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(सिविल सर्विसेज अभ्यर्थियों के लिए विशेष) नई दिल्ली। सोचिए एक ऐसी फैक्ट्री जो खुद अपनी गलतियां पकड़ ले, एक ऐसा अस्पताल जो मरीज की बीमारी को असल इलाज से पहले वर्चुअली टेस्ट कर ले या एक ऐसी खदान जहां इंसान को जोखिम भरी जगह जाना ही न पड़े। यह विज्ञान-कथा नहीं बल्कि भारत के साइबर-फिजिकल सिस्टम्स (सीपीएस) मिशन की असल तस्वीर है। डिजिटल दुनिया और भौतिक दुनिया के इस संगम ने मशीनों को एक नई पहचान दी है। अब वे सिर्फ आदेश नहीं मानतीं बल्कि समझती हैं, विश्लेषण करती हैं और खुद फैसला लेती हैं। आखिर है क्या यह साइबर-फिजिकल सिस्टम सीपीएस दरअसल सेंसर, सॉफ्टवेयर और कम्युनिकेशन नेटवर्क का ऐसा मेल है जो कंप्यूटिंग टेक्नोलॉजी को भौतिक मशीनों से जोड़ता है। नतीजा यह होता है कि मशीनें अपने आसपास के माहौल को महसूस कर पाती हैं, डेटा को प्रोसेस कर पाती हैं और बदलती परिस्थितियों पर तुरंत प्रतिक्रिया दे पाती हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में इसकी झलक हर तरफ मिलती है: - ड्राइवरलेस कारें जो बिना इंसानी दखल के सड़कों पर दौड़ती हैं - स्मार्ट फैक्ट्रियां जो प्रोडक्शन प्रोसेस खुद मॉनिटर और एडजस्ट करती हैं - मेडिकल डिवाइस जो मरीज की लगातार निगरानी करते हैं - स्मार्ट बिल्डिंग्स जो रियल-टाइम डेटा से लाइटिंग और तापमान नियंत्रित करती हैं - घर में मौजूद रोबोट क्लीनर और फिटनेस ट्रैकर तक इसी तकनीक पर टिके हैं संक्षेप में कहें तो सीपीएस, कंप्यूटेशन, कम्युनिकेशन और फिजिकल प्रोसेस —इन तीनों को एक साथ जोड़कर इंटेलिजेंट और रिस्पॉन्सिव सिस्टम की नई पीढ़ी गढ़ रहा है। एनएम-आईसीपीएस: भारत की रणनीतिक पहल इस उभरते क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) 'इंटरडिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स पर राष्ट्रीय मिशन' (एनएम-आईसीपीएस) को लागू कर रहा है। > याद रखने लायक तथ्य (यूपीएससी प्रीलिम्स के लिए): > मंज़ूरी: केंद्रीय मंत्रिमंडल, 2018 > बजट: 3,660 करोड़ रुपये , नौ वर्षों की अवधि के लिए > नोडल विभाग: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग यह मिशन एकेडेमिया, इंडस्ट्री, सरकार और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को एक मंच पर लाकर वैज्ञानिक शोध को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और औद्योगिक जरूरतों से जोड़ता है यानी सिर्फ शोध एवं विकास (आरएंडडी) तक सीमित न रहकर, यह ट्रांसलेशनल रिसर्च, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और स्टार्ट-अप इनक्यूबेशन तक का पूरा सफर तय करता है। 25 हब, 4 सुपर-पार्क: मिशन की रीढ़ मिशन के तहत देशभर के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में 25 प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र (टीआईएच) बनाए गए हैं, जो सेक्शन 8 कंपनियों के रूप में काम करते हैं। ये हब चार मोर्चों पर सक्रिय हैं: 1. प्रौद्योगिकी विकास 2. मानव संसाधन एवं कौशल विकास 3. नवाचार, उद्यमिता और स्टार्ट-अप विकास 4. अंतरराष्ट्रीय सहयोग 2025 में इनमें से चार बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले हब को 'टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशन रिसर्च पार्क'/प्रौद्योगिकी रूपांतरण अनुसंधान पार्क (टीटीआरपी) का दर्जा दिया गया ताकि तकनीक को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने की रफ्तार तेज हो सके: आईआईटी कानपुर: साइबर सुरक्षा भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु: रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आईआईटी-आईएसएम धनबाद: खनन प्रौद्योगिकी आईआईटी इंदौर: डिजिटल स्वास्थ्य सेवा आंकड़ों में मिशन की ताकत (अगस्त 2026 तक) 1146 प्रौद्योगिकी को सक्षम बनाया गया, साथ ही आईपी निर्माण और लाइसेंसिंग को बढ़ावा 1329 प्रौद्योगिकी उत्पाद- कृषि, हेल्थकेयर, माइनिंग, साइबरसिक्योरिटी, एडवांस्ड कम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में 5824 फेलोशिप — अंडरग्रेजुएट से लेकर पोस्टडॉक्टरल शोधार्थियों तक को समर्थन 2.46 लाख+ प्रोफेशनल्स को कौशल विकास प्रशिक्षण 1136 स्टार्ट-अप और स्पिन-ऑफ इनक्यूबेट, जिनसे 24,000+ रोजगार सृजित हुए 200 अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित ये आंकड़े साफ दिखाते हैं कि मिशन सिर्फ शोध-पत्रों तक सीमित नहीं बल्कि रोजगार और उद्यमिता का भी बड़ा इंजन बन चुका है। भारतजेन: सीपीएस की 'सोचने' वाली परत जैसे-जैसे सिस्टम स्मार्ट होते जा रहे हैं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मशीनों, लोगों और भौतिक परिवेश के बीच की कड़ी बनता जा रहा है। इसी सोच के साथ एनएम-आईसीपीएस के तहत समर्थित 'भारतजेन' पहल भारतीय भाषाओं और संदर्भों के अनुरूप सॉवरेन एआई क्षमताएं विकसित कर रही है। आईआईटी बॉम्बे के नेतृत्व में बना भारतजेन कई मायनों में अनूठा है: परम-2 : 17 अरब पैरामीटर वाला फाउंडेशन मॉडल, जो भारत की सभी 22 अनुसूचित भाषाओं को सपोर्ट करता है श्रुतम : स्पीच-टू-टेक्स्ट मॉडल सूक्तम : टेक्स्ट-टू-स्पीच मॉडल (दोनों 12 भारतीय भाषाओं में) पत्रम : 'डॉकबोध' फ्रेमवर्क के तहत जटिल भारतीय दस्तावेजों को कई भाषाओं में सुलभ बनाने वाला टूल डोमेन-विशिष्ट मॉडल — आयुर्परम (आयुर्वेद), कृषि परम (कृषि), कानूनी परम (कानूनी क्षेत्र) यानी भारतजेन, सीपीएस इकोसिस्टम में एक संप्रभु, बहुभाषी और बहुआयामी 'इंटेलिजेंस लेयर' जोड़ रहा है, जो ग्रामीण-शहरी दोनों संदर्भों में स्थानीय भाषा में निर्णय लेने में मदद कर सकता है। प्रयोगशाला से जमीन तक: क्षेत्रवार असर स्वास्थ्य सेवा: आईआईटी इंदौर के दृष्टि सीपीएस फाउंडेशन ने 'चरकडीटी' नाम से इंसानी शरीर का एक डिजिटल ट्विन विकसित किया है, जो फेफड़ों, आंखों और दिल का सिमुलेशन कर बीमारी की प्रगति समझने और इलाज को वर्चुअली टेस्ट करने में मदद करता है। कृषि: आईआईटी बॉम्बे के शोधार्थियों द्वारा बनाया गया 'एग्री-आईओटी फार्म मैनेजमेंट सिस्टम' मिट्टी, मौसम और माइक्रो-क्लाइमेट पर नजर रखकर पानी और ऊवर्रक के सटीक इस्तेमाल में मदद करता है। खनन: आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के टेक्समीन हब ने ऐसे ड्रोन बनाए हैं जो 50 किलोमीटर तक डेटा भेज सकते हैं, जिससे खतरनाक इलाकों में इंसानी जोखिम घटता है। एडवांस्ड कम्युनिकेशन: आईआईटी बेंगलुरु द्वारा विकसित 5G-एडवांस्ड ओ-आरएएन मैसिव एमआईएमओ रेडियो यूनिट (32टीआर आरयू) दूर-दराज़ इलाकों तक किफायती और भरोसेमंद 5जी कनेक्टिविटी पहुंचा रही है। साइबर सुरक्षा: आईआईटी कानपुर का आईहब एनटीआईएचएसी फाउंडेशन अहम इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के लिए आईटी-ओटी सुरक्षा अभियान सेंटर चलाता है। साथ ही क्रिप्टोकरेंसी अपराधों की जांच के लिए क्रिप्टो-फोरेंसिक टूल भी विकसित किए हैं। मोबिलिटी और ऑटोनॉमस सिस्टम: आईआईटी हैदराबाद के तिहान फाउंडेशन ने ऑटोनॉमस नेविगेशन के लिए भारत का पहला समर्पित टेस्टिंग ग्राउंड बनाया है। वहीं आईआईएससी बेंगलुरु का आईआरएएसटीई एप्लीकेशन दुर्घटना-प्रवण जगहों की पहचान कर ड्राइवरों को रियल-टाइम अलर्ट देता है। फिलहाल इसका ट्रायल नागपुर में चल रहा है। (स्रोत: भारत सरकार) प्रमुख चुनौतियां प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंच: कई स्वदेशी तकनीकें सफल प्रदर्शन के बावजूद बड़े स्तर पर व्यावसायिक उपयोग तक नहीं पहुंच पातीं। इसके लिए पूंजी, उद्योग साझेदारी और सरकारी खरीद समर्थन जरूरी है। साइबर सुरक्षा और निजता: सेंसर आधारित प्रणालियां लगातार आंकड़े एकत्र करती हैं। स्वास्थ्य, परिवहन और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे से जुड़े संवेदनशील आंकड़ों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। कौशल असमानता: 2.46 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया है लेकिन भारत की विशाल आबादी और तेजी से बढ़ती तकनीकी जरूरतों को देखते हुए उन्नत कौशल विकास का दायरा और बढ़ाना होगा। तकनीकी मानक और आपसी अनुकूलता: अलग-अलग कंपनियों और संस्थानों द्वारा विकसित उपकरण तभी प्रभावी होंगे, जब वे साझा तकनीकी मानकों के अनुसार एक-दूसरे से संवाद कर सकें। नैतिक और कानूनी प्रश्न: चालक रहित वाहन दुर्घटना करे तो जिम्मेदारी किसकी होगी? कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित चिकित्सा निर्णय गलत हो तो जवाबदेही किसकी बनेगी? ऐसे प्रश्नों के लिए स्पष्ट कानून और नियामक व्यवस्था जरूरी है। आयातित हार्डवेयर पर निर्भरता: स्वदेशी सॉफ्टवेयर विकसित होने के बावजूद उन्नत चिप, सेंसर और कुछ संचार उपकरणों के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। आगे की राह भारत को साइबर-फिजिकल सिस्टम्स के विकास के लिए अनुसंधान, विनिर्माण और नियमन, तीनों को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। इसके लिए— स्वदेशी सेंसर और सेमीकंडक्टर निर्माण बढ़ाना उद्योगों में परीक्षण और अपनाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देना साइबर सुरक्षा मानक अनिवार्य करना तकनीक के नैतिक उपयोग के लिए कानूनी ढांचा बनाना विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच दीर्घकालीन साझेदारी विकसित करना छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों तक कौशल कार्यक्रम पहुंचाना सरकारी खरीद में स्वदेशी समाधानों को अवसर देना महत्वपूर्ण होगा। यूपीएससी अभ्यर्थियों के लिए क्यों अहम है यह विषय यह विषय प्रीलिम्स (साइंस-टेक करंट अफेयर्स) और मेन्स के जीएस-III (विज्ञान-प्रौद्योगिकी, अवसंरचना, रोजगार) दोनों के लिए उपयोगी है: सरकारी मिशनों के तहत बजट, नोडल एजेंसी और लक्ष्य जैसे तथ्य प्रीलिम्स में सीधे पूछे जा सकते हैं 'सॉवरेन एआई', 'डिजिटल ट्विन' जैसी अवधारणाएं निबंध व मेन्स उत्तरों को सैद्धांतिक गहराई देती हैं स्वदेशी तकनीक और आत्मनिर्भरता से जुड़े प्रश्नों में इसे उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है निष्कर्ष: तकनीक-संचालित 'विकसित भारत' की नींव एनएम-आईसीपीएस सिर्फ एक तकनीकी मिशन नहीं बल्कि भारत की आत्मनिर्भर और नवाचार-प्रेरित अर्थव्यवस्था की दिशा में एक ठोस कदम है। रिसर्च लैब से निकलकर खेत, खदान, अस्पताल और सड़क तक पहुंची यह तकनीक, दिखाती है कि जब एकेडेमिया, इंडस्ट्री और सरकार साथ आते हैं तो विज्ञान सिर्फ कागज़ों तक सीमित नहीं रहता बल्कि वह जमीन पर असर डालता है। भारतजेन जैसी पहलों के साथ यह मिशन अब एक कदम आगे बढ़कर भारतीय भाषाओं और जरूरतों में ढली 'सोच' भी जोड़ रहा है, जो आने वाले वर्षों में देश के डिजिटल और भौतिक ढांचे को एक नई दिशा दे सकती है। यूपीएससी मेन्स के संभावित प्रश्न 1. साइबर-फिजिकल सिस्टम्स क्या हैं? भारत के ‘राष्ट्रीय अंतर्विषयी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स मिशन की प्रमुख विशेषताओं और विकसित भारत के लक्ष्य में इसकी भूमिका का विश्लेषण कीजिए। 2. साइबर-फिजिकल सिस्टम्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एकीकरण भारत के स्वास्थ्य, कृषि, खनन और स्मार्ट अवसंरचना क्षेत्रों में किस प्रकार परिवर्तन ला सकता है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। 3. ‘स्वदेशी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स भारत की तकनीकी संप्रभुता और आत्मनिर्भरता की आधारशिला हैं।’ इस कथन की समीक्षा करते हुए इनके समक्ष मौजूद प्रमुख चुनौतियों और समाधान पर चर्चा कीजिए। 4. भारतजेन जैसी बहुभाषी स्वदेशी एआई पहलें साइबर-फिजिकल सिस्टम्स को किस प्रकार अधिक प्रभावी, समावेशी और भारत-केंद्रित बना सकती हैं? विवेचना कीजिए। 5. राष्ट्रीय अंतर्विषयी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स मिशन के अंतर्गत स्थापित टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब और टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशन रिसर्च पार्क अनुसंधान से उद्योग तक तकनीक पहुंचाने में किस प्रकार योगदान दे रहे हैं? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। निबंध हेतु संभावित विषय "मशीनें जब सोचने लगती हैं: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भौतिक जगत का संगम" "आत्मनिर्भर भारत की डिजिटल नींव" "विज्ञान तभी सार्थक है जब वह धरातल पर उतरे"



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