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नई दिल्ली। किसी समाज की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं बनती। भाषा, संस्कृति, धर्म, परंपरा और सामूहिक स्मृतियां भी उसके अस्तित्व का आधार होती हैं। इसलिए जब राजनीतिक सत्ता और सांस्कृतिक पहचान के बीच टकराव बढ़ता है, तो विवाद केवल भूगोल का नहीं रह जाता। वह मनुष्य के अधिकार, सम्मान और अस्तित्व का प्रश्न बन जाता है। तिब्बत आज इसी सवाल के बीच खड़ा है। धर्मशाला का कार्यक्रम और विरोध प्रदर्शन 20 अगस्त 2026 को धर्मशाला में काशाग और निर्वासित तिब्बती संसद ने लोबगा राङचेन की मृत्यु के 49वें दिन प्रार्थना सभा और शांति पदयात्रा आयोजित की। राङचेन ने 2 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के सामने आत्मदाह किया था। कार्यक्रम में सिक्योंग पेनपा त्सेरिंग ने काशाग का वक्तव्य प्रस्तुत किया। पदयात्रा में चीन की तिब्बत नीति और 1 जुलाई से लागू हुए ‘जातीय एकता और प्रगति कानून’ के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराया गया। आत्मदाह: राजनीतिक विरोध नहीं, मानवीय त्रासदी पेनपा त्सेरिंग ने राङचेन की मृत्यु को तिब्बती प्रश्न की गंभीरता से जोड़ते हुए तिब्बतियों की भाषा, संस्कृति, धर्म और पहचान पर बढ़ते दबाव की चिंता व्यक्त की। लेकिन इस पूरे प्रसंग का सबसे संवेदनशील पक्ष आत्मदाह है। किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए जीवन समाप्त करना समाधान नहीं हो सकता। यह पहले एक मानवीय त्रासदी है। सवाल यह है कि कोई व्यक्ति ऐसी निराशा की स्थिति में क्यों पहुंचता है, जहां उसे अपनी आवाज सुनाने के लिए अपने जीवन की कीमत चुकानी पड़ती है। यहीं तिब्बत का मूल प्रश्न सामने आता है कि क्या राष्ट्रीय एकता के लिए सांस्कृतिक एकरूपता जरूरी है? नया कानून और दोनों पक्षों की अलग-अलग चिंताएं चीन नए कानून को राष्ट्रीय एकता, सामाजिक स्थिरता और विभिन्न जातीय समुदायों के बीच सहयोग की व्यवस्था के रूप में देखता है। तिब्बती नेतृत्व की चिंता इसके विपरीत है। उसका कहना है कि इससे तिब्बती भाषा, संस्कृति, धर्म और सामाजिक जीवन पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है। इस मतभेद को भावनाओं के बजाय तथ्य और स्वतंत्र जांच के आधार पर समझना जरूरी है। राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक एकरूपता एक नहीं हैं। दुनिया के अनेक देशों में अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों वाले समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हुए एक राष्ट्र का हिस्सा हैं। मजबूत राष्ट्र वह नहीं जो अपनी विविधता मिटा दे, बल्कि वह है जो विविधता के भीतर एकता कायम करे। भाषा और शिक्षा पर बढ़ती चिंता तिब्बती नेतृत्व का दावा है कि बड़ी संख्या में तिब्बती बच्चे आवासीय विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जहां उनकी मातृभाषा और सांस्कृतिक वातावरण से दूरी बढ़ रही है। शिक्षा में चीनी भाषा को बढ़ती प्राथमिकता मिलने को लेकर भी चिंता जताई गई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। लेकिन भाषा के महत्व को समझने के लिए किसी राजनीतिक पक्ष की पुष्टि की जरूरत नहीं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती। उसमें किसी समाज का इतिहास, साहित्य, लोकस्मृति और जीवन-दर्शन सुरक्षित रहता है। किसी समुदाय की मातृभाषा यदि शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में लगातार कमजोर होती है, तो उसके साथ सांस्कृतिक स्मृति भी कमजोर पड़ सकती है। धर्म और तिब्बती पहचान का संबंध तिब्बती बौद्ध धर्म का प्रश्न भी इसी से जुड़ा है। तिब्बत में धर्म निजी आस्था से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का आधार है। मठ, धार्मिक शिक्षा और आध्यात्मिक परंपराएं तिब्बती पहचान से जुड़ी हैं। तिब्बती नेतृत्व लंबे समय से धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक नेतृत्व में सरकारी हस्तक्षेप का आरोप लगाता रहा है। धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल पूजा करने की अनुमति नहीं है। इसमें धार्मिक संस्थाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की स्वतंत्रता भी शामिल है। इसलिए तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता का मूल्यांकन केवल धार्मिक स्थलों की मौजूदगी से नहीं, बल्कि धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक निरंतरता से भी होना चाहिए। तथ्य-जांच की आवश्यकता हालांकि इस विषय में सावधानी जरूरी है। तिब्बती निर्वासन प्रशासन के आरोपों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा, जैसे चीनी सरकार के दावों को बिना जांच स्वीकार करना भी उचित नहीं है। तिब्बत जैसे संवेदनशील प्रश्न में स्वतंत्र तथ्य-जांच सबसे महत्वपूर्ण है। तिब्बत का सवाल केवल भाषा, धर्म और राजनीति तक सीमित नहीं है। उसका पर्यावरणीय पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। तिब्बती पठार एशिया की अनेक प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है। वहां बांध, खनन और बड़े बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं का असर तिब्बत से बाहर तक जा सकता है। भारत सहित कई देशों की जल और पर्यावरण सुरक्षा हिमालयी पारिस्थितिकी से जुड़ी है। भारत के लिए तिब्बत इसलिए केवल दूर का भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं है। सीमा सुरक्षा, जल संसाधन, हिमालयी पर्यावरण और सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध इसे सीधे भारतीय हितों से जोड़ते हैं। भारत-तिब्बत के ऐतिहासिक संबंध यही बात तिब्बत समर्थक भारतीय संगठनों से जुड़े सुरेन्द्र कुमार के विचारों में भी दिखाई देती है। वे भारत और तिब्बत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को रेखांकित करते हुए तिब्बत के प्रश्न को भारत की सुरक्षा से अलग करके देखने के पक्ष में नहीं हैं। उनका जोर इस बात पर रहा है कि भारत में तिब्बत के बारे में जन-जागरूकता बढ़नी चाहिए और तिब्बत के प्रश्न को केवल विदेश नीति का विषय मानने के बजाय भारत के दीर्घकालिक हितों से जोड़कर समझना चाहिए।सुरेन्द्र कुमार ने भारत और तिब्बत के पुराने संबंधों की ओर ध्यान दिलाते हुए यह भी कहा है कि दोनों के बीच कभी एक सुरक्षित और मैत्रीपूर्ण सीमा थी, जहां आवागमन के लिए आज जैसी औपचारिक बाधाएं नहीं थीं। उनके विचार में तिब्बत का सवाल भारत की सांस्कृतिक विरासत, हिमालयी क्षेत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से तिब्बत इस दृष्टिकोण को केवल राजनीतिक समर्थन के रूप में नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक चिंता के संदर्भ में देखना चाहिए। तिब्बत में होने वाले राजनीतिक और पर्यावरणीय बदलावों का असर हिमालय और भारत की सीमाओं तक पहुंच सकता है।भारत ने लंबे समय से दलाई लामा और तिब्बती शरणार्थियों को मानवीय आधार पर आश्रय दिया है। बौद्ध धर्म ने भारत और तिब्बत के बीच गहरे सभ्यतागत संबंध बनाए हैं। लेकिन चीन के साथ भारत के संबंधों की अपनी जटिलताएं हैं। इसलिए भारत की नीति में मानवीय संवेदना और कूटनीतिक विवेक दोनों जरूरी हैं। भारत तिब्बतियों के भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों का समर्थन कर सकता है, लेकिन हर मुद्दे को चीन के साथ टकराव में बदलना जरूरी नहीं। संवाद के रास्ते खुले रखते हुए मानवाधिकार और सांस्कृतिक अधिकारों की चिंता व्यक्त करना अधिक व्यावहारिक रास्ता हो सकता है। आत्मदाह की घटनाएं और उनका संकेत आत्मदाह की घटनाएं इस पूरे संकट का सबसे दर्दनाक पहलू हैं। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने 2009 से तिब्बत के भीतर बड़ी संख्या में आत्मदाह की घटनाओं का उल्लेख किया है। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। लेकिन आंकड़ों की राजनीतिक व्याख्या से अलग भी देखें तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति गहरे असंतोष और निराशा की ओर संकेत करती है।पेनपा त्सेरिंग के वक्तव्य की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि तिब्बती नेतृत्व आत्मदाह को राजनीतिक संघर्ष का स्थायी रास्ता नहीं बताता। उनका जोर तिब्बती लोगों की आकांक्षाओं को शांतिपूर्ण तरीके से सामने रखने और संवाद की आवश्यकता पर है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। किसी व्यक्ति के राजनीतिक उद्देश्य को समझना अलग बात है और उसके आत्मविनाश को उचित ठहराना अलग। गांधी का सत्याग्रह और संवाद यहां गांधी का सत्याग्रह एक उपयोगी संदर्भ देता है। गांधी के लिए अहिंसा केवल दूसरे को चोट न पहुंचाने का सिद्धांत नहीं थी। उसमें मानव जीवन के प्रति सम्मान और विरोधी के विवेक को जगाने की कोशिश भी शामिल थी। इसलिए आत्मदाह की त्रासदी संवाद की जरूरत को मजबूत करनी चाहिए, टकराव को नहीं। तिब्बती निर्वासन प्रशासन ‘मध्य मार्ग नीति’ की वकालत करता है। इसका उद्देश्य तत्काल पूर्ण स्वतंत्रता की मांग के बजाय बातचीत के जरिए चीन-तिब्बत विवाद का समाधान तलाशना है। पेनपा त्सेरिंग लगातार चीन और तिब्बत के बीच संवाद फिर शुरू करने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। 20 अगस्त के कार्यक्रम में भी यही व्यापक संदेश दिखाई दिया। यही रास्ता व्यावहारिक दिखाई देता है। राजनीतिक मतभेद तुरंत खत्म नहीं हो सकते, लेकिन भाषा, शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण जैसे विषयों पर बातचीत शुरू की जा सकती है। इन्हीं मुद्दों से विश्वास बहाली की शुरुआत हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। चीन बड़ी आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक शक्ति है। अनेक देशों के उसके साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक और रणनीतिक संबंध हैं। इसलिए चीन से जुड़े मानवाधिकार सवालों पर वैश्विक प्रतिक्रिया अक्सर भू-राजनीतिक हितों से प्रभावित होती है। लेकिन मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता तभी विश्वसनीय होगी, जब वह शक्तिशाली और कमजोर दोनों पर समान रूप से लागू हो। साथ ही तिब्बत पर अंतरराष्ट्रीय बहस प्रमाण आधारित होनी चाहिए। चीन, तिब्बती निर्वासन प्रशासन और अन्य पक्षों के दावों की स्वतंत्र जांच हो। भाषा, शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार, पर्यावरण और राजनीतिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों का विश्वसनीय दस्तावेजीकरण किया जाए। भावनात्मक नारों के बजाय प्रमाण आधारित बहस ही स्थायी समाधान की जमीन तैयार कर सकती है। संतुलित समाधान की आवश्यकता तिब्बत के प्रश्न को केवल ‘स्वतंत्रता बनाम चीन’ के द्वंद्व में सीमित करना भी उचित नहीं होगा। चीन की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को समझना जरूरी है, लेकिन इसके साथ तिब्बतियों की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा को भी सम्मान मिलना चाहिए। किसी टिकाऊ समाधान में दोनों पक्षों की वास्तविक चिंताओं के लिए जगह होनी चाहिए। राजनीतिक समाधान की शुरुआत उन क्षेत्रों से हो सकती है, जहां मानवीय हित राजनीतिक मतभेदों से ऊपर हैं—तिब्बती भाषा का संरक्षण, बच्चों की शिक्षा, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक संस्थाओं की भूमिका और हिमालयी पर्यावरण। इन विषयों पर संवाद राजनीतिक अविश्वास के बीच भी साझा जमीन बना सकता है। लोबगा राङचेन की मृत्यु: एक चेतावनी लोबगा राङचेन की मृत्यु को इसलिए किसी राजनीतिक विजय के रूप में नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखना चाहिए। यह चेतावनी उस मानवीय पीड़ा की है, जो तब पैदा होती है जब शांतिपूर्ण असहमति के रास्ते संकुचित होते जाते हैं। किसी भी समाज में ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए, जहां अपनी बात कहने के लिए किसी व्यक्ति को जीवन समाप्त करना पड़े। तिब्बत का प्रश्न अंततः सत्ता और पहचान के बीच संतुलन का प्रश्न है। राष्ट्रीय एकता सांस्कृतिक विविधता को मिटाकर नहीं, उसका सम्मान करके भी कायम रह सकती है। स्थिरता तब आती है, जब लोगों को भरोसा हो कि उनकी भाषा, आस्था, संस्कृति और पहचान के लिए राजनीतिक व्यवस्था में सम्मानजनक जगह है। भविष्य का रास्ता तिब्बत का भविष्य केवल सत्ता की ताकत से तय नहीं होना चाहिए। वहां रहने वाले लोगों की आकांक्षाओं और गरिमा को भी उसमें स्थान मिलना चाहिए। आत्मदाह का महिमामंडन नहीं, मानव जीवन की रक्षा; टकराव नहीं, संवाद; आरोप नहीं, स्वतंत्र जांच—यही आगे का रास्ता है। पहचान को दबाकर स्थायी शांति नहीं बनाई जा सकती। सत्ता की वास्तविक ताकत तब दिखाई देती है, जब वह असहमति को कुचलने के बजाय सुनने की क्षमता रखती है। तिब्बत का प्रश्न इसी कसौटी पर चीन ही नहीं, पूरी दुनिया की परीक्षा है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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