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लंदन/ढाका। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने बांग्लादेश सरकार से पूर्व अवामी लीग से जुड़े नेताओं और अन्य राजनीतिक विरोधियों को बिना आरोप लंबे समय तक हिरासत में रखने की प्रथा तत्काल समाप्त करने, जेल में हुई मौतों की स्वतंत्र जांच कराने तथा निष्पक्ष सुनवाई और जमानत के अधिकार सुनिश्चित करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना सरकार से जुड़े कई नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को महीनों से बिना किसी औपचारिक आरोप के हिरासत में रखा गया है जबकि कई बुजुर्ग बंदियों की जेल में मौत भी हो चुकी है। हसीना सरकार के पतन के बाद शुरू हुई व्यापक गिरफ्तारियां एचआरडब्ल्यू के अनुसार, अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद हजारों अवामी लीग नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से कई लोगों को प्रदर्शनकारियों की हत्या जैसे गंभीर आरोपों में हिरासत में लिया गया लेकिन बड़ी संख्या में बंदियों के खिलाफ अब तक कोई औपचारिक आरोप तय नहीं किए गए हैं।संगठन का कहना है कि सैकड़ों लोग आज भी बिना आरोप जेल में बंद हैं। 'सुधार का वादा किया, अब उसे निभाएं' ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया निदेशक एलेन पीयरसन ने कहा कि एक सरकार के बाद दूसरी सरकार राजनीतिक विरोधियों को बिना पर्याप्त साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया के जेल भेजती रही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने न्यायिक सुधार का वादा किया था और इसकी शुरुआत मनमानी हिरासत खत्म करने से होनी चाहिए। जेल में 10 नेताओं की मौत का दावा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि फरवरी 2026 में नई सरकार बनने के बाद से अब तक अवामी लीग के कम से कम 10 नेताओं या पदाधिकारियों की जेल में मौत हो चुकी है। इनमें अधिकांश ऐसे लोग थे जिनके खिलाफ किसी अपराध का औपचारिक आरोप भी तय नहीं किया गया था। संगठन ने इन सभी मौतों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। जमानत मिलते ही दर्ज हो जाते हैं नए मुकदमे रिपोर्ट में न्यायिक प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। एचआरडब्ल्यू के अनुसार, कई मामलों में जब अदालतें आरोपियों को जमानत देती हैं तो पुलिस उनके खिलाफ नया मामला दर्ज कर देती है, जिससे उनकी रिहाई नहीं हो पाती।वकीलों का कहना है कि अब वे कई बंदियों को जमानत याचिका दाखिल करने की सलाह भी नहीं देते क्योंकि हर बार नया मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश का मामला बना उदाहरण रिपोर्ट में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एबीएम खैरुल हक (82) का मामला भी उल्लेखित है। उन्हें जुलाई 2025 में एक प्रदर्शनकारी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद कुछ महीनों में उनके खिलाफ हत्या और भ्रष्टाचार समेत कई नए मामले दर्ज किए गए। कई बार हाई कोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद रिहाई से पहले नए मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल में ही रखा गया। अंततः अगस्त 2026 में सर्वोच्च अदालत के हस्तक्षेप के बाद उनकी रिहाई हो सकी। 22 महीने से बिना आरोप जेल में बंद कई बुजुर्ग रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व सलाहकार डॉ. तौफीक-ए-इलाही चौधरी (81) और पूर्व सांसद कमाल अहमद मजूमदार (75) जैसे कई बुजुर्ग नेता करीब 22 महीने से बिना आरोप हिरासत में हैं। संगठन का कहना है कि लंबी हिरासत के दौरान कई बंदियों की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ गई लेकिन उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा और जमानत नहीं मिली। बीमार बंदियों के इलाज पर भी सवाल एचआरडब्ल्यू ने आरोप लगाया कि कई हिरासत में बंद बुजुर्ग नेताओं को उचित इलाज नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट में 75 वर्षीय लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता शहरियार कबीर तथा हृदय रोग से पीड़ित आरएएम ओबैदुल मुक्तादिर चौधरी का भी उल्लेख किया गया है। संगठन ने कहा कि गंभीर रूप से बीमार बंदियों को आवश्यक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जेल में मौतों की स्वतंत्र जांच की मांग रिपोर्ट में पूर्व सांसद रमेश चंद्र सेन और अवामी लीग नेता एसएम जियाउल हक जिया की हिरासत के दौरान हुई मौत का भी जिक्र किया गया है। परिजनों का आरोप है कि उन्हें पर्याप्त इलाज और समय पर जमानत नहीं मिली। एचआरडब्ल्यू ने सरकार से हिरासत में हुई सभी मौतों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। नए मानवाधिकार आयोग विधेयक पर भी आपत्ति संगठन ने बांग्लादेश सरकार के प्रस्तावित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग विधेयक पर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो नया आयोग कथित मनमानी गिरफ्तारियों की जांच नहीं कर सकेगा। एचआरडब्ल्यू ने इसे मानवाधिकार संरक्षण के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है। 'प्री-ट्रायल हिरासत अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं' ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के अनुसार मुकदमे से पहले हिरासत केवल असाधारण परिस्थितियों में और सीमित अवधि के लिए होनी चाहिए। प्रत्येक बंदी को शीघ्र सुनवाई, निष्पक्ष न्याय और जमानत पर विचार का अधिकार मिलना चाहिए। संगठन ने सरकार से अपील की है कि बिना आरोप लंबे समय तक लोगों को जेल में रखने की व्यवस्था समाप्त की जाए और न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाया जाए।



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