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नई दिल्ली। कर्माटांड़ की सुबह में जब धूप पेड़ों की पत्तियों से छनकर जमीन पर उतरती है तब इस छोटे-से कस्बे की हवा में इतिहास की एक पुरानी सांस महसूस होती है। रास्ते से गुजरते लोग अपने रोजमर्रा के काम में व्यस्त होते हैं लेकिन इसी धरती पर कभी ऐसा आदमी रहा था, जिसके लिए किताब केवल किताब नहीं थी और स्कूल केवल इमारत नहीं। उसके लिए शिक्षा मनुष्य को सिर उठाकर जीने का रास्ता थी। यही वह कर्मभूमि है, जहां ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने जीवन के अंतिम दौर के लगभग अठारह वर्ष बिताए। विद्यासागर स्मृतिरक्षा समिति भी उनके कर्माटांड़ प्रवास को 1873 से 1891 के बीच का मानती है। नाम से आगे विरासत का सवाल कर्माटांड़ का नाम आज विद्यासागर से जुड़ा है लेकिन किसी जगह का नाम किसी महापुरुष के नाम से जोड़ देना इतिहास को जीवित नहीं करता। इतिहास तब जीवित होता है, जब उस नाम के पीछे छुपा सवाल हमारे वर्तमान में सांस लेता रहे। कर्माटांड़ का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस शिक्षा और बराबरी के लिए विद्यासागर ने अपना जीवन लगाया, क्या वह आज उस बच्चे तक पहुंची है, जिसके पास सबसे कम साधन हैं? कर्माटांड़ में उनका निवास ‘नंदन कानन’ था। यहीं उन्होंने संथाल समाज के बीच रहते हुए बालिकाओं की शिक्षा, वयस्कों की शिक्षा और गरीबों के लिए नि:शुल्क होम्योपैथिक चिकित्सा जैसी गतिविधियां शुरू कीं। आधुनिक अध्येता ब्रायन ए. हैचर ने अपनी पुस्तक विद्यासागर : द लाइफ एंड आफ्टर-लाइफ ऑफ एन एमिनेंट इंडियन में कर्माटांड़ और नंदन कानन को विद्यासागर की स्मृति के महत्वपूर्ण स्थल के रूप में देखा है। लोकस्मृति और इतिहास के दस्तावेज विद्यासागर के बारे में बाद में अनेक किंवदंतियां और स्थानीय स्मृतियां बनीं। इसलिए हर लोककथा को इतिहास का प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि स्मृति के पीछे अगर दस्तावेजी आधार हो, तो वह इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण रास्ता बन जाती है। विद्यासागर के कर्माटांड़ प्रवास का उल्लेख उनके आरंभिक जीवनीकारों में मिलता है। उनके छोटे भाई शंभुचंद्र विद्यारत्न की विद्यासागर जीवनचरित 1891 में प्रकाशित हुई थी। सुबलचंद्र मित्र की 1902 की अंग्रेजी जीवनी इश्वरचंद्र विद्यासागर : ए स्टोरी ऑफ हिज लाइफ एंड वर्क भी उनके जीवन और कर्म को समझने का महत्वपूर्ण प्रारंभिक स्रोत है। आधुनिक अध्येता हैचर ने इन आरंभिक जीवनियों को आधार बनाकर विद्यासागर की छवि और उनकी स्मृति के निर्माण की पड़ताल की है। अभावों से निकला ज्ञान का सागर 26 सितंबर 1820 को बंगाल के वीरसिंघा गांव में जन्मे ईश्वरचंद्र ने अभावों के बीच शिक्षा का रास्ता तय किया। संस्कृत के गहन अध्ययन और असाधारण विद्वता के कारण उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि मिली। लेकिन उनकी असली पहचान केवल विद्वता में नहीं थी। ज्ञान को अपने तक सीमित रखने के बजाय उन्होंने उसे समाज में ले जाने की कोशिश की। बंगला भाषा के आरंभिक शिक्षण को सरल बनाने वाली वर्ण परिचय जैसी पुस्तकों ने उन्हें घर-घर पहुंचाया। शिक्षा उनके लिए केवल अक्षरज्ञान नहीं, सामाजिक चेतना का माध्यम थी। सुधार की कसौटी पर निजी जीवन यही दृष्टि उनके स्त्री सुधार के काम में भी दिखाई देती है। विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में उन्होंने शास्त्रीय तर्कों के साथ सार्वजनिक अभियान चलाया। 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम आया। लेकिन कानून बन जाने से सामाजिक प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ। विद्यासागर ने अपने जीवन में इस संघर्ष की कीमत भी चुकाई। 1870 में उनके पुत्र नारायणचंद्र का विवाह विधवा भवसुंदरी से हुआ। सुबलचंद्र मित्र की जीवनी में इस विवाह का विस्तार से उल्लेख है और उसमें विद्यासागर के अपने पत्रों के अंश भी दिए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उनके लिए सुधार केवल सार्वजनिक भाषण का विषय नहीं था; वह निजी जीवन में भी उसकी कसौटी स्वीकार करते थे। जीवन से ‘आफ्टर-लाइफ’ तक शंभुचंद्र की जीवनी और बाद की रचनाओं ने विद्यासागर के जीवन के अलग-अलग पक्ष सामने रखे। रवींद्रनाथ ठाकुर ने भी विद्यासागर चरित में उनके व्यक्तित्व को याद किया। आधुनिक अध्येता हैचर की पुस्तक का महत्व इस बात में है कि वह केवल विद्यासागर के जीवन की घटनाएं नहीं गिनाती, बल्कि यह भी पूछती है कि समय के साथ विद्यासागर की छवि कैसे बनी और उनके जीवन की कौन-सी बातें स्मृति में बचीं, कौन-सी छूट गईं। शायद इसी वजह से कर्माटांड़ विद्यासागर को समझने की महत्वपूर्ण जगह बन जाता है। उन्नीसवीं सदी में समाज सुधार की बड़ी बहसें शहरों और शिक्षित वर्गों के बीच चल रही थीं। ऐसे समय में विद्यासागर ने कर्माटांड़ को अपने जीवन और काम का केंद्र बनाया। यहां वे उन लोगों के बीच रहे, जिनके पास न सत्ता थी, न सामाजिक प्रतिष्ठा और न शिक्षा तक सहज पहुंच। उनके बीच विद्यालय और चिकित्सा जैसी गतिविधियां चलाना किसी भाषण से अधिक कठिन काम था। बालिकाओं की शिक्षा से बराबरी की राह संथाल बालिकाओं के लिए विद्यालय शुरू करने का प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह शिक्षा को सामाजिक बराबरी से जोड़ता है। विद्यासागर स्मृतिरक्षा समिति के अनुसार नंदन कानन परिसर में बालिकाओं के लिए विद्यालय और वयस्कों के लिए रात्रि विद्यालय चलाया गया तथा गरीबों के लिए नि:शुल्क होम्योपैथिक चिकित्सा की व्यवस्था की गई। इन विवरणों को स्थानीय स्मृति और संस्थागत अभिलेख के संदर्भ में पढ़ना चाहिए; इन्हें आज की शिक्षा-व्यवस्था के बारे में स्वतः प्रमाण नहीं बनाया जा सकता लेकिन सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है। डेढ़ सदी बाद हमारे पास शिक्षा का अधिकार है, सरकारी योजनाएं हैं, छात्रवृत्तियां हैं, छात्रावास हैं और आवासीय विद्यालय हैं। फिर भी क्या हर आदिवासी बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है? क्या दूरदराज के गांवों में शिक्षक और विद्यालय नियमित हैं? क्या बच्चे की मातृभाषा उसके लिए शिक्षा की सीढ़ी बन रही है या दीवार? क्या आदिवासी लड़की विद्यालय में केवल नामांकित है या शिक्षा के जरिए अपने जीवन पर निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी हासिल कर रही है? भाषा बने सीढ़ी, दीवार नहीं झारखंड की भाषाई विविधता इस सवाल को और महत्वपूर्ण बनाती है। संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख और दूसरी भाषाएं केवल बोलचाल के माध्यम नहीं हैं। उनमें समुदायों की स्मृतियां, लोकज्ञान और सांस्कृतिक अनुभव सुरक्षित हैं। बच्चे को शिक्षित करने का अर्थ उसकी भाषा और संस्कृति को उसकी शिक्षा की राह में बाधा मान लेना नहीं हो सकता। शिक्षा तब पूरी होती है, जब बच्चा विद्यालय से केवल प्रमाणपत्र लेकर नहीं, अपने होने पर भरोसा लेकर बाहर निकले। विद्यासागर के समय की लड़ाई और आज की चुनौती अलग जरूर हैं, लेकिन उनके बीच रिश्ता गहरा है। तब सवाल था कि शिक्षा और सम्मान के दरवाजे स्त्रियों और वंचित समुदायों के लिए क्यों बंद हैं। आज सवाल है कि दरवाजे खुले होने के बावजूद क्या हर बच्चा उनके भीतर तक पहुंच पा रहा है? यही वह जगह है जहां कर्माटांड़ का नंदन कानन वर्तमान से सवाल करता है। एक-एक रुपये से बची विरासत विद्यासागर के निधन के बाद नंदन कानन के अस्तित्व पर संकट आया। स्थानीय अभिलेखों के अनुसार 29 मार्च 1974 को बंगाली एसोसिएशन, बिहार ने घर-घर से एक-एक रुपये का योगदान जुटाकर इस परिसर को खरीदा। बाद में यहां बालिका विद्यालय और चिकित्सा सेवा को फिर से आगे बढ़ाने के प्रयास हुए। इतिहास में कभी-कभी एक रुपया बहुत बड़ा हो जाता है। 1974 का वह एक-एक रुपया बताता है कि विरासत केवल सरकारी संरक्षण से नहीं बचती। समाज जब किसी स्मृति को अपना मान लेता है, तभी वह स्मृति जीवित रहती है। लेकिन स्मारक बच जाना और स्मृति का अर्थ बचा रहना दो अलग बातें हैं। पुराना मकान नहीं, एक जीवित विचार नंदन कानन इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वह एक पुराना मकान है। वह उस विचार की निशानी है, जिसमें समाज सुधार का अर्थ समाज के बीच जाकर काम करना था। विद्यासागर की विरासत किसी एक किताब, कानून या स्मारक में बंद नहीं की जा सकती। उनकी सबसे बड़ी विरासत मनुष्य की गरिमा में विश्वास है। इसलिए उनकी जयंती पर सबसे आसान काम उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना है। कठिन काम है उनकी कसौटी पर अपने समय को परखना। आज अगर कोई आदिवासी बच्चा गरीबी के कारण शिक्षा से बाहर रह जाता है, तो विद्यासागर का सवाल हमारे सामने खड़ा है। अगर कोई आदिवासी लड़की विद्यालय तक पहुंचकर भी भाषा, गरीबी या सामाजिक दूरी के कारण शिक्षा में पीछे रह जाती है, तो वही सवाल फिर खड़ा होता है। अगर विद्यालय की इमारत खड़ी है, लेकिन शिक्षक, पुस्तक, भाषा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है, तो हमें पूछना होगा—क्या हमने विद्यालय को ही शिक्षा समझ लिया है? और अगर शिक्षा अधिकार होते हुए भी अवसर असमान बने हुए हैं, तो सवाल और कठिन है—क्या हमने अधिकार को फिर सुविधा में बदल दिया है? नाम जोड़ना आसान, अर्थ बचाना कठिन कर्माटांड़ का नाम विद्यासागर से जुड़ गया है। लेकिन केवल नाम जुड़ जाने से उनकी विरासत पूरी नहीं होती। नाम तभी अर्थवान होगा, जब उस धरती पर शिक्षा का वह सपना भी जीवित रहे, जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन लगाया था। किसी जगह का नाम बदलना आसान है, उस नाम के अर्थ को बचाए रखना कठिन। आधुनिक अध्येता हैचर ने विद्यासागर पर लिखते हुए जीवन और ‘आफ्टर-लाइफ’ यानी बाद की स्मृति—दोनों को साथ देखने की कोशिश की है। यही कर्माटांड़ की सबसे बड़ी सीख भी है। विद्यासागर का जीवन समाप्त हो गया, लेकिन उनके नाम और काम की स्मृति आज भी सामाजिक अर्थ तलाश रही है इसलिए कर्माटांड़ को केवल पर्यटन के नक्शे पर दर्ज करना पर्याप्त नहीं। नंदन कानन को संरक्षित करना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी उस विचार को जीवित रखना है, जिसने इस घर को कर्मभूमि बनाया। आज विकास की भाषा में आंकड़े बहुत हैं, योजनाएं बहुत हैं और दावे भी बहुत हैं। विद्यासागर का कर्माटांड़ इन सबके बीच एक छोटा-सा, मगर असुविधाजनक सवाल पूछता है—अगर समाज का सबसे कमजोर बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर है, तो विकास आखिर किसका हुआ? अवसर वहां, जहां उसकी सबसे ज्यादा कमी विद्यासागर ने अपने जीवन से इसका उत्तर देने की कोशिश की थी। अवसर वहीं पहुंचना चाहिए, जहां उसकी सबसे ज्यादा कमी है। शिक्षा वहीं पहुंचनी चाहिए, जहां अज्ञान और अभाव की दीवार सबसे ऊंची है। और सुधार वहीं से शुरू होना चाहिए, जहां मनुष्य की गरिमा सबसे ज्यादा घायल है। 26 सितंबर को उनकी जयंती मनाई जाएगी। तब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हमने विद्यासागर को कितनी श्रद्धांजलि दी। सवाल यह होना चाहिए कि उनके विचार से हमने अपने वर्तमान को कितना बदला। स्मृति को माला नहीं, मिशन चाहिए कर्माटांड़ की मिट्टी आज भी उस सवाल को संभाले हुए है। जिस व्यक्ति ने डेढ़ सदी पहले संथाल बालिकाओं के लिए शिक्षा का दरवाजा खोलने का प्रयास किया था, उसकी जयंती तभी सार्थक होगी, जब आज की आदिवासी बच्ची उस दरवाजे से होकर अपने भविष्य तक पहुंच सके। विद्यासागर की स्मृति को माला से अधिक मिशन चाहिए, नंदन कानन को स्मारक से अधिक जीवित विचार और शिक्षा को दया नहीं, बराबरी का अधिकार बनाना होगा। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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