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नई दिल्ली। घरेलू कोयला उत्पादन और बिजलीघरों तक आपूर्ति बेहतर होने से भारत का कोयला आयात इस वर्ष अप्रैल में घटकर 2.11 करोड़ टन रह गया, जो एक साल पहले की समान अवधि के मुकाबले करीब 13 फीसदी कम है। सबसे बड़ी बात: देश में कोयला ज्यादा मिला, इसलिए आयात कम हुआ कोयला मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि भारत अब अपनी जरूरत का ज्यादा कोयला देश के भीतर से जुटा पा रहा है। इसी वजह से विदेशों से कोयला खरीदने की जरूरत कम हुई है। अप्रैल 2025 में भारत ने 2.43 करोड़ टन कोयला आयात किया था, जबकि अप्रैल 2026 में यह घटकर 2.11 करोड़ टन रह गया। यानी एक साल में 31.4 लाख टन कम कोयला विदेश से मंगाना पड़ा। यह गिरावट क्यों अहम है, इसे ऐसे समझिए भारत में बिजली बनाने के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर कोयले का इस्तेमाल होता है। जब देश को ज्यादा कोयला बाहर से खरीदना पड़ता है तो उस पर ज्यादा पैसा खर्च होता है और विदेशी बाजार पर निर्भरता भी बढ़ती है। लेकिन, अगर वही कोयला देश में ही मिल जाए तो बिजली उत्पादन की लागत पर दबाव कम होता है, सप्लाई ज्यादा भरोसेमंद बनती है और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है। यही वजह है कि कोयला आयात में आई यह गिरावट एक अच्छी खबर मानी जा रही है। बिजलीघरों ने सबसे कम किया आयात इस रिपोर्ट की सबसे अहम बात बिजलीघरों से जुड़ी है। कोयला मंत्रालय के मुताबिक, पावर सेक्टर यानी बिजली बनाने वाले संयंत्रों का कोयला आयात 24.89 फीसदी घट गया। यह आयात 46.7 लाख टन से घटकर 35.1 लाख टन रह गया। आसान भाषा में कहें तो बिजलीघरों को अब देश में ही ज्यादा कोयला मिलने लगा है इसलिए उन्हें पहले जितना विदेशी कोयला नहीं खरीदना पड़ा। आयातित कोयले पर चलने वाले प्लांट्स में भी आई बड़ी कमी कुछ बिजलीघर ऐसे होते हैं जो खास तौर पर आयातित कोयले के हिसाब से बनाए गए हैं। इन्हें इंपोर्टेड कोल बेस्ड प्लांट्स कहा जाता है। इन प्लांट्स के लिए भी आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इनका कोयला आयात 27.45 फीसदी घटकर 39.7 लाख टन से 28.8 लाख टन रह गया। इसका मतलब है कि सरकार की आयात घटाने की कोशिश अब उन बिजलीघरों में भी असर दिखा रही है, जहां पहले विदेशी कोयले पर ज्यादा निर्भरता थी। ब्लेंडिंग के लिए भी कम मंगाना पड़ा विदेशी कोयला देश के कई बिजलीघर घरेलू कोयले के साथ थोड़ा आयातित कोयला मिलाकर इस्तेमाल करते हैं। इसे ब्लेंडिंग कहा जाता है। इस काम के लिए आयातित कोयले की जरूरत भी अब कम हुई है। ब्लेंडिंग के लिए आयात 11.26 फीसदी घटकर सात लाख 10 हजार टन से छह लाख 30 हजार टन रह गया। इसका सीधा मतलब यह है कि घरेलू कोयले की उपलब्धता पहले से बेहतर हुई है इसलिए मिश्रण के लिए भी बाहर से कम कोयला मंगाना पड़ रहा है। कुल जरूरत में विदेशी कोयले की हिस्सेदारी भी कम हुई सिर्फ कुल आयात ही कम नहीं हुआ बल्कि देश की कुल कोयला खपत में विदेशी कोयले की हिस्सेदारी भी घटी है। अप्रैल 2025 में कुल खपत में आयातित कोयले की हिस्सेदारी 21.69 फीसदी थी, जो अप्रैल 2026 में घटकर 19.68 फीसदी रह गई। इसका मतलब साफ है कि भारत अपनी जरूरत का पहले से ज्यादा कोयला अब घरेलू उत्पादन से पूरा कर रहा है। फिर कोकिंग कोल का आयात क्यों बढ़ा, यह भी समझिए रिपोर्ट में एक बात अलग जरूर दिखती है। कोकिंग कोल का आयात थोड़ा बढ़ा है। यह 59.3 लाख टन से बढ़कर 60 लाख 10 हजार टन हो गया। लेकिन, इसकी वजह अलग है। कोकिंग कोल मुख्य रूप से स्टील उद्योग में इस्तेमाल होता है और भारत में इसकी उपलब्धता सीमित है। इसलिए, स्टील सेक्टर की जरूरत पूरी करने के लिए इसका आयात अभी भी जरूरी है। यानी यह बढ़ोतरी बिजली क्षेत्र की जरूरत या घरेलू कोयले की कमी की वजह से नहीं बल्कि इस्पात उद्योग की विशेष जरूरत के कारण हुई है। सरकार ने किन वजहों को बताया जिम्मेदार कोयला मंत्रालय का कहना है कि यह गिरावट कई सरकारी प्रयासों का नतीजा है। इनमें देश में कोयला उत्पादन बढ़ाना, खदानों से कोयला तेजी से बाहर निकालने और भेजने की व्यवस्था मजबूत करना, बिजलीघरों के कोयला स्टॉक पर लगातार नजर रखना और रेल मंत्रालय, कोल इंडिया लिमिटेड तथा उसकी सहायक कंपनियों के साथ बेहतर समन्वय शामिल है। इन कदमों से बिजलीघरों तक समय पर कोयला पहुंचा और आयात की जरूरत कम हुई। आगे सरकार का फोकस क्या रहेगा मंत्रालय ने साफ किया है कि आगे भी घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाने, कोयला ढुलाई व्यवस्था को और मजबूत करने और गुणवत्ता आधारित ग्रेडिंग सुधारने पर काम जारी रहेगा। सरकार की कोशिश यही है कि आने वाले समय में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों पर कम से कम निर्भर रहना पड़े।