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(संजय कौशिक की विशेष रिपोर्ट) काठमांडू/मोतिहारी। नेपाल के रसुवा में आई विनाशकारी बाढ़ को सात दिन बीत चुके हैं लेकिन सैकड़ों परिवारों के लिए समय जैसे वहीं ठहर गया है, उन सुरंगों के मुहाने पर, जहां उनके अपने लोग आखिरी बार काम के लिए दाखिल हुए थे। किसी के पास मौत की पुष्टि नहीं....किसी के पास जीवन की खबर नहीं..... बस इंतजार है और हर गुजरते घंटे के साथ कमजोर पड़ती उम्मीद। कैलाली के बर्दागोरिया ग्रामीण नगर पालिका-5 के भुवन वागले का परिवार भी इसी अंतहीन प्रतीक्षा में है। भुवन अप्रैल से रसुवा के हाकुबेसी स्थित 216 मेगावाट की अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना में प्रयोगशाला सहायक के रूप में काम कर रहे थे। परिवार को मिली जानकारी के मुताबिक 26 अगस्त की सुबह वह अन्य कर्मचारियों के साथ काम के लिए सुरंग में गए थे। इसके बाद आई बाढ़ ने रास्ते, संपर्क और खबर, सब कुछ निगल लिया। भुवन के चाचा शिवराज वागले के लिए अब हर सूची उम्मीद और डर का नया पन्ना बनकर सामने आती है। उन्होंने अस्पतालों में घायलों की सूची देखी, बचाए गए लोगों के नाम तलाशे, मृतकों की सूची खंगाली लेकिन कहीं भुवन नहीं मिले। शिवराज कहते हैं, “मैंने अपने सभी परिचितों से बात की है, सांसद से भी बात की। बस यही जवाब मिलता है कि बचाव कार्य जारी है और कीचड़ के कारण देरी हो रही है।” शिवराज की आवाज में शिकायत से ज्यादा एक परिवार की बेबसी है, “हमें बस इतना चाहिए कि भुवन को खोजा जाए।” भुवन के माता-पिता भी भारत के बेंगलुरु से नेपाल पहुंच चुके हैं। 31 अगस्त को काठमांडू पहुंचे और एक सितंबर को बिदुर स्थित सेना के बचाव एवं राहत केंद्र पहुंचे। बेटे की कोई खबर मिलेगी, शायद इसी उम्मीद ने उन्हें हजारों किलोमीटर का सफर तय कराया है। 639 से 900 तक लापता लोगों के आंकड़ों के पीछे छुपे हैं सैकड़ों परिवार राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के एक सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ के बाद विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं से करीब 639 लोग लापता बताए गए हैं जबकि इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ऑफ नेपाल (आईपीपीएएन) के अनुसार त्रिशूली और भोटेकोशी नदी गलियारे में स्थित विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं में करीब 900 श्रमिकों के लापता होने की खबर है। ये आंकड़े महज संख्याएं नहीं हैं। इनके पीछे ऐसे घर हैं, जहां फोन की हर घंटी उम्मीद जगाती है और हर खामोशी भय को और गहरा कर देती है। ऊपरी त्रिशूली-1, रसुवागढ़ी, चिलिमे, लांगटांग खोला, मैलुंग खोला और रसुवा-भोटेकोशी जैसी परियोजनाओं के अलावा ऊपरी त्रिशूली-3 'ए', ऊपरी त्रिशूली-3 'बी', त्रिशूली, देवीघाट और मध्य त्रिशूली गंगा परियोजनाओं तथा नुवाकोट की सौर परियोजनाओं से भी इंजीनियरों, तकनीशियनों और कर्मचारियों के संपर्क टूटने की सूचना है। सबसे बड़ा सवाल यही है, वे कहां हैं? सुरंगों में जिंदगी से जूझ रहे हैं या बाढ़ की भयावह धार उन्हें अपने साथ बहा ले गई? अभी इसका कोई निश्चित उत्तर नहीं है। ड्रोन ने सुरंग के भीतर देखा अंधेरा ऊपरी त्रिशूली-1 परियोजना की सुरंग में ड्रोन भेजे गए। ड्रोन संचालक आदर्श भुसाल बताते हैं कि प्लेटफॉर्म-1 तक पहुंचने पर सुरंग पानी और चट्टानों से पूरी तरह भरी मिली। उन्होंने कहा, “अंदर जाना जोखिम भरा और चुनौतीपूर्ण है”। ड्रोन को सुरंग के भीतर जीवन का कोई संकेत नहीं मिला। लेकिन किसी संकेत का न मिलना मृत्यु का प्रमाण भी नहीं है। यही वह पतली डोर है जिसे भुवन जैसे लापता लोगों के परिवार पकड़े हुए हैं। नेपाल टनलिंग एसोसिएशन के सचिव छत्र बहादुर बसनेट के अनुसार, बाढ़ के बाद 100 से अधिक इंजीनियरों के लापता होने की सूचना है। उनका कहना है कि सुरंगों की तकनीकी जटिलता को देखते हुए अनुभवी सुरंग विशेषज्ञों को बचाव अभियान में सीधे शामिल किया जाना चाहिए। एसोसिएशन के उपाध्यक्ष कांगड़ा प्रसाई ने भी अभियान की गति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि सरकार के आश्वासन के बावजूद बचाव कार्य अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाया। उन्होंने सुरंगों से कीचड़ और पानी हटाने के लिए विशेषज्ञ तकनीक और मशीनों के इस्तेमाल की जरूरत बताई। एसोसिएशन के सचिव छत्र बहादुर बसनेट कहते हैं कि सुरंगों में फंसे लोगों के जीवित मिलने की उम्मीद हर गुजरते दिन के साथ कम होती जा रही है, लेकिन उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है। उनके मुताबिक सुरंगों में 17 दिनों तक जीवित लोगों के बचने के विश्व रिकॉर्ड मौजूद हैं। इसलिए हर मिनट महत्वपूर्ण है। परिवारों की बेचैनी और सरकार का तर्क बाढ़ के बाद नेपाल सरकार ने खोज, बचाव और राहत के लिए एकल-खिड़की प्रणाली लागू की। प्रभावित परिवारों और परियोजना संचालकों का आरोप है कि इससे शुरुआती दिनों में बचाव अभियान की गति प्रभावित हुई। हालांकि राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के कार्यकारी प्रमुख धर्मराज उप्रेती इस आरोप से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि “यह एक मानवीय मामला है; किसी को भी प्रतिबंधित नहीं किया गया है”। उनके अनुसार बाढ़ के अगले दिन से ही भारत और चीन के खोज एवं बचाव विशेषज्ञों को तैनात किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि भौगोलिक और अन्य संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखते हुए बड़े पैमाने पर विदेशी बचाव दल बुलाना संभव नहीं था। सरकार के मुताबिक सोमवार से प्रभावित जलविद्युत परियोजनाओं को भी सरकारी समन्वय में खोज एवं बचाव अभियान में शामिल होने की अनुमति दी गई। आईपीपीएएन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष उत्तम भ्लोन लामा ने कहा कि निजी जलविद्युत कंपनियों को मंगलवार से अभियान में शामिल होने की अनुमति मिली। उन्होंने कहा, “अब बहुत देर हो चुकी है। फिर भी इसे सकारात्मक रूप से लेते हुए हम खोज और बचाव कार्य में शामिल हो रहे हैं।" सुरंगों में चट्टानों और पानी ने ने रोका सेना का रास्ता नेपाली सेना के एक सितंबर शाम तक के आंकड़ों के अनुसार हवाई, जमीनी और सुरंगों में खोज एवं बचाव अभियान जारी था और अब तक एक विदेशी नागरिक सहित 118 लोगों को बचाया जा चुका था। चिलिमे हाइड्रो में विदेशी विशेषज्ञों सहित 26 सदस्यीय संयुक्त टीम सुरंग में करीब 150 मीटर अंदर तक पहुंची, लेकिन आगे खड़ी ढलान और पूरी तरह दबी सुरंग ने रास्ता रोक दिया। हाकु स्थित अपर त्रिशूली-1 में भी विदेशी विशेषज्ञों सहित संयुक्त टीम करीब 160 मीटर अंदर तक पहुंची, लेकिन सुरंग अवरुद्ध मिली। त्रिशूली-3 'ए' में मिट्टी हटाने और सुरंग में छेद बनाने के बाद पानी का तेज प्रवाह सामने आया, जिससे अंदर प्रवेश करना असंभव हो गया। अब सुरंग के निकास द्वार से नया मुहाना बनाने का प्रयास जारी है। त्रिशूली-3 'बी' में पहुंच मार्ग तैयार करने के लिए खुदाई जारी है। सेना ने त्रिशूली नदी किनारे प्रभावित इलाकों में पांच स्थानों पर दोहरे रोपवे बनाने का काम भी शुरू किया है। नुवाकोट के बिदुर नगरपालिका-9 स्थित इंद्रायणी घाट पर करीब 250 मीटर लंबा रोपवे तैयार किया गया है, जिससे प्रभावित लोगों को बाजार और अस्पताल तक पहुंचने में मदद मिलेगी। लेकिन इन अभियानों के बीच भुवन जैसे सैकड़ों नाम अभी भी किसी सूची में अपने अंतिम सत्य की तलाश कर रहे हैं। सुरंग के मुहाने पर टिकी निगाहें कैलाली में भुवन का परिवार अब हर गुजरते पल को गिन रहा है। मां-बाप बिदुर पहुंच चुके हैं। चाचा शिवराज लगातार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और परिचितों से संपर्क कर रहे हैं। उनके पास न कोई शव है, न कोई निश्चित सूचना। सिर्फ एक आखिरी संभावना है कि भुवन कहीं उस अंधेरी सुरंग में जिंदगी से लड़ रहे हों। आपदा के बाद सबसे कठिन समय वह होता है जब मृत्यु की पुष्टि भी नहीं होती और जीवन की खबर भी नहीं आती। भुवन के परिवार के लिए रसुवा की वह सुरंग अब सिर्फ कंक्रीट, पत्थर और कीचड़ से बनी संरचना नहीं है। उसके अंधेरे में एक बेटे, एक भतीजे और एक परिवार की पूरी दुनिया अटकी हुई है। रसुवा की पहाड़ियों के बीच, मलबे और पानी से बंद सुरंगों के बाहर, सैकड़ों परिवार शायद इसी एक सवाल के साथ खड़े हैं, “क्या अंदर अभी कोई सांस बाकी है?”