Full Story
माटी का श्रृंगार : श्रृंखला 5 नोएडा (यूपी)। "साहित्य उन लोगों की आवाज़ है, जिनकी आवाज़ इतिहास अक्सर नहीं सुनता। कुम्हार उन्हीं मौन पात्रों में से एक है, जिसके हाथों की मिट्टी ने कवियों को दर्शन दिया, कथाकारों को जीवन दिया और लोकगीतों को आत्मा दी।" यदि भारतीय साहित्य से मिट्टी को निकाल दिया जाए, तो उसकी सबसे सोंधी गंध समाप्त हो जाएगी। हमारी कविता में खेत हैं, वर्षा है, नदी है, गाँव है, बैलगाड़ी है, पीपल है, चूल्हा है और इन सबके बीच कहीं न कहीं एक कुम्हार भी है। वह बहुत कम बोलता है, पर उसकी उपस्थिति हर युग में महसूस होती है। उसकी कुटिया भले ही साहित्य का मुख्य मंच न बनी हो, लेकिन उसकी मिट्टी ने अनगिनत रचनाओं को अर्थ दिया है। साहित्य ने कुम्हार को केवल श्रमिक नहीं माना। उसने उसे समय का दार्शनिक, धैर्य का साधक और सृजन का मौन कलाकार माना। कबीर : जहां मिट्टी दर्शन बन जाती है हिंदी साहित्य में यदि किसी ने मिट्टी को सबसे अधिक जीवंत बनाया, तो वे संत कबीर थे। कबीर का संसार करघे, चाक, नदी, धूल, चूल्हे और श्रम से बना संसार है। वे राजमहलों की नहीं, आम जन की भाषा बोलते हैं। इसलिए उनके प्रतीक भी लोकजीवन से आते हैं। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ, "गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥" कबीर के इस दोहे का अर्थ नई पीढ़ियाँ शायद ही जानती हों। गुरु है कुम्हार और शिष्य है मिट्टी। जिस प्रकार कुम्हार भीतर से हाथ का सहारा देकर, बाहर से चोट मारकर मटके तथा बर्तनों को गढ़ता है, ठीक उसी प्रकार गुरु भी शिष्य के अवगुणों को निकालकर, उन्हें ज्ञानी बनने का मार्ग दिखाते हैं। "मन भी मिट्टी, तन भी मिट्टी, मिट्टी में सब समाना रे। नाम ही सच्चा साथ चले, बाकी सब बहाना रे।।" इन पंक्तियों में कुम्हार केवल कारीगर नहीं रह जाता। वह मनुष्य बन जाता है, मिट्टी प्रकृति बन जाती है और चाक समय बन जाता है। यह दोहा मृत्यु का भय नहीं जगाता, यह जीवन की विनम्रता सिखाता है। कबीर की माने तो माटी ही हमारे अस्तित्व का आधार है। मिट्टी शाश्वत है, जिसे कुम्हार आकर देकर उसे उपयोगी बनाता है और सौंदर्य भरता है। लोकगीतों में जीवित कुम्हार भारत के गांवों में कुम्हार का नाम भले कम लिया गया हो, पर उसका श्रम लोकगीतों में बार-बार लौटता है। कहीं नववधू कलश के साथ गृहप्रवेश करती है, कहीं सावन के गीतों में मटके का उल्लेख आता है, कहीं दीपावली के अवसर पर मिट्टी के दीयों का गुणगान होता है। भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, बुंदेली, मालवी और हरियाणवी लोकधुनों में मिट्टी के बर्तनों का उल्लेख केवल वस्तु के रूप में नहीं, जीवन के उत्सव के रूप में मिलता है। लोकगीत हमें बताते हैं कि कुम्हार गांव की अर्थव्यवस्था का हिस्सा भर नहीं था, वह लोकसंस्कृति का भी अनिवार्य पात्र था और है। प्रेमचंद और श्रम की गरिमा मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में कुम्हार का चरित्र और उसकी उपस्थिति केवल एक जाति या पेशे तक सीमित नहीं है, बल्कि वह ग्रामीण श्रम-संस्कृति, आत्मनिर्भरता और सामाजिक ताने-बाने का एक अनिवार्य हिस्सा है। कुम्हार ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उस 'जजमानी व्यवस्था' का मुख्य आधार था, जो अपनी मेहनत से मिट्टी को उपयोगी बर्तनों में बदलता था। प्रेमचंद के साहित्य में कुम्हार (जैसे उनके पैतृक गाँव लम्ही की पृष्ठभूमि में भी कुम्हारों की बड़ी भूमिका थी) एक स्वाभिमानी, कर्मठ और निश्छल श्रमजीवी के रूप में उभरता है। उनके साहित्य में कुम्हार, बढ़ई, लोहार और किसान मिलकर एक आत्मनिर्भर ग्राम समाज का निर्माण करते हैं। 'गोदान' और अन्य उपन्यासों में यह स्पष्ट होता है कि कुम्हार द्वारा बनाए गए मिट्टी के बर्तन किसानों के दैनिक जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। उनके कथा-साहित्य (जैसे 'ईदगाह') में कुम्हार जैसे शिल्पकार, समाज में धर्म और जाति की सीमाओं से परे मानवीय रिश्तों को मजबूत करते हैं। ईद के मेले में हामिद द्वारा अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदने की प्रसिद्ध घटना, कुम्हार और आम जनता के जीवन की सादगी को दर्शाती है। रेणु के गांवों की धड़कन यदि प्रेमचंद ने गांव का यथार्थ लिखा, तो फणीश्वरनाथ 'रेणु' ने उसकी धड़कन लिखी। रेणु की रचनाओं में मिट्टी केवल धरती नहीं, चरित्र है। उनके गाँवों में कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, धोबी और किसान मिलकर समाज की जीवित संरचना बनाते हैं। वहाँ हर पेशा एक सांस्कृतिक भूमिका निभाता है। कुम्हार के चाक की आवाज़, भट्ठे की तपिश और बारिश के बाद भीगी मिट्टी की सुगंध, ये सब रेणु के ग्रामीण संसार की आत्मा हैं। उनके यहाँ मिट्टी केवल पदार्थ नहीं, स्मृति है। गाँव की पहचान है। मनुष्य और प्रकृति के बीच अदृश्य संवाद है। महादेवी वर्मा : श्रम का मौन सौंदर्य महादेवी वर्मा ने अपने संस्मरणों और रेखाचित्रों में उन लोगों को केंद्र में रखा, जो समाज की चमकदार रोशनी से दूर रहते हैं। उनकी दृष्टि हमेशा उन हाथों तक जाती है, जो सृजन करते हैं लेकिन प्रसिद्धि नहीं पाते। यदि उनके साहित्य की संवेदना को समझा जाए, तो कुम्हार उसी मौन श्रम का प्रतिनिधि प्रतीत होता है, एक ऐसा कलाकार, जिसकी कला समाज को प्रकाश देती है, पर स्वयं अक्सर अँधेरे में रह जाती है। उनकी रचना "स्मृति की रेखाएँ' (1943) में 'बदलू' नामक कुम्हार के माध्यम से ग्रामीण शिल्पकारों की मर्मस्पर्शी स्थिति को उकेरा है। अभावों के कारण असमय आई वृद्धावस्था और कमजोर शरीर के बावजूद उसका अपने काम में लगे रहना समाज के श्रमजीवियों की विवशता को चित्रित करता है। दिनकर और श्रम का गौरव रामधारी सिंह 'दिनकर' ने भारतीय साहित्य में श्रम को सम्मान का स्थान दिया। उनके लिए राष्ट्र केवल सत्ता से नहीं, श्रमिकों के परिश्रम से बनता है। यदि किसान धरती पर अन्न उगाता है, तो कुम्हार उसी धरती को उपयोगी रूप देता है। एक भूख मिटाता है, दूसरा जीवन को व्यवस्थित करता है। दोनों मिलकर सभ्यता का आधार रचते हैं। इस दृष्टि से कुम्हार केवल हस्तशिल्पी नहीं, राष्ट्र-निर्माता है। कुम्हार का पसीना और उसकी मेहनत समाज को जीवन देती है, इसलिए दिनकर के लिए कुम्हार का श्रम पूजनीय है। आधुनिक साहित्य और कुम्हार आधुनिक हिंदी साहित्य में ऐसे कई प्रमुख कवि और लेखक हैं जिन्होंने कुम्हार, उसकी चाक और माटी के प्रतीक को अपनी रचनाओं का मुख्य आधार बनाया है। इन साहित्यकारों ने पारंपरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर कुम्हार को समकालीन चुनौतियों, श्रम के सम्मान और मानवीय दर्शन से जोड़कर देखा है। अमर दलपुरा प्रमुख रचना, "गंगाराम कुम्हार" आधुनिक साहित्य का एक बेहतरीन उदाहरण है। अनूप मिश्रा 'अनुभव' की कविता "कुम्हार" शिल्पकारों के जीवन का जीवंत दस्तावेज़ है। रश्मि सिंघा की चर्चित कविता "कुम्हार की चाक पर" मानवीय जीवन दर्शन को दर्शाती है। केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन जैसे साहित्यकार प्रगतिशील कवियों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक जनवादी लेखक कुम्हार को 'सर्वहारा वर्ग' का प्रतिनिधि मानते हैं। चाक : साहित्य का सबसे गहरा रूपक साहित्य प्रतीकों में सोचता है। और यदि भारतीय साहित्य में किसी साधारण वस्तु ने असाधारण अर्थ ग्रहण किया है, तो वह कुम्हार का चाक है। चाक घूमता है, पर वहीं रहता है। समय भी ऐसा ही है। वह निरंतर आगे बढ़ता दिखाई देता है, पर अपने भीतर अतीत, वर्तमान और भविष्य, तीनों को समेटे रहता है। चाक पर चढ़ी मिट्टी का प्रत्येक आकार हमें यह बताता है कि जीवन स्थिर नहीं है। परिवर्तन ही उसका स्वभाव है। एक ही मिट्टी कभी घड़ा बनती है, कभी दीपक, कभी सुराही, कभी कलश और कभी किसी बच्चे का खिलौना। रूप बदलते रहते हैं, तत्व वही रहता है। यही भारतीय दर्शन है। यही साहित्य का सत्य भी है। कुम्हार : एक अनलिखी कविता कई कविताएं लिखी जाती हैं। कुछ कविताएं जी जाती हैं। कुम्हार का जीवन दूसरी श्रेणी में आता है। उसकी हर सुबह एक नई पंक्ति है। हर घड़ा एक नया छंद। हर दीपक एक नई उपमा। हर मटका एक नई कहानी। वह शब्दों से नहीं लिखता, मिट्टी से लिखता है। उसकी रचनाएं कागज़ पर नहीं छपतीं, वे घरों में पानी बनकर उतरती हैं, मंदिरों में आस्था बनकर सजती हैं, पर्वों में प्रकाश बनकर जलती हैं और बच्चों की मुस्कान बनकर खिल उठती हैं। "इतिहास राजाओं के नाम याद रखता है, पर साहित्य उन हाथों को अमर कर देता है जिनसे सभ्यता आकार लेती है। कुम्हार उन्हीं मौन सर्जकों में से एक है, जिसकी हथेलियों की माटी ने कवियों को दर्शन दिया, कथाकारों को कथानक दिया और लोकगीतों को आत्मा।" शायद इसीलिए भारतीय साहित्य ने कुम्हार को कभी केवल पेशे से नहीं पहचाना। उसने उसे सृजन के उस अनाम कवि के रूप में देखा, जिसकी सबसे बड़ी कविता उसका अपना जीवन है। उसकी हथेलियों में धरती बोलती है, उसके चाक पर समय घूमता है और उसकी भट्ठी में केवल मिट्टी नहीं पकती, वहाँ हर युग में सभ्यता एक बार फिर नया जन्म लेती है। (क्रमशः)



Comments
0