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(संजय कौशिक की विशेष रपट) काठमांडू/मोतिहारी। रसुवा की पहाड़ियों के बीच 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी अचानक जब विकराल हुई, तो वह सिर्फ पानी नहीं थी, वह एक ऐसी अंधी शक्ति थी, जो अपने रास्ते में आने वाली हर पहचान मिटाती चली गई। घर बह गए, सड़कें टूट गईं, सपने मलबे में दब गए और न जाने कितने परिवारों से उनके अपने हमेशा के लिए जुदा हो गए। पानी का वेग थम गया है। लेकिन जिन्होंने अपने किसी को खोया है, उनके भीतर की बाढ़ अब भी उतनी ही प्रचंड है। उनके लिए आपदा खत्म नहीं हुई। उनके लिए तलाश अभी जारी है। ट्रॉमा सेंटर की दीवारें अब अस्पताल नहीं, बिछड़े रिश्तों का पता हैं काठमांडू के ट्रॉमा सेंटर की दीवारें इन दिनों केवल अस्पताल की दीवारें नहीं रह गई हैं। वे एक ऐसे समाज की सामूहिक स्मृति बन गई हैं, जिसने अचानक अपने लोगों को खो दिया। ट्रॉमा सेंटर की दीवारों पर इन दिनों दवाओं, उपचार और चिकित्सा से अलग एक और कहानी लिखी जा रही है। वहां तस्वीरें चिपकाई जा रही हैं। रसुवा की भोटेकोशी बाढ़ के बाद लापता हुए लोगों की तस्वीरें। किसी तस्वीर के नीचे नाम है, किसी के नीचे गांव का पता। किसी में उम्र लिखी है तो किसी में पहचान का कोई निशान। इन दीवारों पर चिपकी हर तस्वीर के पीछे एक ऐसा परिवार है, जिसकी जिंदगी एक सवाल पर अटक गई है, “वह कहां है?” किसी मां की आंखें दरवाजे पर टिकी हैं। किसी पत्नी को हर फोन की घंटी में अपने पति की आवाज सुनाई देती है। किसी पिता को भरोसा है कि उसका बेटा किसी अस्पताल में होगा। किसी बच्चे को शायद अब भी लगता है, पापा शाम को घर लौटेंगे। इसी उम्मीद ने तस्वीरों को ट्रॉमा सेंटर की दीवार तक पहुंचाया है। तस्वीरों में अपनों की तलाश, आंखों में ठहरी उम्मीद काठमांडू के वसुंधरा में पढ़ाई कर रही 18 वर्षीय सुजिता ढकाल हाथों में अपने बाबा शिवप्रसाद ढकाल की तस्वीर और आंखों में आंसू लिए ट्रॉमा सेंटर पहुंची हैं। कैलाली के घोडाघोड़ी निवासी 28 वर्षीय नेपाली सेना के जवान तपेन्द्र जंग कुँवर रसुवागढ़ी के टिमुरे बैरक से लापता हैं। सुजिता की तरह ही भाई की तलाश में बहन मंजू पौडेल सैनिक अस्पताल, जंगी अड्डे और विभिन्न अस्पतालों के चक्कर काट कर इस उम्मीद के साथ ट्रामा सेंटर पहुंची हैं की यहां उनका भाई मिल जाएगा। जब आखिरी उम्मीद भी एक तस्वीर बनकर दीवार पर टंग गई नुवाकोट के तुप्छे बाजार में भूस्खलन में अपनी छोटी भांजी रोनुका अर्याल, उनके पति और सास-ससुर को खो चुके राजन कोइराला और उनकी पत्नी भी ट्रॉमा सेंटर शवगृह तक पहुंचे। क्षत-विक्षत शवों को उलट-पुलट कर भांजी की पहचान खोजी, लेकिन वह नहीं मिली। कोइराला दंपति की तलाश अब एक ऐसी पीड़ा बन चुकी है, जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है। भावुक राजन कहते हैं, “सड़ चुके, चमड़ी उतर चुके और कीड़े पड़ चुके उन शरीरों में से एक शव कहीं मेरी ही भांजी का तो नहीं है, यह सोचकर टटोल-टटोल कर देखा, फिर भी वह नहीं मिली। जाने कहां और कैसी होगी?” थकान, भय और अनिश्चितता के बीच दंपति ने भांजी की तस्वीर पर अपना संपर्क नंबर लिखकर उसे ट्रॉमा सेंटर की दीवार पर चिपका दिया है। अब वह तस्वीर महज पहचान नहीं, एक परिवार की आखिरी उम्मीद है कि कोई उसे देखेगा, पहचान लेगा और शायद किसी दिन फोन की दूसरी तरफ से वह खबर आएगी, जिसका इंतजार इन परिवारों की आंखें अब भी कर रही हैं। हर तस्वीर के पीछे एक संसार है दीवार पर चिपका बेजान सा कागज बाहर से देखने पर महज एक तस्वीर है। लेकिन किसी परिवार के लिए वह तस्वीर उसका पूरा संसार है। उस चेहरे में किसी की हंसी है, किसी की आवाज है, किसी के कदमों की आहट है और किसी घर की रोजमर्रा की जिंदगी है। बाढ़ किसी व्यक्ति को सिर्फ शरीर से नहीं छीनती। वह घर से उसकी आवाज छीन लेती है। आंगन से उसकी प्रतीक्षा छीन लेती है। और परिवार से भविष्य का एक हिस्सा छीन लेती है। इसलिए परिजन तस्वीरें लेकर अस्पतालों की दीवारों तक आए हैं, शायद कोई पहचान ले, शायद कोई खबर मिल जाए, शायद कहीं से आवाज आए, “वह जीवित है।” लापता होने का दर्द : मृत्यु से भी लंबी है प्रतीक्षा मृत्यु का समाचार कितना भी असहनीय क्यों न हो, उसमें एक अंतिम सत्य होता है। लेकिन लापता होने की पीड़ा में अंत नहीं होता। हर सुबह उम्मीद जगती है। हर फोन पर दिल धड़कता है। हर अस्पताल की सूची में आंखें किसी नाम को तलाशती हैं। हर अनजान चेहरे में अपने व्यक्ति की शक्ल दिखाई देती है। और हर शाम उम्मीद को फिर अगले दिन तक टाल दिया जाता है। यही कारण है कि ट्रॉमा सेंटर की दीवार पर चिपकी तस्वीरें सिर्फ पहचान के लिए नहीं हैं। वे उस उम्मीद की आखिरी डोर हैं, जिसे कोई परिवार अपने हाथों से छूटने नहीं देना चाहता। ट्रॉमा सेंटर की दीवार पर टंगी तस्वीरें सबसे बड़ी पुकार हैं इन सारी तस्वीरों के बीच शायद सबसे मार्मिक तस्वीर वह है, जो किसी मां ने अपने बेटे की चिपकाई होगी। या किसी पत्नी ने अपने पति की। या किसी बच्चे ने अपने पिता की। वे तस्वीरें चीखती नहीं हैं। वे कोई भाषण नहीं देतीं। वे केवल चुपचाप दीवार पर टंगी रहती हैं। लेकिन उनकी खामोशी में एक पूरी दुनिया की पुकार छिपी है, “उसे ढूंढ़ दीजिए।” बाढ़ का पानी उतर गया, मगर इंतजार जारी नदी धीरे-धीरे अपने सामान्य रूप में लौट जाएगी। मलबा हटेगा। सड़कें बनेंगी। पुल फिर खड़े होंगे। घर फिर बनाए जाएंगे। लेकिन किसी लापता व्यक्ति की तस्वीर के सामने खड़ा परिवार किस तरह अपने भीतर का घर बनाएगा? इसका कोई नक्शा नहीं है। किसी योजना में इसका बजट नहीं है। किसी राहत पैकेज में इसका मुआवजा नहीं है। भौतिक क्षति की भरपाई हो सकती है। मानवीय क्षति की नहीं। नदी बहुत कुछ बहा ले गई, लेकिन उम्मीद किनारे पर रह गई भोटेकोशी ने घर बहाए। रिश्ते बहाए। सपने बहाए। यादें बहाईं। लेकिन वह उम्मीद नहीं बहा सकी, जिसके सहारे एक परिवार आज भी किसी अस्पताल की दीवार पर अपनों की तस्वीर चिपका रहा है। शायद यही मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है, सब कुछ खो जाने के बाद भी किसी एक संभावना को बचाए रखना। किसी मां का इंतजार। किसी बच्चे की पुकार। किसी पत्नी की प्रार्थना। किसी पिता की उम्मीद। और ट्रॉमा सेंटर की दीवार पर टंगी एक तस्वीर, “शायद वह लौट आए...” बाढ़ का पानी एक दिन पूरी तरह उतर जाएगा। मलबा भी हट जाएगा। शहर फिर चलने लगेगा। लेकिन ट्रॉमा सेंटर की दीवारों पर चिपकी तस्वीरें तब तक बोलती रहेंगी, जब तक हर परिवार को अपने सवाल का जवाब नहीं मिल जाता। क्योंकि किसी लापता व्यक्ति की तलाश केवल एक परिवार की तलाश नहीं होती, वह पूरी मानवता की उस उम्मीद की तलाश होती है, जो सबसे बड़ी त्रासदी में भी मरना नहीं चाहती।



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