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मोतिहारी। आधुनिक दुनिया जहां विकास की तेज रफ्तार में प्रकृति से लगातार कुछ न कुछ छीनती जा रही है वहीं बिहार के पश्चिम चंपारण के जंगलों से सटे थारू गांवों ने धरती के साथ अपने रिश्ते की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसमें विकास से पहले जीवन और जीवन से पहले प्रकृति का सम्मान दिखाई देता है। यहां प्रकृति को बचाने के लिए कोई सरकारी आदेश नहीं बल्कि आस्था, परंपरा और सामुदायिक अनुशासन गांव की रफ्तार को 48 घंटे के लिए थाम देता है। वाल्मीकिनगर क्षेत्र की संतपुर-सोहरिया पंचायत में थारू समाज ने अपने पारंपरिक ‘बरना पर्व’ के तहत सोमवार से 48 घंटे का ‘ग्रीन लॉकडाउन’ लागू किया है। इस दौरान खेतों में हल नहीं चलेंगे, मजदूरी नहीं होगी, अनावश्यक आवाजाही बंद रहेगी और बाहरी लोगों के प्रवेश पर भी रोक रहेगी। पेड़ की पत्ती, घास या एक तिनका तक तोड़ना वर्जित है। यह मानो प्रकृति के लिए मनुष्य द्वारा लिया गया दो दिनों का मौन है, धरती सांस ले, हरियाली अपनी जड़ें मजबूत करे और नवांकुर बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के अपना जीवन पा सकें। जब गांव ने कहा, अब दो दिन धरती के नाम बरना पर्व के दौरान थारू समाज की जीवन-व्यवस्था जैसे कुछ क्षणों के लिए पीछे हट जाती है और प्रकृति केंद्र में आ जाती है। खेत शांत हैं, पगडंडियां सूनी हैं और गांव की सीमाओं पर पहरा है। रोजमर्रा की आपाधापी के बीच यह दृश्य अपने आप में एक आध्यात्मिक संदेश देता है, प्रकृति केवल संसाधन नहीं, जीवन की सहयात्री है। थारू समाज की मान्यता है कि मानसून धरती के नवसृजन का समय है। बारिश के बाद जंगलों में नई घास, वनस्पतियां और पौधे जन्म लेते हैं। ऐसे समय में मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो, इसी भावना से बरना पर्व के दौरान गांव की गतिविधियों को विराम दिया जाता है। यह विराम निष्क्रियता नहीं, बल्कि संरक्षण का सक्रिय संकल्प है। वनदेवी की पूजा से शुरू होता है प्रकृति के प्रति यह आध्यात्मिक संकल्प बरना पर्व की शुरुआत गांव के ब्रह्मस्थान पर वनदेवी की पूजा-अर्चना से हुई। इसके बाद पीपल के पेड़, जिसे स्थानीय परंपरा में ‘बरखाना’ कहा जाता है, की विशेष पूजा की गई। गुरु अथवा सोखा ने मंत्रोच्चार किया और महिलाओं ने भोग अर्पित कर परिवार, गांव और समुदाय की सुख-समृद्धि की कामना की। पूजा के बाद भंडारी द्वारा बरना लगने की घोषणा के साथ ही गांव की सामान्य गतिविधियां रोक दी गईं। संतपुर निवासी किसान केदारनाथ काजी के अनुसार, घोषणा होते ही गांव में बरना के नियम लागू हो जाते हैं और सभी लोग उनका सामूहिक रूप से पालन करते हैं। यहां धर्म और पर्यावरण अलग-अलग विषय नहीं हैं। वनदेवी की पूजा में जंगल की रक्षा का संदेश है और पीपल की आराधना में उस जीवनदायी वृक्ष के प्रति कृतज्ञता, जिसकी छांव में पीढ़ियां सांस लेती आई हैं। गांव की आठ दिशाओं में पहरा, प्रकृति की रखवाली बरना पर्व के दौरान थारू समाज की सामुदायिक व्यवस्था भी देखने लायक होती है। ग्रामीण पर्व शुरू होने से पहले ही अपने भोजन और मवेशियों के चारे की व्यवस्था कर लेते हैं, ताकि 48 घंटे तक गांव से बाहर जाने की आवश्यकता न पड़े। गांव की चारों दिशाओं और चारों कोनों की निगरानी के लिए आठ ‘डेंगवाहक’ तैनात किए गए हैं। हाथों में लाठी लिए ये लोग गांव की सीमाओं पर पहरा देते हैं। मान्यता के अनुसार अभिमंत्रित अक्षत से गांव की सीमा बांधी जाती है। बरना के दौरान कोई व्यक्ति पेड़-पौधे की पत्ती, घास या तिनका तोड़ता है तो उस पर सामुदायिक नियमों के तहत 500 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। यह पहरा केवल गांव की सीमा का नहीं है। यह उस चेतना का पहरा है, जो मनुष्य को याद दिलाती है कि जिस जंगल से जीवन मिला है, उसकी रक्षा करना भी जीवन का ही हिस्सा है। 48 घंटे का मौन, सदियों पुरानी पर्यावरण चेतना पश्चिम चंपारण का थारू समाज पीढ़ियों से तराई और जंगलों के बीच प्रकृति के साथ सहजीवन की परंपरा को जीवित रखे हुए है। वाल्मीकिनगर और नेपाल सीमा से सटे तराई क्षेत्र में फैला ‘थारूहट’ इस सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण भूभाग है। थारू समाज के लिए जंगल केवल लकड़ी, घास या जमीन का स्रोत नहीं रहा। जंगल उनके लोकजीवन, संस्कृति, आस्था और अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। इसी कारण उनके अनेक पर्व और सामाजिक परंपराओं में प्रकृति संरक्षण की अंतर्धारा दिखाई देती है। बरना पर्व उसी जीवन-दर्शन का एक सशक्त उदाहरण है। सरहुल की तरह प्रकृति के नवजीवन का उत्सव थारुओं का बरना पर्व भारतीय आदिवासी परंपराओं में प्रकृति के सम्मान की व्यापक चेतना से भी जुड़ता है। झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में मनाए जाने वाले सरहुल में भी प्रकृति और वृक्षों की पूजा की जाती है तथा एक अवधि में खेतों में हल-कुदाल चलाने और वृक्षों को काटने अथवा उनकी टहनियां तोड़ने पर रोक रहती है। दोनों परंपराएं एक गहरी भारतीय जीवन-दृष्टि की ओर संकेत करती हैं, धरती पर अधिकार नहीं, धरती के साथ सह-अस्तित्व। ये पर्व इस बजट को रेखांकित करते हैं कि जब आधुनिक पर्यावरण विमर्श ‘सस्टेनेबिलिटी’ और ‘क्लाइमेट एक्शन’ जैसे शब्दों में प्रकृति संरक्षण का रास्ता तलाश रहा है, वहीं जंगलों के बीच बसे समुदायों ने सदियों पहले अपने जीवन में इसके सहज सूत्र गढ़ लिए थे। प्रकृति के सामने मनुष्य का यह विनम्र विराम बरना पर्व का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि प्रकृति को बचाने के लिए हमेशा बड़े-बड़े अभियानों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक समुदाय का सामूहिक निर्णय भी धरती के पक्ष में बहुत बड़ी आवाज बन सकता है। 48 घंटे तक हल नहीं चलेगा। घास नहीं कटेगी। पत्तियां नहीं टूटेंगी। मजदूरी नहीं होगी। गांव की सीमाएं शांत रहेंगी। लोग घरों में रहेंगे और जंगल के बीच धरती अपने नवजीवन को आकार देती रहेगी। 48 घंटे बाद फिर पीपल यानी ‘बरखाना’ की पूजा होगी। खर-पतवार हटाए जाएंगे और गांव की सामान्य दिनचर्या लौट आएगी। पारंपरिक गीत, संगीत और नृत्य के बीच बरना पर्व का समापन होगा। लेकिन] इन 48 घंटों का संदेश शायद पर्व की समाप्ति के बाद भी बना रहेगा। जिस धरती ने मनुष्य को जन्म दिया, उसे कभी-कभी मनुष्य से केवल इतना चाहिए कि वह उसके रास्ते से हट जाए और उसे सांस लेने दे। वाल्मीकिनगर के थारू गांवों में इन दिनों यही हो रहा है। इंसान चुप है, गांव शांत है और प्रकृति बोल रही है।