड़े, उसे सक्रिय और जीवंत बनाने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते थे। शिक्षक के रूप में भी उन्होंने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया, बल्कि उनमें साहित्यिक संस्कार और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित की। उनके अनेक विद्यार्थी शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़े। इस अर्थ में उनका प्रभाव पुस्तकों से कहीं अधिक व्यापक था। आज भी प्रासंगिक है उनकी आलोचना आज हिन्दी आलोचना अनेक प्रकार के वैचारिक आग्रहों और तात्कालिक विवादों के बीच खड़ी है। ऐसे समय में डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ का पुनर्पाठ इसलिए आवश्यक है कि वे आलोचना के मूल उद्देश्य की याद दिलाते हैं—रचना के भीतर मनुष्य और उसके समय को पहचानना। उनकी आलोचना में असहमति है, पर कटुता नहीं; विचारधारात्मक स्पष्टता है, पर कट्टरता नहीं; तर्क है, पर संवेदना की उपेक्षा नहीं। साहित्य की अमूल्य विरासत 30 अगस्त 2004 को डॉ. बेचन इस दुनिया से विदा हुए। पीछे उन्होंने केवल पुस्तकें नहीं छोड़ीं, बल्कि एक जीवंत साहित्यिक संस्कार, संस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी और ज्ञान को समाज की साझी संपदा बनाने की दृष्टि छोड़ी। वे ऐसे साहित्यवेत्ता थे, जिनके पास पुस्तकीय ज्ञान के साथ जीवन के अनुभवों का सत्व था। पुण्यतिथि पर स्मरण का महत्व उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना किसी एक आलोचक को श्रद्धांजलि देना भर नहीं है। यह हिन्दी साहित्य की उस मानवीय परंपरा को याद करना है, जिसमें आलोचना विवेक है, साहित्य संवेदना है और पुस्तकालय समाज की साझा बौद्धिक पूंजी। डॉ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ की विरासत इसी त्रिवेणी में सुरक्षित है। हिन्दी साहित्य की राष्ट्रीय स्मृति में उनके समग्र कृतित्व का पुनर्मूल्यांकन आज समय की आवश्यकता है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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