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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला 14 नोएडा (यूपी)। एक समय था, जब किसी भी भारतीय गांव की सुबह कुम्हार के चाक की घरघराहट से शुरू होती थी। वह आवाज़ केवल मिट्टी के घूमने की नहीं थी, वह गांव की अर्थव्यवस्था की धड़कन थी। बरसात से पहले बीज रखने के लिए बड़े मटके बनते थे। गर्मी आने से पहले घड़ों और सुराहियों का ढेर तैयार होता था। सावन में बच्चों के लिए मिट्टी के खिलौने बनते थे। शरद आते-आते दीपावली के दीयों की कतारें पूरे आंगन को रोशनी से भर देती थीं। विवाह हो या यज्ञ, गृहप्रवेश हो या छठ, जन्म हो या अंतिम संस्कार... हर संस्कार में कुम्हार की उपस्थिति अनिवार्य थी। उस समय मिट्टी का बर्तन केवल एक वस्तु नहीं था, वह जीवन का हिस्सा था। लेकिन समय कभी एक-सा नहीं रहता। चाक घूमता है, तो दिशा भी बदलती है। और एक दिन ऐसा आया, जब उसी चाक की गति धीमी पड़ने लगी। बाज़ार ने केवल सामान नहीं बदला, जीवन-दर्शन भी बदल दिया औद्योगिक क्रांति ने मशीनों को जन्म दिया। मशीनों ने उत्पादन बढ़ाया। उत्पादन ने बाज़ार बदला। और बाज़ार ने मनुष्य की पसंद बदल दी। धीरे-धीरे स्टील के बर्तन घरों में आने लगे। फिर एल्यूमिनियम आया। उसके बाद प्लास्टिक ने लगभग हर घर में जगह बना ली। मिट्टी का घड़ा अब 'आवश्यकता' नहीं रहा, 'विकल्प' बन गया। सुराही की जगह रेफ्रिजरेटर ने ले ली। दीयों की जगह बिजली की झालरों छीन ली। कुल्हड़ की जगह प्लास्टिक और कागज़ के कप आ गए। यह केवल वस्तुओं का परिवर्तन नहीं था। यह जीवन-शैली का परिवर्तन था। सबसे पहले बदला स्वाद, फिर संवेदना मटके का पानी केवल ठंडा नहीं होता था। उसमें मिट्टी की सोंधी महक होती थी। कुल्हड़ में चाय केवल पेय नहीं रहती थी, वह धरती का स्वाद बन जाती थी। मिट्टी के बर्तन में पकी दाल की सुगंध अलग होती थी। लेकिन सुविधा ने स्वाद को पीछे छोड़ दिया। तेज़ी ने धैर्य को पीछे छोड़ दिया। उपयोगिता ने आत्मीयता को पीछे छोड़ दिया। और देखते ही देखते मिट्टी का संसार सिकुड़ने लगा। टूटते चाक, बदलते पेशे आज देश के अनेक गांवों में ऐसे कुम्हार मिल जाएंगे जिनके घरों में चाक तो है, लेकिन महीनों से नहीं घूमा।कुछ रिक्शा चलाने लगे। कुछ दिहाड़ी मज़दूर बन गए।कुछ ईंट-भट्ठों में काम करने लगे। कुछ शहरों की निर्माण स्थलों पर पहुंच गए। नई पीढ़ी ने साफ़ शब्दों में कहा, "इस काम में मेहनत बहुत है, कमाई बहुत कम।" यह केवल आर्थिक निर्णय नहीं था। यह सदियों पुरानी परंपरा के टूटने की शुरुआत थी। जब बेटा पिता का चाक छोड़ देता है, तब केवल एक परिवार का पेशा नहीं बदलता, एक सांस्कृतिक धरोहर भी धीरे-धीरे मौन हो जाती है। मिट्टी महंगी नहीं हुई, जीवन महंगा हो गया लोग अक्सर सोचते हैं कि कुम्हार की सबसे बड़ी समस्या मिट्टी है। सच इससे कहीं अधिक जटिल है। मिट्टी आज भी धरती में है। लेकिन अच्छी मिट्टी तक पहुंचना कठिन होता जा रहा है। नदी किनारों पर प्रतिबंध हैं। खेती की ज़मीन कम हो रही है। भट्ठा जलाने के लिए ईंधन महंगा है। परिवहन महंगा है। बाज़ार दूर है। और सबसे बड़ी बात, हाथों के श्रम का उचित मूल्य नहीं है। एक घड़ा बनाने में कई चरणों का श्रम लगता है, मिट्टी लाना। उसे छानना। गूंथना। चाक पर चढ़ाना। सुखाना।भट्ठे में पकाना। बाज़ार तक पहुंचाना। फिर भी उसका मूल्य अक्सर इतना नहीं मिलता कि परिवार की बुनियादी ज़रूरतें सहजता से पूरी हो सकें। यहीं से कारीगर का आत्मविश्वास टूटने लगता है। जब त्योहार भी बदल गए दीपावली कभी कुम्हारों का सबसे बड़ा मौसम होती थी। पूरा परिवार महीनों पहले से दीये बनाने में जुट जाता था। आंगन में मिट्टी के हजारों दीप कतारबद्ध रखे रहते। उन दीपों में केवल तेल भरने की जगह नहीं होती थी, उनमें पूरे परिवार की उम्मीदें भरी होती थीं। आज भी दीये बिकते हैं, लेकिन उनके सामने मशीनों से बने सस्ते सजावटी उत्पादों की लंबी कतार खड़ी है। बाज़ार अब भावना से नहीं, प्रतिस्पर्धा से चलता है। और प्रतिस्पर्धा में सबसे पहले हारता है, हस्तशिल्प। प्लास्टिक की चकाचौंध में गुम हुई मिट्टी एक समय ऐसा लगा था कि मिट्टी हार गई है। बाज़ार की चमक के सामने उसका सोंधापन फीका पड़ गया है। मशीनों की गति ने हाथों की लय को पीछे छोड़ दिया है। प्लास्टिक की चकाचौंध ने मिट्टी की सादगी को ढंक लिया है। लेकिन इतिहास का एक नियम है, जो चीज़ मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन बनाती है, वह देर-सबेर फिर लौटती है। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया ने एक कठिन सच स्वीकार किया। सुविधा के नाम पर जिस प्लास्टिक को आधुनिकता का प्रतीक माना गया था, वही नदियों, समुद्रों, खेतों और अंततः मनुष्य के शरीर तक पहुंच चुका था। समुद्री जीवों के पेट में प्लास्टिक मिला, खेतों की मिट्टी में सूक्ष्म प्लास्टिक कण मिले और वैज्ञानिकों ने मानव रक्त तक में उनके अंश खोज लिए। तब पहली बार आधुनिक सभ्यता ने स्वयं से प्रश्न पूछा, क्या विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन है, या प्रकृति के साथ संतुलन भी? इस प्रश्न का उत्तर किसी प्रयोगशाला ने नहीं दिया। उत्तर सदियों से भारतीय गांवों के आंगनों में रखा था, एक मटका, एक सुराही, एक कुल्हड़ और एक मिट्टी का दीपक। कला तब तक जीवित रहती है, जब तक कलाकार जीवित रहता है सवाल केवल यह नहीं कि मिट्टी के बर्तन बिक रहे हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या कुम्हार का बेटा और बेटी इस कला को अपनाना चाहते हैं? यदि उत्तर "नहीं" है, तो समस्या बाज़ार से कहीं बड़ी है। किसी भी परंपरा की मृत्यु तब नहीं होती जब उसकी वस्तुएं बिकना बंद हो जाएं, उसकी मृत्यु तब होती है जब अगली पीढ़ी उसे सीखना छोड़ दे। इसलिए आवश्यकता केवल उत्पाद बेचने की नहीं, बल्कि शिल्प को सम्मान देने की भी है। जब समाज किसी शिल्पी को केवल विक्रेता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षक मानने लगेगा, तभी यह परंपरा स्थायी रूप से बचेगी।