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नई दिल्ली। वित्त वर्ष 2026-27 के पहले चार महीनों में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा 4.55 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पूरे वित्त वर्ष के लिए तय 16.96 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान का करीब 27 प्रतिशत है। वित्त मंत्रालय की ओर से सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जुलाई के दौरान सरकार ने जितनी कमाई की, उससे 4.55 लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च किए। 13.07 लाख करोड़ की प्राप्तियां, 17.62 लाख करोड़ का खर्च अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान केंद्र सरकार की कुल प्राप्तियां 13.07 लाख करोड़ रुपये रहीं। यह पूरे वित्त वर्ष के बजट अनुमान का 35.8 प्रतिशत है। इसी अवधि में सरकार का कुल व्यय 17.62 लाख करोड़ रुपये रहा, जो सालाना बजट अनुमान का 32.9 प्रतिशत है। प्राप्तियों और व्यय के बीच 4.55 लाख करोड़ रुपये का अंतर रहा। यही सरकार का राजकोषीय घाटा है। सरल भाषा में क्या होता है राजकोषीय घाटा जब सरकार की कुल कमाई उसके कुल खर्च से कम रह जाती है, तो दोनों के बीच के अंतर को राजकोषीय घाटा कहा जाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को आमतौर पर बाजार या दूसरे माध्यमों से उधार लेना पड़ता है। राजकोषीय घाटा बढ़ने से सरकारी कर्ज और ब्याज का बोझ बढ़ सकता है, जबकि नियंत्रित घाटा वित्तीय अनुशासन का संकेत माना जाता है। पूरे साल घाटा 16.96 लाख करोड़ तक सीमित रखने का लक्ष्य केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को 16.96 लाख करोड़ रुपये तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। यह सकल घरेलू उत्पाद के अनुमानित आकार का 4.3 प्रतिशत है। पहले चार महीनों में इस सीमा का लगभग 27 प्रतिशत इस्तेमाल हो चुका है। अब आने वाले महीनों में कर संग्रह, विनिवेश, सरकारी खर्च और उधारी की रफ्तार तय करेगी कि सरकार सालाना लक्ष्य के भीतर रह पाती है या नहीं। करों से सरकार को मिले 8.45 लाख करोड़ रुपये सरकार की कुल प्राप्तियों में सबसे बड़ा हिस्सा कर राजस्व का रहा। पहले चार महीनों में विभिन्न करों से केंद्र सरकार को 8.45 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इसके अलावा गैर-कर राजस्व से 4.23 लाख करोड़ रुपये और ऋण से अलग पूंजीगत प्राप्तियों से 39.14 हजार करोड़ रुपये सरकारी खजाने में आए। गैर-कर राजस्व में लाभांश, शुल्क और सरकारी सेवाओं से होने वाली आय जैसी मदें शामिल होती हैं। ऋण से इतर पूंजीगत प्राप्तियों में विनिवेश और ऋण की वसूली जैसी आय आती है। राज्यों को 3.72 लाख करोड़ रुपये का कर हस्तांतरण केंद्र सरकार ने अप्रैल से जुलाई के दौरान राज्यों को केंद्रीय करों में उनकी हिस्सेदारी के रूप में 3.72 लाख करोड़ रुपये दिए। यह राशि पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 56.19 हजार करोड़ रुपये कम रही। राज्यों के लिए कर हिस्सेदारी उनकी विकास योजनाओं, कल्याणकारी कार्यक्रमों और प्रशासनिक खर्च का महत्वपूर्ण स्रोत होती है। राजस्व खर्च पर गए 13.11 लाख करोड़ रुपये सरकार के कुल 17.62 लाख करोड़ रुपये के खर्च में से 13.11 लाख करोड़ रुपये राजस्व खाते पर खर्च हुए। राजस्व व्यय में वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान, सब्सिडी और प्रशासनिक खर्च जैसी मदें शामिल होती हैं। इन खर्चों से सामान्यतः कोई नई स्थायी संपत्ति तैयार नहीं होती। इसके विपरीत सरकार ने 4.51 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत खाते पर खर्च किए। पूंजीगत व्यय का इस्तेमाल सड़क, रेलवे, भवन, मशीनरी और अन्य बुनियादी ढांचे जैसी संपत्तियों के निर्माण में किया जाता है। ब्याज भुगतान ने खींचा सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा राजस्व खाते के खर्च में सबसे बड़ा दबाव पुराने कर्ज पर ब्याज भुगतान का रहा। चार महीनों में सरकार ने इस मद में 4.27 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। यह कुल राजस्व व्यय का करीब एक-तिहाई है। इसका अर्थ है कि सरकार के रोजमर्रा के खर्च का बड़ा हिस्सा पहले से लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहा है। ब्याज का अधिक बोझ सरकार के पास विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक योजनाओं के लिए उपलब्ध राशि को सीमित कर सकता है। कमाई बढ़ाने और खर्च संभालने की चुनौती सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के लिए पर्याप्त खर्च बनाए रखना, दूसरी ओर राजकोषीय घाटे को 4.3 प्रतिशत के लक्ष्य के भीतर सीमित रखना। कर संग्रह मजबूत रहता है और गैर-कर आय बजट अनुमान के अनुरूप आती है तो सरकार को लक्ष्य हासिल करने में मदद मिल सकती है। लेकिन ब्याज, सब्सिडी और अन्य राजस्व खर्च बढ़ने की स्थिति में वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल अप्रैल-जुलाई के आंकड़े बताते हैं कि सरकार ने सालाना राजकोषीय घाटे की सीमा का करीब एक-चौथाई से अधिक हिस्सा पहले चार महीनों में इस्तेमाल कर लिया है, जबकि सरकारी खर्च में ब्याज भुगतान अब भी सबसे बड़े दबावों में शामिल है।