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नई दिल्ली। राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन से आगे भारत का इतिहास सामाजिक एकता की बार-बार हुई परीक्षा का भी गवाह रहा है, जहां कभी विदेशी शासन और अंग्रेजों की विभाजनकारी नीतियों ने समाज में दूरियां बढ़ाईं तो आज लोकतांत्रिक दौर में जाति, धर्म और समुदाय आधारित वोटबैंक की राजनीति सामाजिक एकजुटता के सामने नई चुनौती बनकर उभरी है। भारत का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह उन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की भी कहानी है, जिन्होंने समय-समय पर भारतीय समाज की एकता की परीक्षा ली। कभी विदेशी आक्रमणों और शासन ने समाज के भीतर दूरी पैदा की, कभी अंग्रेजों ने सामाजिक और धार्मिक विभाजन का इस्तेमाल अपनी सत्ता मजबूत करने के लिए किया और आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में जाति, धर्म और समुदाय के आधार पर बनने वाले वोटबैंक सामाजिक एकता के सामने नई चुनौती बनकर खड़े दिखाई देते हैं। हालांकि अब रोजगार, शिक्षा, विकास और बेहतर भविष्य को प्राथमिकता देने वाली युवा और जेन जेड पीढ़ी के उभार ने यह उम्मीद जगाई है कि देश की चुनावी राजनीति पहचान के पुराने खांचों से निकलकर मुद्दों और जवाबदेही की नई राह पकड़ सकती है। 1192 के बाद बदला सत्ता का स्वरूप 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। इसके बाद उत्तर भारत में सत्ता के समीकरण तेजी से बदले और विदेशी शासकों का प्रभाव बढ़ता गया। मध्यकालीन सत्ता संघर्षों के दौरान युद्ध, धार्मिक टकराव, धर्मांतरण, मंदिरों को नुकसान पहुंचाने और महिलाओं पर अत्याचार जैसी घटनाओं ने समाज पर गहरे घाव छोड़े। इसी दौर में जौहर जैसी त्रासद परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है, जब युद्ध में हार और उसके बाद होने वाले अत्याचार के भय से महिलाएं सामूहिक रूप से अपने प्राण त्याग देती थीं। समय के साथ शासक बदलते गए, लेकिन सत्ता के संघर्ष का असर सामान्य लोगों और सामाजिक संबंधों पर पड़ता रहा। मुगल सत्ता कमजोर हुई तो अंग्रेजों ने बढ़ाए कदम 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के कमजोर पड़ने के साथ भारत में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू की। 1757 का प्लासी युद्ध इस प्रक्रिया का निर्णायक पड़ाव बना। सिराजुद्दौला के पास लगभग 50 हजार सैनिकों की सेना थी, जबकि रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व वाली ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना करीब 3,100 सैनिकों की बताई जाती है, जिनमें लगभग 1,000 ब्रिटिश और 2,100 भारतीय सैनिक शामिल थे। संख्या में बहुत छोटी सेना के बावजूद क्लाइव की सफलता के पीछे केवल युद्ध का मैदान नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी महत्वपूर्ण थी। सिराजुद्दौला के कुछ प्रभावशाली सहयोगियों को अपने पक्ष में करने से युद्ध शुरू होने से पहले ही सत्ता का संतुलन बदल गया था। प्लासी के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में अपना राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाने का रास्ता खुलता चला गया। अंग्रेजों ने भारतीय समाज की कमजोर नस को पहचाना भारत में ब्रिटिश शासन मजबूत होने के साथ अंग्रेजों ने भारतीय समाज की जातीय, धार्मिक और सामाजिक संरचना को समझना शुरू किया। विविधताओं से भरे भारतीय समाज में पहले से मौजूद मतभेद उनके लिए सत्ता बनाए रखने का प्रभावी साधन बन सकते थे। इसी दौर में अलग-अलग धार्मिक और जातीय समुदायों की पहचान राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ती चली गई। एक समुदाय को दूसरे के मुकाबले खड़ा करने और उनके बीच अविश्वास बढ़ने से साझा राष्ट्रीय चेतना के सामने चुनौती पैदा हुई। अंग्रेज जानते थे कि यदि भारत के अलग-अलग समुदाय एक राजनीतिक शक्ति के रूप में एकजुट हो गए तो औपनिवेशिक शासन को लंबे समय तक कायम रखना कठिन होगा। इसलिए सामाजिक विभाजन उनके शासन की राजनीति का महत्वपूर्ण हथियार बनता गया। 1909 से अलग राजनीतिक पहचान को मिला नया आधार 1909 के इंडियन काउंसिल्स एक्ट के बाद भारतीय राजनीति में समुदाय आधारित प्रतिनिधित्व को संस्थागत आधार मिला। आगे चलकर 1932 के सांप्रदायिक पंचाट ने विभिन्न समुदायों और सामाजिक समूहों के अलग राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बहस को और गहरा किया। इससे राजनीति में नागरिक की साझा भारतीय पहचान के साथ उसकी धार्मिक और सामाजिक पहचान भी महत्वपूर्ण होती चली गई। राष्ट्रीय आंदोलन के सामने एक तरफ ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल करने की चुनौती थी, तो दूसरी तरफ समाज के अलग-अलग हिस्सों को एक राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए साथ रखने की कठिन जिम्मेदारी भी थी। 1947 में देश ने चुकाई विभाजन की सबसे बड़ी कीमत आखिरकार 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन आजादी के साथ देश का विभाजन भी हुआ और पाकिस्तान अस्तित्व में आया। धार्मिक आधार पर हुए इस विभाजन ने भारतीय उपमहाद्वीप को गहरी मानवीय त्रासदी दी। लाखों लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा और बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। स्वतंत्रता की खुशी विभाजन के दर्द के साथ आई। अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए, लेकिन समाज के भीतर धार्मिक और सामाजिक पहचान पर आधारित राजनीतिक खांचे समाप्त नहीं हुए। आजादी मिली, मगर पहचान की राजनीति बनी रही 1947 के बाद भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई और विकास तथा राष्ट्र निर्माण की नई यात्रा शुरू की। उम्मीद थी कि स्वतंत्र भारत की राजनीति नागरिकों को व्यापक राष्ट्रीय पहचान के साथ जोड़ते हुए सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान करेगी। लेकिन, चुनावी राजनीति के विस्तार के साथ जाति, धर्म, समुदाय और क्षेत्रीय पहचान राजनीतिक समीकरणों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती गई। अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं ने अपने-अपने सामाजिक आधार तैयार किए। धीरे-धीरे चुनावों में यह गणित महत्वपूर्ण होने लगा कि किस क्षेत्र में कौन-सा जातीय या सामाजिक समूह कितनी संख्या में है और उसका समर्थन किस राजनीतिक दल को मिल सकता है। यहीं से वोटबैंक की राजनीति ने लोकतंत्र में अपनी गहरी जगह बनानी शुरू की। समस्या का समाधान या वोटबैंक का संरक्षण? वोटबैंक राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती तब पैदा होती है, जब किसी समुदाय की वास्तविक समस्याओं के समाधान से अधिक उसकी राजनीतिक गोलबंदी महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, गरीबी और सामाजिक विकास जैसी समस्याएं किसी एक जाति या धर्म तक सीमित नहीं होतीं। इनके स्थायी समाधान के लिए व्यापक नीति और समान अवसरों की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद जब समस्याओं को जातीय या धार्मिक चश्मे से देखा जाने लगता है तो समाधान भी राजनीतिक हितों में उलझने लगता है। परिणाम यह होता है कि समस्याएं समाप्त होने के बजाय नए स्वरूप में सामने आती रहती हैं। वोट की राजनीति गांवों के रिश्तों तक पहुंची भारत की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति गांवों और समुदायों में लंबे समय से मौजूद आपसी संबंध रहे हैं। अलग-अलग जातियों और समुदायों के लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते आए हैं। लेकिन, जब राजनीतिक पहचान सामाजिक पहचान पर हावी होने लगती है तो पड़ोसी भी पहले जाति, धर्म या राजनीतिक खेमे के आधार पर पहचाना जाने लगता है।चुनाव समाप्त हो जाता है लेकिन उससे पैदा हुई राजनीतिक दूरी कई बार सामाजिक रिश्तों में बनी रहती है। यही स्थिति लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। क्या अपने ही वोटबैंक का हो रहा भावनात्मक इस्तेमाल? आज राजनीति में वोटबैंक की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि कई नेता अपने निश्चित सामाजिक आधार को बनाए रखने के लिए लगातार पहचान से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देते हैं। लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि जिन समुदायों से वर्षों तक समर्थन मांगा जाता है, उनकी शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्थिति और सामाजिक सुरक्षा में वास्तव में कितना बदलाव आता है? यदि किसी समुदाय की समस्याएं वर्षों तक जस की तस बनी रहें और हर चुनाव में उन्हीं समस्याओं तथा भावनाओं के आधार पर उससे समर्थन मांगा जाए तो यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व से आगे बढ़कर भावनात्मक राजनीतिक इस्तेमाल का रूप ले सकता है। बहुमत की संख्या लोकतंत्र का अकेला आधार नहीं लोकतंत्र में संख्या महत्वपूर्ण है लेकिन लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं हो सकता। उसकी असली ताकत समान अधिकार, न्याय, संवैधानिक सुरक्षा और प्रत्येक नागरिक के सम्मान में है। यदि किसी क्षेत्र में किसी समुदाय की संख्या कम होने के कारण उसकी आवाज कमजोर पड़ जाए या बहुसंख्यक समूह की संख्या ही राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों का पैमाना बनने लगे तो लोकतंत्र की मूल भावना प्रभावित होती है। यही वह बिंदु है जहां लोकतंत्र और ‘भीड़तंत्र’ के बीच की दूरी को समझना जरूरी हो जाता है। जातीय गोलबंदी से राष्ट्रीय एकता के सामने चुनौती आज भारतीय लोकतंत्र पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और मजबूत है, लेकिन उसके सामने सामाजिक ध्रुवीकरण की चुनौती भी मौजूद है। जाति और समुदाय आधारित चुनावी समीकरण जितने मजबूत होंगे, साझा मुद्दों पर राष्ट्रीय सहमति बनाना उतना ही कठिन हो सकता है। किसी जाति या समुदाय की वास्तविक समस्याओं को उठाना लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन उसे स्थायी राजनीतिक खेमे में बदल देना अलग स्थिति है। यदि हर समुदाय केवल अपनी संख्या, अपने वोट और अपने राजनीतिक हिस्से के आधार पर सोचने लगे तो साझा राष्ट्रीय हित पीछे छूटने का खतरा पैदा होता है। युवा और जेन जेड के हाथ में बदलाव की चाबी वोटबैंक की पुरानी राजनीति के बीच सबसे बड़ी उम्मीद युवा और जेन जेड से है, जो जाति, धर्म और पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाओं के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा, तकनीक, बेहतर जीवन, पारदर्शिता और अवसर जैसे मुद्दों पर भी सवाल उठा रहे हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को सूचनाओं तक अभूतपूर्व पहुंच दी है, हालांकि गलत और भ्रामक सूचनाओं का खतरा भी उतना ही बड़ा है। ऐसे में असली बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि युवा राजनीतिक नारों और पहचान आधारित गोलबंदी से आगे बढ़कर नीतियों, कामकाज और जवाबदेही के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुनते हैं या नहीं। यदि नई पीढ़ी किसी दल या नेता की स्थायी वोटबैंक बनने के बजाय हर चुनाव में सवाल पूछने वाली ‘जवाबदेही की पीढ़ी’ बनती है, तो वह जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को कमजोर कर विकास, रोजगार, शिक्षा और समान अवसर को चुनावी विमर्श के केंद्र में ला सकती है। उम्मीद इसलिए बड़ी है क्योंकि युवा केवल भविष्य के मतदाता नहीं हैं, वे आज के राजनीतिक एजेंडे और कल की लोकतांत्रिक संस्कृति, दोनों को बदलने की क्षमता रखते हैं। बांकीपुर ने दिया संकेत: युवा वोट जातीय खांचे से निकलकर मुद्दों की ओर बढ़ सकता है हाल के चुनावी उदाहरणों में बिहार का 2026 बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव युवा राजनीति में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा सकता है, जहां तीन दशक से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रभाव वाली सीट पर जन सुराज की जीत हुई और चुनावी चर्चा में शिक्षा, रोजगार तथा परीक्षा व्यवस्था जैसे युवा-केंद्रित मुद्दे प्रमुख रहे; विश्लेषणों में युवा मतदाताओं के बीच प्रशांत किशोर की बढ़ती अपील को भी इस उलटफेर का एक कारण बताया गया। यह कहना तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी कि युवाओं ने पूरी तरह जाति और धर्म से ऊपर उठकर मतदान किया क्योंकि भारतीय चुनावों में पहचान आधारित समीकरण अब भी प्रभावी हैं लेकिन बांकीपुर का नतीजा यह जरूर संकेत देता है कि जेन जेड और युवा मतदाता परंपरागत राजनीतिक निष्ठा को चुनौती देकर नौकरी, शिक्षा, पारदर्शिता और बेहतर भविष्य के सवाल पर अपना वोट बदल सकते हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे में भी रोजगार एक बड़ी चिंता के रूप में सामने आया था—62 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना था कि पिछले पांच वर्षों में नौकरी पाना कठिन हुआ है। अगर यह प्रवृत्ति मजबूत होती है तो युवा किसी दल का स्थायी ‘वोटबैंक’ बनने के बजाय मुद्दों और प्रदर्शन के आधार पर सत्ता को पुरस्कृत या दंडित करने वाला निर्णायक मतदाता वर्ग बन सकता है और वोटबैंक की राजनीति को सबसे बड़ी चुनौती यहीं से मिल सकती है। वोटबैंक नहीं, नागरिक बने राजनीति के केंद्र में भारतीय लोकतंत्र के सामने असली चुनौती यह है कि नागरिक को केवल किसी जाति, धर्म या समुदाय के वोट के रूप में न देखा जाए। उसकी पहचान सबसे पहले एक नागरिक की हो, जिसकी शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, सम्मान और बेहतर भविष्य की अपेक्षाएं हैं। राजनीति का उद्देश्य यदि समाज की समस्याओं का समाधान है तो उसका मूल्यांकन भी इसी आधार पर होना चाहिए कि उसने लोगों के जीवन में कितना वास्तविक बदलाव किया। इतिहास बार-बार यही संकेत देता है कि विभाजन सत्ता को कुछ समय के लिए मजबूत कर सकता है लेकिन समाज को लंबे समय तक कमजोर करता है। इसलिए, आज आवश्यकता ऐसी राजनीति की है जो लोगों को अलग-अलग वोटबैंक में बांटने के बजाय उन्हें समान अधिकार, समान अवसर और साझा राष्ट्रीय भविष्य के सूत्र में जोड़े। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और लेख में व्यक्त उनके विचार निजी हैं।)



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