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वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के खिलाफ नए प्रतिबंध विधेयक पर हस्ताक्षर कर रूसी तेल एवं गैस खरीदने वाले देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोल दिया है, जिससे भारत और चीन पर नए अमेरिकी शुल्क का खतरा बढ़ गया है। हालांकि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है। नया कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा करने का अधिकार देता है। भारत पर यह शुल्क लगेगा या नहीं और अगर लगेगा तो इसकी दर कितनी होगी, इसका फैसला श्री ट्रंप कर सकते हैं। रूस के खिलाफ इस व्यापक प्रतिबंध वालू विधेयक को रिपब्लिकन बहुमत वाले अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने ट्रंप के हस्ताक्षर से दो दिन पहले 262 के मुकाबले 159 वोटों से पारित किया था। रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ का प्रावधान बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक नए कानून का मकसद यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए रूस के पास पहुंचने वाले वित्तीय संसाधनों को कम करना है। इसके दायरे में रूसी अधिकारी, बैंक, ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हित और रूस के सैन्य अभियानों का समर्थन करने वाली विदेशी संस्थाएं शामिल हैं। अमेरिकी हाउस की वेज एंड मीन्स कमेटी के मुताबिक, कानून में रूसी सामान पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा रूसी तेल और गैस की खरीद से जुड़े प्रावधानों के दायरे में आने वाले देशों के सामान पर अमेरिका 100 प्रतिशत तक शुल्क लगा सकता है। इसमें रूसी ऊर्जा के बड़े आयातकों के साथ तेल प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले प्रमुख पक्षों को भी निशाना बनाया गया है। कानून में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और रूस सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ प्रतिबंध लगाने के प्रावधान भी शामिल हैं। भारत पर 100% टैरिफ तय नहीं, फिर क्यों बढ़ी चिंता भारत के लिए इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सेकेंडरी टैरिफ यानी रूस के साथ कारोबार करने वाले तीसरे देशों पर लगाए जा सकने वाले शुल्क से जुड़ा है। डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी होयर की ओर से पेश एक संशोधन में 10 देशों चीन, भारत, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्किये, सिंगापुर, अजरबैजान, कजाखस्तान, हंगरी, किर्गिस्तान और स्लोवाकिया का स्पष्ट रूप से नाम लिया गया था। इन्हें कानून के सेकेंडरी टैरिफ प्रावधान के तहत 100 प्रतिशत तक टैरिफ के दायरे में लाने की बात थी। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लग गया है। श्री ट्रंप अगर कानून से मिले अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तभी भारत पर यह शुल्क लगाया जा सकता है यानी फिलहाल भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा नहीं है, बल्कि इसका खतरा पैदा हुआ है। ट्रंप ने लगाया 100% टैरिफ तो बढ़ सकता है भारतीय सामान पर बोझ अमेरिका फिलहाल नई दिल्ली से होने वाले आयात पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाता है। इसे जबरन श्रम से बने सामान के आयात को रोकने के लिए पर्याप्त कदम न उठाने से जुड़ा दंड बताया गया है। यदि श्री ट्रंप नए रूस प्रतिबंध कानून के तहत भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला करते हैं तो यह मौजूदा 10 प्रतिशत शुल्क के ऊपर लगाया जा सकता है।हालांकि भारतीय निर्यात पर इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह अमेरिका की ओर से नई टैरिफ दरों की घोषणा के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। रूसी तेल पर पहले भी भारत-अमेरिका में बढ़ चुका है तनाव रूसी कच्चे तेल की भारतीय खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के रिश्तों में पहले भी तनाव पैदा हुआ था। श्री ट्रंप ने पिछले साल रूसी कच्चा तेल आयात करने के कारण भारतीय सामान पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। यह पहले से मौजूद 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ यानी पारस्परिक शुल्क के अतिरिक्त था। हालांकि फरवरी 2026 में रूसी तेल से जुड़ा अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ हटा लिया गया था। इसके साथ ही यूएस-इंडिया ट्रेड फ्रेमवर्क के तहत रेसिप्रोकल टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया था। अब नए रूस प्रतिबंध कानून ने भारत पर अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। भारत का दो टूक जवाब—1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा प्राथमिकता गौरतलब है कि अमेरिकी कांग्रेस में रूस प्रतिबंध विधेयक पारित होने के बाद भारत ने अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया था। भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारत बदलती बाजार परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा खरीदना जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि रूस के साथ भारत के तेल व्यापार के मुद्दे पर हाल के महीनों में विभिन्न अमेरिकी प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अमेरिकी पक्ष के सामने यह भी स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे के संभावित परिणाम केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।



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