Full Story
माटी का श्रृंगार : श्रृंखला 4 नोएडा (यूपी)। पहली बार जब किसी मनुष्य ने मिट्टी को आग में पकाकर एक पात्र बनाया, तब शायद उसने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि हजारों वर्ष बाद वही कला मानव सभ्यता की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान बन जाएगी। मिट्टी का बर्तन केवल उपयोग की वस्तु नहीं रहा; वह सौंदर्य, आस्था, विज्ञान और समाज का दर्पण बन गया। जैसे-जैसे सभ्यताएँ विकसित हुईं, वैसे-वैसे माटी ने भी अपना श्रृंगार बदलना शुरू किया। उपयोगिता से सौंदर्य तक प्रारंभिक मृद्भांडों का उद्देश्य केवल पानी भरना, अन्न रखना और भोजन पकाना था। लेकिन मनुष्य की सृजनशीलता ने जल्द ही उपयोगिता को कला में बदल दिया। किसी ने पात्र की सतह पर उँगलियों से रेखाएँ खींचीं, किसी ने लकड़ी की नोक से ज्यामितीय आकृतियाँ उकेरीं, तो किसी ने पशु-पक्षियों और वृक्षों के चित्र बनाए। यहीं से टेराकोटा केवल बर्तन नहीं रहा, बल्कि मानव की कल्पनाशीलता का कैनवास बन गया। हर सभ्यता ने अपनी संस्कृति, विश्वास और प्रकृति को मिट्टी पर उकेरना शुरू कर दिया। जब मिट्टी बोलने लगी पुरातत्वविदों का मानना है कि किसी भी सभ्यता की सबसे विश्वसनीय पहचान उसके मृद्भांड होते हैं। पत्थर के महल टूट सकते हैं, धातु गल सकती है, लेकिन आग में पकी मिट्टी हजारों वर्षों तक धरती की परतों में सुरक्षित रहती है। इसी कारण दुनिया की लगभग हर पुरातात्विक खुदाई में सबसे अधिक संख्या मिट्टी के बर्तनों की मिलती है। उनके आकार, मोटाई, रंग, बनावट और अलंकरण देखकर इतिहासकार उस युग के लोगों के भोजन, व्यापार, तकनीक, धार्मिक विश्वास, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक विकास का अनुमान लगा लेते हैं। भारतीय माटी की अनूठी पहचान भारत की मृद्भांड परंपरा संसार की सबसे समृद्ध परंपराओं में गिनी जाती है। सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगरों से प्राप्त लाल मृद्भांडों पर काले रंग की चित्रकारी आज भी कला विशेषज्ञों को चकित करती है। कहीं मछलियाँ बनी हैं, कहीं बैल, कहीं वृक्ष, तो कहीं ज्यामितीय आकृतियाँ। ये चित्र केवल सजावट नहीं थे। वे उस समय के समाज की सोच, प्रकृति से संबंध और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम थे।बबाद के वैदिक, महाजनपद, मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त कालों में भारतीय मृद्भांड कला लगातार विकसित होती रही। प्रत्येक युग ने अपनी तकनीक और सौंदर्यबोध इसमें जोड़ा। रंगों का जन्म प्रारंभिक बर्तनों पर केवल उकेरी हुई रेखाएँ बनाई जाती थीं। बाद में प्राकृतिक खनिजों और मिट्टी से बने रंगों का प्रयोग शुरू हुआ। लाल, गेरुआ, काला, सफेद और भूरे रंगों के संयोजन ने मृद्भांडों को नई पहचान दी। कांस्य युग तक आते-आते काले स्लिप की तकनीक विकसित हो चुकी थी, जिसमें पात्र की सतह पर विशेष प्रकार की महीन मिट्टी का लेप चढ़ाया जाता था। भट्ठी में नियंत्रित तापमान पर पकाने से वह चमकदार काले रंग में बदल जाती थी। उत्कीर्ण रेखाएं सतह को सजाने का सबसे प्रारंभिक रूप हैं, लेकिन सजावटी पैटर्न में विशिष्ट काले रंग की स्लिप लगाने की तकनीक कांस्य युग में परिपूर्ण हुई और बाद में 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व में इसे और परिष्कृत किया गया। 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सबसे लोकप्रिय ब्लैक फिगर तकनीक या 5वीं और 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सबसे लोकप्रिय रेड-फिगर तकनीक से सजावट करने के बाद , बर्तन को आग में पकाने से पहले अच्छी तरह सूखने के लिए छोड़ दिया जाता था। सूखने की प्रक्रिया के दौरान, बर्तन कुछ हद तक सिकुड़ जाते थे, हालांकि सबसे अधिक सिकुड़न आग में पकाते समय होती थी। विश्व की अनेक सभ्यताओं में बाद में ब्लैक फिगर और रेड फिगर शैली विकसित हुई, जिसमें पात्रों पर धार्मिक कथाएँ, योद्धा, पशु-पक्षी और दैनिक जीवन के दृश्य चित्रित किए जाते थे। भारत में भी विभिन्न क्षेत्रों ने अपनी स्थानीय शैली विकसित की। सिंधु की घाटी में बोलती मिट्टी भारतीय उपमहाद्वीप में मिट्टी के बर्तनों की कहानी और भी अधिक समृद्ध है। जब सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगरों... हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा, राखीगढ़ी और कालीबंगा की खुदाई हुई, तो वहाँ से हजारों की संख्या में मिट्टी के पात्र प्राप्त हुए। लाल रंग के घड़े। काली रेखाओं से चित्रित कलश। अनाज रखने के बड़े पात्र। दीपक। खिलौने। सीटी बजाने वाले पक्षियों की आकृतियाँ। बैलगाड़ियों के छोटे मॉडल। इन सबने यह सिद्ध कर दिया कि उस युग का कुम्हार केवल उपयोगिता की वस्तुएँ नहीं बनाता था, वह कलाकार भी था, अभियंता भी और समाज का सांस्कृतिक निर्माता भी। उसके हाथों में गणित था, क्योंकि बिना अनुपात के घड़ा नहीं बन सकता। उसके भीतर रसायन का ज्ञान था, क्योंकि वह जानता था कि कौन-सी मिट्टी कितनी आग सह पाएगी। उसकी दृष्टि में सौंदर्य था, क्योंकि वह साधारण घड़े पर भी ऐसी रेखाएँ उकेर देता था, जिन्हें देखकर आज भी कला और इतिहासकार विस्मित रह जाते हैं। सौंदर्यबोध और कलात्मक अभिव्यक्ति समय के साथ मिट्टी के बर्तन केवल उपयोगिता की वस्तु नहीं रहे, बल्कि सौंदर्यबोध और कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम भी बन गए। प्रारंभ में उनकी सतह पर उँगलियों या नुकीले औजारों से उकेरी गई रेखाएँ ही अलंकरण का आधार थीं, किंतु कांस्य युग तक पहुँचते-पहुँचते काले रंग की स्लिप, ज्यामितीय आकृतियों और चित्रांकन की विकसित तकनीकों ने मृद्भांडों को नई पहचान दी। बाद में यूनानी सभ्यता की प्रसिद्ध ब्लैक-फिगर और रेड-फिगर शैली ने मिट्टी के बर्तनों को विश्व कला का उत्कृष्ट उदाहरण बना दिया। बर्तन को सजाने के बाद सावधानीपूर्वक सुखाया जाता था और फिर नियंत्रित तापमान वाली भट्ठी में पकाया जाता था, जहाँ आग की तपिश साधारण मिट्टी को स्थायी, मजबूत और आकर्षक रूप प्रदान करती थी। यही प्रक्रिया आज भी विश्व की अनेक पारंपरिक टेराकोटा कलाओं की आत्मा बनी हुई है, जो बताती है कि मिट्टी का श्रृंगार केवल शिल्प नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही मानवीय सृजनशीलता की जीवित परंपरा है।



Comments
0