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न्यूयॉर्क। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( आरएसएस ) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विविधता में एकता, मानवता, धर्म के सही स्वरूप और पर्यावरण संरक्षण को भारतीय जीवन-दृष्टि का आधार बताया और कहा कि किसी धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति के अस्तित्व को नकारना हिंदुत्व नहीं है और यदि कोई मुसलमानों को भारत से बाहर निकालने की बात करता है तो वह हिंदू नहीं हो सकता। श्री भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम 'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' में हिंदुत्व, धर्म, मानवता और वैश्विक सौहार्द पर बड़ा संदेश देते हुए कहा, “हिंदुत्व किसी समुदाय को बाहर करने की विचारधारा नहीं बल्कि सभी मनुष्यों को जोड़ने और उनकी गरिमा का सम्मान करने का मार्ग है।” 'मुसलमानों का क्या होगा?' सवाल पर सुनाया पुराना संवाद आरएसएस प्रमुख ने करीब 42 मिनट के संबोधन में एक पुराने संवाद का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने उनसे पूछा था कि यदि आरएसएस हिंदू राष्ट्र की बात करता है तो मुसलमानों का क्या होगा? क्या उन्हें भारत से बाहर कर दिया जाएगा? इस पर उन्होंने कहा था कि ऐसी सोच हिंदुत्व नहीं है। उन्होंने कहा, "अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुस्लिम नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं है।" 'हिंदुत्व सबको जोड़ने की सोच है' संघ प्रमुख ने कहा कि हिंदुत्व किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया में ईश्वर तक पहुंचने के कई रास्ते हो सकते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है। हर व्यक्ति की अपनी गरिमा है और सभी इंसानों के बीच स्वाभाविक जुड़ाव मौजूद है। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान विविधता में एकता है और यही देश की सबसे बड़ी ताकत है। 'हम अलग दिखते हैं, लेकिन भीतर से एक हैं' श्री भागवत ने कहा कि लोगों की भाषा, पहनावा, रीति-रिवाज और जीवनशैली अलग हो सकती है, लेकिन इंसान के भीतर मौजूद मूल तत्व एक जैसा है। उन्होंने कहा कि भारत ने हमेशा दुनिया को यह सिखाया है कि विविधता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि प्रकृति का नियम है और एकता ही सबसे बड़ा सत्य है। धर्म का मतलब केवल पूजा-पद्धति नहीं श्री भागवत ने कहा कि आज दुनिया में धर्म की पहचान केवल रीति-रिवाजों और पूजा-पद्धतियों तक सीमित होती जा रही है जबकि भारतीय परंपरा में धर्म का अर्थ कहीं अधिक व्यापक है। उन्होंने कहा कि धर्म वह व्यवस्था है जो जीवन, समाज और पूरे ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखती है। धर्म का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है न कि बांटना। 'सत्य एक है, इंसानियत भी एक है' संघ प्रमुख ने कहा कि वह कोई धर्मगुरु नहीं हैं लेकिन ऐसे समाज से आते हैं जो मानता है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं पर इंसानियत एक ही है। उन्होंने कहा कि सत्य एक है और इंसानियत उसी सत्य की अभिव्यक्ति है। अलग-अलग धर्म उसी सत्य तक पहुंचने के अलग-अलग मार्ग हैं। 'जियो और जीने दो' बनाम 'सिर्फ हमारी बात मानो' श्री भागवत ने अपने संबोधन में दुनिया की दो विचारधाराओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि एक विचारधारा कहती है "जियो और जीने दो" जबकि दूसरी सोच कहती है कि "सिर्फ वही जीने के हकदार हैं जो हमारी बात मानें।" उन्होंने कहा कि जो लोग केवल अपनी बात मानने वालों की रक्षा करते हैं वे समाज को बांटते हैं। इसके विपरीत मानवता का रास्ता सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करना सिखाता है। पर्यावरण की रक्षा भी हमारा धर्म आरएसएस प्रमुख ने पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि जैसे लोग मदर्स डे और फादर्स डे मनाकर अपने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी याद करते हैं, वैसे ही प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्यों को भी याद रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसान खेती करना बंद कर दें तो दुनिया के सामने भोजन का संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए, व्यक्ति, समाज और पर्यावरण तीनों के विकास में संतुलन जरूरी है। प्रवासी भारतीयों से भी की खास अपील श्री भागवत ने दुनिया भर में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि वे जिस देश में रहते हैं, उसके प्रति पूरी निष्ठा रखें लेकिन अपनी भारतीय सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को भी जीवन में बनाए रखें। उन्होंने कहा कि भारत अपने प्रवासियों से यही अपेक्षा करता है। 30 देशों के धार्मिक नेताओं ने लिया पांच सूत्री संकल्प मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित 'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' कार्यक्रम में 30 देशों के 180 धार्मिक नेता और 5000 से अधिक भारतीय मूल के अमेरिकी शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने 'कॉल फॉर एक्शन' प्रस्ताव रखा, जिसे विभिन्न धर्मों के नेताओं ने स्वीकार किया। इनमें धर्म का दुरुपयोग रोकने का संकल्प, 'एक विश्व, एक मानवता' की भावना को बढ़ावा, हर समुदाय की सुरक्षा और सम्मान की प्रतिबद्धता, भविष्य की पीढ़ियों के प्रति नैतिक जिम्मेदारी और विविधता का सम्मान और एकता को बढ़ावा देना शामिल है। धार्मिक नेताओं ने स्पष्ट कहा कि धर्म का इस्तेमाल नफरत, हिंसा, अपमान या अमानवीय व्यवहार को सही ठहराने के लिए कभी नहीं किया जा सकता। राखी बांधकर दिया एकता का संदेश कार्यक्रम की शुरुआत रक्षाबंधन उत्सव से हुई, जहां विभिन्न देशों और धर्मों से आए लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधी। इसका उद्देश्य दुनिया को भाईचारे, विश्वास और एकता का संदेश देना था। श्री भागवत के पूरे संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि धर्म का उद्देश्य इंसानों को जोड़ना है, तोड़ना नहीं; विविधता प्रकृति है और मानवता सबसे बड़ा धर्म।