Full Story

काठमांडू। काठमांडू के एक अस्पताल के बिस्तर पर लेटे 25 वर्षीय राकेश महतो की दुनिया एक साल से वहीं ठहरी हुई है। उनकी इच्छा बहुत बड़ी नहीं है, बस उठना, कुछ कदम चलना और अपने घर लौट जाना लेकिन एक गोली ने उनके लिए जिंदगी की सबसे सामान्य इच्छाओं को भी असंभव बना दिया। नेपाल में 08 सितंबर 2025 को भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली उनके पेट में लगी थी। गोली शरीर को चीरती हुई दूसरी तरफ जा फंसी और उनकी कमर के नीचे की नसें क्षतिग्रस्त हो गईं। तीन दिन बाद जब उन्हें होश आया, तब तक नेपाल की राजनीति बदलने की पटकथा लिखी जा चुकी थी। डॉक्टर उन्हें बता चुके थे कि शायद वे दोबारा कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाएंगे। एक साल बाद श्री महतो के लिए सवाल वही है, क्या जिस बदलाव के लिए उन्होंने अपना शरीर गंवाया, वह वास्तव में आया? उनका जवाब निराशा से भरा है। “उन्होंने इस बात की जांच तक नहीं की कि हमें किसने और क्यों गोली मारी। किसी को सजा नहीं मिली। कभी-कभी लगता है कि यह सरकार भी पिछली सरकारों से अलग नहीं है।” दो दिन, जिन्होंने नेपाल की राजनीति बदल दी 08 और 09 सितंबर 2025 को नेपाल की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसने देश की राजनीतिक व्यवस्था को झकझोर दिया। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध तत्काल चिंगारी था, लेकिन उसके पीछे वर्षों से जमा असंतोष था, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, बेरोजगारी, राजनीतिक संरक्षण और सत्ता पर उम्रदराज नेताओं की पकड़। शुरुआत में शांतिपूर्ण रहे प्रदर्शन देखते ही देखते हिंसक हो गए। सुरक्षा बलों की गोलीबारी और उसके बाद फैली हिंसा में 76 लोगों की मौत हुई और 2,638 लोग घायल हुए। यह केवल एक आंदोलन नहीं रहा। इसने सरकार गिराई, संसद भंग हुई, अंतरिम सरकार बनी और अंततः चुनावों ने नेपाल की राजनीति में एक नई पीढ़ी को निर्णायक शक्ति दे दी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। इसके कुछ ही महीने बाद राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल किया और काठमांडू के पूर्व मेयर, रैपर और स्ट्रक्चरल इंजीनियर बलेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। 35 वर्षीय श्री शाह का प्रधानमंत्री बनना उस नेपाल के लिए असाधारण राजनीतिक परिवर्तन था, जिसकी राजनीति लंबे समय तक कुछ बुजुर्ग नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती रही थी। लेकिन अस्पताल के बिस्तर पर पड़े महतो के लिए लोकतांत्रिक बदलाव का अर्थ आज भी एक अनुत्तरित सवाल है। बदले चेहरे, नहीं बदली पीड़ा सिंघा दरबार में चेहरे बदल गए। सत्ता का समीकरण बदल गया। संसद और सरकार की संरचना बदल गई। लेकिन आंदोलन में घायल हुए लोगों और मारे गए प्रदर्शनकारियों के परिवारों के लिए समय जैसे 8 और 9 सितंबर 2025 पर ही रुक गया। आंदोलनकारियों ने भ्रष्टाचार के अंत, बेहतर शासन और जवाबदेह राज्य की मांग की थी। लेकिन एक साल बाद कई घायल प्रदर्शनकारी पूछ रहे हैं कि उनके हिस्से में आखिर क्या आया। सरकार ने पूर्ण चिकित्सा उपचार, घायलों के परिवार के एक सदस्य को रोजगार, योग्यता के अनुरूप नौकरी, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी सहायता का वादा किया था। कई पीड़ितों का कहना है कि इन वादों का बड़ा हिस्सा अभी भी कागजों पर है। राकेश महतो : आंदोलन का सबसे लंबा इंतजार श्री महतो उन हजारों युवाओं की तरह काठमांडू पहुंचे थे, जो नेपाल के छोटे शहरों और गांवों से बेहतर भविष्य की तलाश में राजधानी आते हैं। वह वाणिज्य की पढ़ाई कर रहे थे और लोकसेवा की तैयारी कर रहे थे। उनका सपना सरकारी नौकरी पाने का था। वह अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते थे और छोटे भाई को बेहतर शिक्षा दिलाना चाहते थे। प्रदर्शन के दिन संसद के सामने एक युवक दीपेंद्र बसनेट को गोली लगी। महतो उसकी मदद के लिए दौड़े। तभी पीछे से गोली चली और उनके पेट में लगी। उनकी जिंदगी उसी क्षण बदल गई। राष्ट्रीय आघात केंद्र की गहन चिकित्सा इकाई में जब वह अपने पैरों को हिलाने की कोशिश कर रहे थे, तब उन्हें अहसास हुआ कि शरीर उनका साथ नहीं दे रहा। फिर डॉक्टर ने उन्हें बताया, कमर के नीचे की नसें क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। अब वे व्हीलचेयर पर हैं। सत्ता और राजनीति बदल गई, लेकिन उनका शरीर उस दिन से आगे नहीं बढ़ सका। गोली के साथ गई रोशनी सुर्खेत के संतोष बोहोरा की कहानी भी आंदोलन की कीमत का दूसरा चेहरा है। 09 सितंबर 2025 को वह अपने चचेरे भाई के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए। कांग्रेस नेता पूर्ण बहादुर खड़का के घर के सामने तनाव बढ़ा और सुरक्षाकर्मियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। संतोष को गोली और छर्रे लगे। उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई। अब वह हर महीने 18,000 रुपये के जीवन निर्वाह भत्ते पर निर्भर हैं। उनकी पत्नी निर्मला ने पशु चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई की थी। आंदोलन के बाद उन्हें योग्यता के अनुरूप रोजगार का आश्वासन दिया गया था। लेकिन आज वह अस्पताल में कार्यालय सहायक के रूप में काम कर रही हैं। निर्मला के लिए आंदोलन सिर्फ उनके पति की आंखों की रोशनी नहीं ले गया। उसने उनके परिवार की पूरी जिंदगी बदल दी। “मेरे पति की खुशियां छिन गईं और इस विरोध प्रदर्शन ने मेरी जिंदगी भी मुश्किल बना दी।” फिर भी वह सरकार को दोष देने के बजाय उसकी कठिनाइयों को समझने की कोशिश करती हैं। यही शायद इस आंदोलन की सबसे मार्मिक विडंबना है, जिन लोगों ने राज्य से जवाबदेही मांगी थी, वे आज उसी राज्य की सहायता के इंतजार में हैं। न्याय की जांच, लेकिन न्याय अभी दूर पूर्व मुख्य न्यायाधीश गौरी बहादुर कार्की की अध्यक्षता वाले जांच पैनल ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस ने अत्यधिक और अंधाधुंध बल का इस्तेमाल किया। कर्फ्यू लागू होने से पहले सुरक्षा बलों ने लगभग चार घंटे तक लगातार गोलीबारी की और पुलिस तथा राजनीतिक नेतृत्व समय पर हस्तक्षेप करने में विफल रहे। रिपोर्ट के बाद पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक को मौतों से जुड़े आरोपों में गिरफ्तार किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के बाद दोनों को रिहा कर दिया गया। अब तक उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है। घरेलू मंत्री सूडान गुरुंग का कहना है कि जांचकर्ता पर्याप्त सबूत जुटा रहे हैं। लेकिन जिन लोगों के शरीर पर गोलियों के निशान हैं, उनके लिए सबूत जुटने का इंतजार भी एक और सजा जैसा है। 15 लाख रुपये का इलाज और अधूरा सरकारी वादा कावरे के कमाल घिमिरे के सीने पर आज भी गोली का निशान है। उन्होंने महीनों अस्पताल में बिताए। सरकार ने इलाज का खर्च उठाने का आश्वासन दिया था। लेकिन उनका कहना है कि आगे के इलाज और दवाओं पर उन्हें खुद खर्च करना पड़ा। उनके परिवार के अनुसार इलाज में लगभग 15 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। श्री घिमिरे कहते हैं कि शारीरिक दर्द अब उतना नहीं सताता। असली दर्द यह है कि आंदोलन के बाद भी उनका भविष्य नहीं बदला। “लोग इसे 'जेनरेशन Z' की सरकार कहते हैं। तो फिर ये लोग घायलों को क्यों भूल गए?” उनका सवाल सिर्फ सरकार से नहीं है। यह उस पूरी राजनीतिक व्यवस्था से है, जिसे बदलने के लिए उनकी पीढ़ी सड़क पर उतरी थी। क्या सचमुच कुछ बदला जनरेशन जेड आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने नेपाल की राजनीति की दिशा बदल दी लेकिन राजनीति बदलना और शासन बदलना दो अलग चीजें हैं। सुर्खेत में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कुमार शमशेर थापा मानते हैं कि कुछ बदलाव दिखाई देते हैं। सरकारी कार्यालयों में बिचौलियों की भूमिका कम हुई है और नेताओं द्वारा अपने समर्थकों को प्राथमिकता दिलाने की पुरानी संस्कृति में कुछ कमी आई है। लेकिन डिजिटल सेवाओं, पारदर्शिता और प्रशासनिक सुधार के वादे अब भी अधूरे हैं। नागरिक समाज के नेता पीतांबर ढकाल इससे भी अधिक निराश हैं। उनका कहना है कि वर्तमान सरकार स्वयं आंदोलन का परिणाम है, लेकिन प्रशासनिक ढांचा अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। उनके शब्दों में, चेहरे बदले हैं, व्यवस्था नहीं। आंदोलन की सबसे कठिन विरासत 10 दिसंबर 2025 को जेनरेशन Z प्रतिनिधियों और अंतरिम सरकार के बीच हुए समझौते ने कई बड़े वादे किए थे, भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थायी संस्था, जवाबदेही, दंडमुक्ति का अंत और मृतकों तथा घायलों के परिवारों के लिए तत्काल एवं दीर्घकालिक सहायता। इसमें मुआवजा, मुफ्त चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक परामर्श, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आंदोलन की स्मृति में स्थायी स्मारक तक की बात थी। एक साल बाद इन्हीं वादों की सूची पीड़ितों के लिए सवालों की सूची बन चुकी है। काठमांडू की सत्ता में नई पीढ़ी पहुंच गई है। लेकिन अस्पताल के कमरों में पुराने सवाल अब भी जीवित हैं। राकेश महतो को अभी भी अपने पैरों पर खड़े होने की उम्मीद है। संतोष बोहोरा को अपनी खोई हुई रोशनी वापस आने की उम्मीद नहीं है, लेकिन वह अपने परिवार के लिए स्थिर भविष्य चाहते हैं। कमाल घिमिरे अपने इलाज और रोजगार को लेकर जूझ रहे हैं। और मृतकों के परिवार उन लोगों के नाम और जवाब मांग रहे हैं, जिनकी मौत ने नेपाल की राजनीति को बदलने में भूमिका निभाई। एक साल बाद असली सवाल नेपाल के जनरेशन जेड विद्रोह ने यह साबित कर दिया कि युवा केवल चुनावों में मतदाता नहीं, सत्ता परिवर्तन की ताकत भी बन सकते हैं। लेकिन इस आंदोलन की असली परीक्षा अब सड़कों पर नहीं, शासन की मेज पर हो रही है। क्या यह आंदोलन केवल सत्ता के चेहरे बदलने तक सीमित रह जाएगा, या वह उस व्यवस्था को भी बदलेगा जिसके खिलाफ युवाओं ने अपनी जान जोखिम में डाली थी? यह सवाल केवल नेपाल के लिए नहीं है, भारत ऐसे आंदोलनकारी विचारों के पक्षधर लोगों के लिए भी है, "क्या कोई आंदोलन अपनी सोंच के अनुरूप समूल व्यवस्था परिवर्तन के बाद भी मंजिल हासिल कर सकती है"? एक साल बाद नेपाल की राजनीति इसका उत्तर खोज रही है। और काठमांडू के एक अस्पताल में राकेश महतो उस उत्तर का इंतजार कर रहे हैं, व्हीलचेयर पर बैठे, अपने पैरों को फिर से चलने की उम्मीद में। उनके लिए क्रांति अभी खत्म नहीं हुई है। क्योंकि सत्ता बदल जाने के बाद भी, न्याय का इंतजार बाकी है।