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कटिहार। "मां... जल्दी तैयार कर दो, मुझे स्कूल जाना है।" यह आवाज उस 13 साल की बच्ची की है, जिसके जन्म से ही दोनों हाथ नहीं हैं। मां उसे नहलाती है, कपड़े पहनाती है और स्कूल भेजती है। वहां पहुंचकर लक्ष्मी अपने पैरों से पेंसिल उठाती है और कॉपी पर सिर्फ अक्षर नहीं बल्कि अपने सपनों की कहानी लिखने लगती है। वह जानती है कि उसकी राह आसान नहीं है लेकिन उसने यह भी तय कर लिया है कि दिव्यांगता उसकी पहचान नहीं बनेगी। शिक्षिका बनने का सपना आंखों में लिए लक्ष्मी हर दिन अपने हौसलों से जिंदगी की नई परिभाषा लिख रही है। बिहार में कटिहार जिले के हसनगंज प्रखंड के भतौरिया गांव की रहने वाली लक्ष्मी आज उन हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा है, जो छोटी-छोटी मुश्किलों में अपने सपने छोड़ देते हैं। लक्ष्मी ने अपने पैरों को ही अपने हाथ बना लिए हैं। वह पैरों से कॉपी पर लिखती है, किताबें पढ़ती है और चम्मच पकड़कर खाना भी खाती है। उसे देखकर सहज ही एहसास होता है कि शरीर की सीमाएं इंसान के इरादों से बड़ी नहीं होतीं। जब पैर बन गए हाथ कक्षा में बाकी बच्चे पेंसिल हाथों से पकड़ते हैं लेकिन लक्ष्मी अपने पैरों की उंगलियों के बीच पेंसिल थामकर अक्षरों को आकार देती है। उसकी लिखावट इतनी साफ और सुंदर है कि कई बार सामान्य बच्चों की कॉपियां भी उसके सामने फीकी पड़ जाती हैं। उसकी कक्षा शिक्षिका रिंकू कुमारी बताती हैं कि लक्ष्मी पढ़ाई को लेकर बेहद गंभीर है। वह रोज होमवर्क पूरा करके स्कूल आती है। कभी किसी बहाने पढ़ाई से दूरी नहीं बनाती। उसकी मेहनत और अनुशासन बाकी बच्चों के लिए भी प्रेरणा है। स्कूल में आत्मनिर्भरता की मिसाल विद्यालय के प्रधानाध्यापक विनय कुमार चौधरी कहते हैं कि लक्ष्मी केवल पढ़ाई में ही नहीं बल्कि आत्मनिर्भर बनने की हर संभव कोशिश करती है। मध्यान्ह भोजन के समय वह पैरों से चम्मच पकड़कर खुद खाना खाती है। यह दृश्य सिर्फ एक बच्ची का खाना खाना नहीं बल्कि जीवन से हार न मानने का संदेश देता है। विद्यालय के शिक्षक भी उसे हरसंभव सहयोग देते हैं। उनका मानना है कि सही मार्गदर्शन और थोड़ा सहारा मिले तो लक्ष्मी अपने सपनों को जरूर हासिल करेगी। शिक्षिका बनने का सपना लक्ष्मी का सपना बहुत बड़ा नहीं है लेकिन बेहद खूबसूरत है। वह बड़ी होकर शिक्षिका बनना चाहती है। शायद इसलिए कि वह जानती है—शिक्षा ही वह ताकत है, जो किसी भी कमी को कमजोरी नहीं बनने देती। उसकी मां रेणु देवी भावुक होकर बताती हैं कि बेटी कभी अपनी दिव्यांगता को लेकर शिकायत नहीं करती। हर दिन स्कूल जाने की जिद करती है। पढ़ाई को लेकर उसका उत्साह देखकर परिवार भी अपनी तमाम परेशानियां भूल जाता है। हौसले के सामने बेबस है गरीबी लक्ष्मी की सबसे बड़ी चुनौती उसकी दिव्यांगता नहीं बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति है। पिता रामदेव यादव ईंट-भट्ठे में मजदूरी कर किसी तरह परिवार का खर्च चलाते हैं। मां बेटी की देखभाल में इतनी व्यस्त रहती हैं कि बाहर जाकर काम भी नहीं कर पातीं। दैनिक जीवन के लगभग हर काम में लक्ष्मी को परिवार की मदद चाहिए। ऐसे में घर की जिम्मेदारियां और आर्थिक तंगी दोनों साथ-साथ चलती हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतनी गंभीर दिव्यांगता के बावजूद लक्ष्मी को अब तक दिव्यांग पेंशन और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया है। परिवार की उम्मीद सिर्फ इतनी है कि बेटी की पढ़ाई आर्थिक अभाव की भेंट न चढ़े। गांव की शान बन गई लक्ष्मी गांव के लोगों को आज भी वह दिन याद है, जब लक्ष्मी का जन्म हुआ था। सभी के मन में एक ही सवाल था—बिना हाथों के यह बच्ची जिंदगी कैसे जी पाएगी? लेकिन, आज वही लक्ष्मी पूरे गांव का गर्व बन चुकी है। ग्रामीण कहते हैं कि उसने अपनी मेहनत और इच्छाशक्ति से हर आशंका को गलत साबित कर दिया। उसकी कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो परिस्थितियों के सामने हार मान लेता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि लक्ष्मी को दिव्यांग पेंशन, शिक्षा सहायता और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ जल्द से जल्द दिया जाए, ताकि उसका सपना अधूरा न रह जाए। लक्ष्मी सिर्फ लिख नहीं रही, इतिहास रच रही है कुछ कहानियां खबरों से आगे निकल जाती हैं। लक्ष्मी की कहानी भी ऐसी ही है। वह पैरों से सिर्फ कॉपी पर शब्द नहीं लिखती बल्कि हर दिन यह साबित करती है कि सपनों का आकार शरीर से नहीं, हौसलों से तय होता है। आज उसे किसी सहानुभूति की नहीं बल्कि अवसर की जरूरत है क्योंकि जिस बच्ची ने बिना हाथों के हार नहीं मानी, वह अगर सही सहयोग पा जाए तो न जाने कितनी जिंदगियों में उम्मीद की नई रोशनी जगा सकती है।



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