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मुंबई। अदालत की चहारदीवारी, एक पीड़िता का ट्रॉमा, बार-बार उसी दर्द को बयान करने की मजबूरी और सामने सिस्टम जितनी ताकतवर सत्ता.... निर्देशक करण डी. कापड़िया और नित्या मेहरा की कोर्टरूम ड्रामा सीरीज ‘हुंकार: द रोर’ इसी संघर्ष को डेविड फिंचर जैसी सिहरन और मनोवैज्ञानिक तनाव के साथ पर्दे पर पेश कर रही है। एक लेख पढ़ा और करण के दिमाग में जन्मी ‘हुंकार’ ‘हुंकार’ की शुरुआत किसी फिल्मी विचार से नहीं बल्कि कोविड के बाद करण डी. कापड़िया के पढ़े एक लेख से हुई। इसी लेख से उन्हें सीरीज का विचार मिला और उन्होंने ‘बिग गर्ल्स डोंट क्राई’ के साथ-साथ इस प्रोजेक्ट पर भी काम शुरू कर दिया लेकिन विचार से पर्दे तक पहुंचने का रास्ता लंबा था। एक साल का राइटर्स रूम, कई ड्राफ्ट... तब मिली सही ‘टोन’ सीरीज को आकार देने के लिए करीब एक साल तक राइटर्स रूम में काम किया गया। करण ने पहले कहानी तैयार की, उसके बाद उसकी बीट-शीट बनाई गई और फिर अलग-अलग लेखकों को एपिसोड बांटे गए। एक के बाद एक कई ड्राफ्ट लिखे गए और तब जाकर कहानी को वह टोन मिली जिसकी टीम को तलाश थी यानी ‘हुंकार’ की पटकथा एक बार में नहीं बनी, बल्कि लंबे लेखन और बदलाव की प्रक्रिया से गुजरी। नाम की तलाश खत्म हुई तो लगा: ‘चेहरे पर थप्पड़’ सीरीज का नाम तय करना भी आसान नहीं था। लंबी तलाश के बाद जब ‘हुंकार’ नाम सामने आया तो करण को लगा कि यही वह शब्द है जिसकी उन्हें तलाश थी। करण के मुताबिक, “यह टाइटल चेहरे पर थप्पड़ की तरह लगा।” नाम के जरिए भी सीरीज न्याय के लिए उठने वाली एक बुलंद आवाज को सामने रखने की कोशिश करती है। डेविड फिंचर जैसी सिहरन, हर फ्रेम में मनोवैज्ञानिक तनाव ‘हुंकार’ को सिर्फ कोर्टरूम में होने वाली कानूनी बहस तक सीमित नहीं रखा गया है। इसे डेविड फिंचर जैसी सिहरन और मनोवैज्ञानिक तनाव के साथ तैयार किया गया है। सेट डिजाइन से लेकर लाइटिंग और कलाकारों के अभिनय तक में एक अजीब-सा डर पिरोने की कोशिश की गई है। सीरीज का हर फ्रेम किरदारों के ट्रॉमा को सामने लाने के हिसाब से तैयार किया गया है। ‘पीड़िता को एक ही कहानी 14-15 बार बतानी पड़ती है’ करण के लिए कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू पीड़िता के ट्रॉमा की अंदरूनी यात्रा है। उनका कहना है कि हमारे यहां इस पहलू पर पर्याप्त बात नहीं होती कि किसी पीड़िता को अपने साथ हुई घटना की कहानी वकील, जज और पुलिस के सामने बार-बार सुनानी पड़ती है। करण के मुताबिक, उसे एक ही कहानी 14-15 बार दोहरानी पड़ती है। ‘हुंकार’ इसी मानसिक यात्रा और उससे पैदा होने वाले दबाव को भी कहानी के केंद्र में लाती है। कहानी के एक तरफ तीन चेहरे, दूसरी तरफ ताकतवर सिस्टम सीरीज की कहानी एक बेरोजगार वकील, एक नई पुलिस अफसर और 17 साल की लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है। तीनों का सामना ऐसी सत्ता से होता है, जिसे सिस्टम जितना ताकतवर बताया गया है। यहीं से कहानी कोर्टरूम ड्रामा से आगे बढ़कर सत्ता, न्याय और सच बोलने की हिम्मत के संघर्ष में बदलती है। करण इसे ‘डेविड बनाम गोलियत’ की कहानी बताते हैं यानी ताकत के भारी अंतर के बावजूद मुकाबले में उतरने की कहानी। करण बोले- उन महिलाओं को सलाम, जो हर रोज लड़ाई लड़ रही हैं सीरीज को लेकर करण का कहना है कि उनका मकसद किसी धार्मिक विवाद में पड़ना नहीं बल्कि महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा के गंभीर मुद्दे पर फोकस करना था। वह कहते हैं, “यह उन महिलाओं को सलाम है जो हर रोज लड़ाई लड़ रही हैं। यह डेविड बनाम गोलियत की कहानी है, सच बोलने की हिम्मत की कहानी।” इसी वजह से ‘हुंकार’ में न्याय की लड़ाई के साथ उस लड़ाई की मानसिक कीमत को भी महत्वपूर्ण जगह दी गई है। अनीत पड्डा पर फिर करण का भरोसा सीरीज में अनीत पड्डा मुख्य भूमिका में हैं। करण इससे पहले उन्हें शॉर्ट फिल्म ‘खट्टी मीठी यादें’ और ‘बिग गर्ल्स डोंट क्राई’ में निर्देशित कर चुके हैं। वह अनीत को ऑर्गेनिक और मेथड एक्टर बताते हैं। पुराने अनुभव के बाद अब दोनों ‘हुंकार’ में एक बार फिर साथ आए हैं। फातिमा सना शेख ने जांच अधिकारियों और उनके परिवारों से की मुलाकात फातिमा सना शेख ने भी अपने किरदार की तैयारी को सिर्फ स्क्रिप्ट तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने भूमिका को समझने के लिए कई जांच अधिकारियों और उनके परिवारों से मुलाकात की। इस तैयारी के जरिए किरदार और उसकी पेशेवर तथा निजी दुनिया को करीब से समझने की कोशिश की गई। डर, ट्रॉमा और अदालत के बीच आखिर किसकी हुई जीत ‘हुंकार: द रोर’ का निर्माण बिरला स्टूडियोज, अप्लॉज एंटरटेनमेंट, प्रियंका चोपड़ा की पर्पल पेबल पिक्चर्स और मंगटा फिल्म्स ने किया है। सीरीज 25 सितंबर से जियोहॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही है।



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