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ग्लास्गो (स्कॉटलैंड)। साइकिल मैकेनिक की बेटी और आर्थिक तंगी से जूझते हुए खेल के मैदान तक पहुंची त्रिपुरा की 23 वर्षीय अस्मिता डे ने शानदार जुझारूपन का परिचय देते हुए कनाडा की हाइडी क्वाच को 2-1 से हराकर राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) 2026 में जूडो का स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनकर इतिहास रच दिया। हार की कगार से गोल्ड तक, फाइनल में दिखाई गजब की वापसी 48 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में अस्मिता की शुरुआत अच्छी नहीं रही। उन्होंने पहले युको गंवाया और फिर एक पेनाल्टी मिलने से कनाडाई खिलाड़ी मुकाबले में आगे निकल गई। लेकिन, अस्मिता ने दबाव में शानदार वापसी की। मुकाबले के बीच में स्कोर 1-1 से बराबर किया और निर्धारित समय में फैसला नहीं होने पर मैच गोल्डन स्कोर तक पहुंच गया। सडन-डेथ ओवरटाइम में अस्मिता ने निर्णायक हमला करते हुए दूसरा युको हासिल किया और ऐतिहासिक जीत अपने नाम कर ली। साइकिल मैकेनिक की बेटी से देश की गोल्डन गर्ल बनने तक का सफर दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता डे का बचपन आर्थिक तंगी में बीता। उनके पिता साइकिल मैकेनिक हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने बेटी के सपनों को उड़ान दी। दिलचस्प बात यह है कि अस्मिता ने शुरुआत जूडो से नहीं बल्कि 800 मीटर दौड़ से की थी। बाद में उनके पहले कोच ने उनकी प्रतिभा पहचानकर उन्हें जूडो की ओर प्रेरित किया। खेलो इंडिया ने बदली जिंदगी साल 2015 में अस्मिता त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल से जुड़ीं। नेशनल स्कूल गेम्स और खेलो इंडिया प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन के बाद 2018 में उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के भोपाल स्थित नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (एनसीओई) में प्रशिक्षण का मौका मिला। यहीं से उनकी अंतरराष्ट्रीय सफलता की मजबूत नींव पड़ी। लगातार जीतती रहीं अंतरराष्ट्रीय पदक कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड से पहले भी अस्मिता कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का तिरंगा बुलंद कर चुकी हैं। भारत को मिला जूडो का पहला कॉमनवेल्थ गोल्ड अस्मिता डे की इस जीत ने भारतीय खेल इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया है। वह कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो का स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। उनकी यह उपलब्धि न केवल भारतीय जूडो के लिए बड़ी कामयाबी है, बल्कि यह उन हजारों खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने का साहस रखते हैं।



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