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पेरिस/लंदन। वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों के विस्तार और बढ़ती सेटलर हिंसा को लेकर यूरोप और कनाडा के एक बड़े समूह ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि मौजूदा हालात दो-राष्ट्र समाधान की संभावना को नुकसान पहुंचा रहे हैं और अब ऐसे कदमों को रोकने के लिए ठोस कार्रवाई की जरूरत है। इसके तहत कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, स्पेन, स्वीडन और ब्रिटेन ने अवैध मानी जाने वाली बस्तियों से जुड़े सामान के व्यापार पर राष्ट्रीय और/या यूरोपीय प्रतिबंधों को लागू करने अथवा उनका समर्थन करने की मंशा जताई है। ई1 परियोजना को बताया ‘अस्वीकार्य’ फ्रांसीसी विदेश मंत्रालय की ओर से मंगलवार को जारी संयुक्त बयान में इजरायल सरकार की वेस्ट बैंक संबंधी नीतियों पर गंभीर चिंता जताई गई है। इसमें खास तौर पर ई1 सेटलमेंट परियोजना के लिए टेंडर प्रकाशित करने के फैसले को अस्वीकार्य बताया गया। बयान में कहा गया कि वेस्ट बैंक में बस्तियों का विस्तार और सेटलर हिंसा अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच रही है और इससे दो-राष्ट्र समाधान की संभावना कमजोर हो रही है। इससे पहले 21 अगस्त 2026 को ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, कनाडा, नॉर्वे, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, स्वीडन और बेल्जियम के नेताओं ने भी ई1 परियोजना के लिए निर्माण टेंडर जारी करने को अस्वीकार्य बताते हुए कहा था कि इससे वेस्ट बैंक की भौगोलिक निरंतरता प्रभावित होगी और दो-राष्ट्र समाधान को नुकसान पहुंचेगा। 12 देशों ने व्यापार प्रतिबंधों की दिशा में बढ़ाए कदम संयुक्त बयान में कहा गया है कि कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, स्पेन, स्वीडन और ब्रिटेन अपने-अपने राष्ट्रीय कानूनों और प्रक्रियाओं के तहत ऐसे सामान के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने अथवा यूरोपीय स्तर पर प्रतिबंधों का समर्थन करने की दिशा में कदम उठाने के इच्छुक हैं, जो उन बस्तियों से जुड़ा हो जिन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध माना जाता है। कुछ देश इन उपायों के साथ अन्य विकल्पों पर भी सक्रिय रूप से विचार कर रहे हैं। ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा ने दूसरे देशों की कार्रवाई का किया स्वागत बयान में ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा ने आयरलैंड, स्पेन, नीदरलैंड, नॉर्वे और बेल्जियम की ओर से पहले उठाए गए कदमों का स्वागत किया है। इन तीनों देशों ने यह भी कहा कि वे सेटलमेंट से जुड़े सामान के व्यापार पर रोक लगाने के लिए अपने राष्ट्रीय उपाय आगे बढ़ाएंगे यानी संयुक्त बयान केवल राजनीतिक आपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक और व्यापारिक दबाव की दिशा में भी बढ़ते कदमों का संकेत देता है। ‘फिलिस्तीनी जमीन के विलय जैसे कदम मंजूर नहीं’ विदेश मंत्रियों ने कहा कि वे फिलिस्तीनी भूमि के विलय के समान किसी भी कार्रवाई और फिलिस्तीनी आबादी के जबरन विस्थापन का दृढ़ता से विरोध करते हैं। बयान में दो-राष्ट्र समाधान को बचाने और न्यायपूर्ण तथा स्थायी शांति की दिशा में कार्रवाई करने का संकल्प दोहराया गया है। इसके लिए जुलाई 2025 में अपनाए गए न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन के सिद्धांतों का हवाला दिया गया है। क्या है ‘न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन’ न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन 29 जुलाई 2025 को फिलिस्तीन प्रश्न के शांतिपूर्ण समाधान और दो-राष्ट्र व्यवस्था को लागू करने पर आयोजित उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का परिणाम था, जिसकी सह-अध्यक्षता फ्रांस और सऊदी अरब ने की थी। इस घोषणा में 1967 की सीमाओं के आधार पर एक स्वतंत्र, संप्रभु और भौगोलिक रूप से जुड़ा फिलिस्तीनी राज्य स्थापित करने तथा इजरायल और फिलिस्तीन के शांति और सुरक्षा के साथ साथ रहने की दिशा में कदम उठाने पर जोर दिया गया था। मौजूदा संयुक्त बयान इसी राजनीतिक ढांचे को आगे बढ़ाने की बात करता है। इजरायल से बस्तियों का विस्तार तुरंत रोकने की मांग संयुक्त बयान में इजरायल सरकार से सेटलमेंट विस्तार और नागरिक प्रशासनिक शक्तियों के विस्तार को तत्काल रोकने की मांग की गई है। इसके साथ ही सेटलर हिंसा के मामलों में जवाबदेही तय करने और इजरायली सुरक्षा बलों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करने की बात कही गई है। इस हिस्से में बयान का स्वर खासा कड़ा है और इसमें केवल नीति बदलने की मांग नहीं बल्कि कथित हिंसा और सुरक्षा कार्रवाई के मामलों में जवाबदेही पर भी जोर दिया गया है। ई1 क्षेत्र इतना संवेदनशील क्यों है ई1 क्षेत्र पूर्वी यरुशलम के पास वेस्ट बैंक में स्थित है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक यहां पिछले वर्ष 3,401 आवासीय इकाइयों की योजनाओं को मंजूरी दी गई थी, जो माले अदुमिम बस्ती को कब्जे वाले पूर्वी यरुशलम से जोड़ सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) मानवाधिकार कार्यालय का कहना है कि इस निर्माण से वेस्ट बैंक की भौगोलिक निरंतरता पर गंभीर असर पड़ सकता है और एक व्यवहार्य, जुड़े हुए फिलिस्तीनी राज्य की संभावना कमजोर हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने अगस्त 2025 में भी ई1 में 3,400 से अधिक आवासीय इकाइयों को मंजूरी दिए जाने की निंदा करते हुए चेताया था कि परियोजना उत्तर और दक्षिण वेस्ट बैंक को अलग कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय कानून पर क्या है संयुक्त राष्ट्र का रुख संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 का हवाला देते हुए यूएन की हालिया रिपोर्टों में कहा गया है कि 1967 से कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों (पूर्वी यरुशलम समेत) में इजरायली बस्तियों की स्थापना की कोई कानूनी वैधता नहीं है और वे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन तथा दो-राष्ट्र समाधान के रास्ते में बड़ी बाधा हैं। इजरायल लंबे समय से बस्तियों और वेस्ट बैंक की स्थिति पर कई अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्याख्याओं से असहमति जताता रहा है और अपनी सुरक्षा तथा ऐतिहासिक दावों पर जोर देता है। इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को भी मान्यता संयुक्त बयान पूरी तरह एकतरफा सुरक्षा दृष्टिकोण नहीं अपनाता। इसमें इजरायल के वैध सुरक्षा हितों को मान्यता दी गई है। साथ ही 07 अक्टूबर को हमास द्वारा किए गए आतंकवादी हमले की फिर से निंदा की गई है और यहूदी-विरोधी हिंसा तथा घृणा से लड़ने की प्रतिबद्धता दोहराई गई है। बयान में यह स्पष्ट किया गया है कि इजरायल की सुरक्षा और फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ‘इजरायल और एक संप्रभु फिलिस्तीन साथ-साथ रहें’ इन देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों के अनुरूप दो-राष्ट्र समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। उनके मुताबिक समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें इजरायल और एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राज्य सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर शांति, सुरक्षा और आपसी मान्यता के साथ एक-दूसरे के बगल में रह सकें। यही विचार जुलाई 2025 के न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन और संयुक्त राष्ट्र के दो-राष्ट्र समाधान संबंधी ढांचे का केंद्रीय तत्व भी रहा है। अब विवाद केवल कूटनीतिक नहीं, व्यापार तक पहुंचा इस संयुक्त बयान का सबसे अहम पहलू यह है कि पश्चिमी देशों की नाराजगी अब केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं दिख रही। बस्तियों से जुड़े सामान पर व्यापार प्रतिबंधों की तैयारी इस बात का संकेत है कि कुछ यूरोपीय देश और कनाडा अब आर्थिक उपायों को भी विदेश नीति के साधन के रूप में इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि इन प्रस्तावित कदमों का वास्तविक स्वरूप प्रत्येक देश के घरेलू कानून और यूरोपीय प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा। दो-राष्ट्र समाधान पर बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव ई1 परियोजना, सेटलमेंट विस्तार और फिलिस्तीनी क्षेत्रों की भौगोलिक निरंतरता को लेकर पिछले एक वर्ष में अंतरराष्ट्रीय चिंता लगातार बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों का तर्क है कि जमीन पर तेजी से बदलती स्थिति भविष्य में स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीनी राज्य की संभावना को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है। मौजूदा संयुक्त बयान इसी चिंता को एक कदम आगे ले जाता है- बस्तियों पर तत्काल रोक, हिंसा पर जवाबदेही और जरूरत पड़ने पर व्यापारिक प्रतिबंध , तीनों को एक साथ जोड़ते हुए। इससे साफ है कि वेस्ट बैंक अब केवल इजरायल-फिलिस्तीन विवाद का भू-राजनीतिक मोर्चा नहीं बल्कि यूरोप और कनाडा की व्यापार तथा विदेश नीति के एजेंडे का भी अहम मुद्दा बनता जा रहा है।



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