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नई दिल्ली। क्या किसी विकास परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय होगी कि उसने कितनी नहरें बनाईं, कितने बांध खड़े किए और कितने करोड़ रुपये खर्च किए? या उसकी असली कसौटी यह होगी कि उसने लोगों का जीवन बेहतर बनाया, प्रकृति का संतुलन बचाए रखा और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान किया? मध्य प्रदेश की केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना आज इन्हीं प्रश्नों के केंद्र में खड़ी है। यह विवाद केवल एक बांध या नदी जोड़ने की योजना का नहीं बल्कि उस विकास मॉडल का है जो पिछले कई दशकों से भारत में अपनाया जाता रहा है। बराना नदी का सत्याग्रह और व्यवस्था पर सवाल छतरपुर जिले के कूपी गांव के पास बराना नदी के किनारे इन दिनों जो दृश्य दिखाई दे रहा है, वह किसी भी संवेदनशील समाज को विचलित कर सकता है। नदी में खड़ी आदिवासी महिलाएं गले में फांसी का फंदा डालकर "फांसी सत्याग्रह" कर रही हैं। दूसरी ओर किसान और आदिवासी प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर "चिता सत्याग्रह" चला रहे हैं। उनकी आवाज स्पष्ट है, "न्याय दो या मार दो।" यह नारा केवल आक्रोश नहीं बल्कि उस व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का संकेत है, जहां लोगों को लगता है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं बचा। आंदोलन की मांगें क्या हैं आंदोलनकारियों की मांगें भी असामान्य नहीं हैं। वे परियोजना के विरोध में नहीं बल्कि न्यायपूर्ण पुनर्वास की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि नकद मुआवजा कुछ वर्षों में समाप्त हो जाएगा लेकिन जमीन चली गई तो जीवनभर की आजीविका खत्म हो जाएगी। इसलिए वे "जमीन के बदले जमीन" और "गांव के बदले गांव" की नीति लागू करने की मांग कर रहे हैं। साथ ही प्रति एकड़ मुआवजा बढ़ाने, महिलाओं को समान अधिकार देने, मुआवजा वितरण में कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच कराने और वन अधिकार कानून का पूरी तरह पालन सुनिश्चित करने की मांग भी कर रहे हैं। सरकार का दावा और विकास का पक्ष सरकार की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग है। लगभग 45 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना को बुंदेलखंड के भविष्य का आधार बताया जा रहा है। दावा है कि इससे लाखों हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी, करोड़ों लोगों को पेयजल मिलेगा और दशकों पुराना जल संकट काफी हद तक समाप्त हो जाएगा। सूखा प्रभावित बुंदेलखंड के लिए यह निश्चित रूप से एक बड़ा वादा है। विकास के इस पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन, लोकतंत्र केवल वादों पर नहीं चलता। लोकतंत्र सवाल पूछता है। वह यह जानना चाहता है कि विकास का लाभ किसे मिलेगा और उसकी कीमत कौन चुकाएगा। क्या केन नदी में सचमुच अधिशेष जल है सबसे पहला सवाल परियोजना की मूल अवधारणा पर उठता है। यह पूरी योजना इस धारणा पर आधारित है कि केन नदी में "अधिशेष जल" उपलब्ध है, जिसे बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जा सकता है। लेकिन, अनेक जल विशेषज्ञ वर्षों से इस दावे पर प्रश्न उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि अधिशेष जल के आकलन से जुड़े सभी वैज्ञानिक आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में वर्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। ऐसे में पुराने जल-आंकड़ों के आधार पर भविष्य की जल उपलब्धता तय करना जोखिम भरा हो सकता है। सीईसी की रिपोर्ट ने भी जताई चिंता सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने भी अपनी रिपोर्ट में संकेत दिया था कि इस परियोजना से केन बेसिन के ऊपरी हिस्से के किसानों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और सिंचाई जल का वितरण असंतुलित हो सकता है। यदि किसी क्षेत्र की समस्या का समाधान दूसरे क्षेत्र में नई समस्या पैदा करे तो उसकी उपयोगिता पर गंभीर चर्चा होना स्वाभाविक है। पर्यावरण पर कितना भारी पड़ेगी परियोजना परियोजना का दूसरा बड़ा प्रश्न पर्यावरण से जुड़ा है। विभिन्न आकलनों के अनुसार, इसके कारण हजारों हेक्टेयर वनभूमि प्रभावित होगी। पन्ना टाइगर रिजर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा डूब क्षेत्र की जद में आएगा और लाखों पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है। यह केवल पेड़ों की संख्या का मामला नहीं है। यह उस पूरे पारिस्थितिक तंत्र का प्रश्न है, जिसे बनने में सदियों लगा है। बाघ, घड़ियाल, गिद्ध, दुर्लभ वनस्पतियां और नदी से जुड़े असंख्य जीव-जंतु इस बदलाव से प्रभावित होंगे। क्या कोई कम नुकसान वाला विकल्प नहीं था आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है। ऐसे समय में यदि किसी परियोजना की कीमत बड़े पैमाने पर जंगलों का नुकसान और जैव विविधता का विनाश हो तो यह पूछना आवश्यक हो जाता है कि क्या विकास का कोई कम विनाशकारी विकल्प उपलब्ध नहीं था? क्या स्थानीय जल संरक्षण, पारंपरिक तालाबों, चेक डैम, वर्षा जल संचयन और वाटरशेड प्रबंधन जैसे उपायों पर गंभीरता से विचार किया गया? सामाजिक संगठनों की आपत्तियां इन्हीं प्रश्नों को राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जलवायु एवं पर्यावरणीय न्याय मंच सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने भी उठाया है। उनका कहना है कि यदि उद्देश्य वास्तव में बुंदेलखंड को जल सुरक्षा देना है तो सबसे पहले उन विकल्पों की निष्पक्ष तुलना होनी चाहिए जिनसे कम पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान होता। विकास का अर्थ केवल इंजीनियरिंग समाधान नहीं होता; उसमें समाज, पर्यावरण और भविष्य—तीनों की समान भागीदारी होती है। सबसे बड़ा सवाल इंसानों के भविष्य का परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष पर्यावरण नहीं बल्कि मनुष्य है। आंकड़ों के अनुसार, छतरपुर और पन्ना जिलों के हजारों परिवार इस परियोजना से प्रभावित होंगे। इनमें बड़ी संख्या गोंड और कोल जैसे आदिवासी समुदायों की है, जिनका जीवन जंगल, नदी और जमीन से अविभाज्य रूप से जुड़ा है। उनके लिए भूमि केवल राजस्व अभिलेख में दर्ज संपत्ति नहीं बल्कि इतिहास, संस्कृति, आजीविका और सामुदायिक अस्तित्व का आधार है। इसलिए नकद मुआवजा उनके लिए जीवन का विकल्प नहीं बन सकता। आदिवासी समाज के लिए जमीन का महत्व महुआ के फूल, तेंदूपत्ता, शहद, औषधीय वनस्पतियां और जंगल से मिलने वाले अन्य संसाधन उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। नदी उनके लिए केवल जलधारा नहीं बल्कि जीवन की निरंतरता है। यदि उन्हें अलग-अलग स्थानों पर बसा दिया जाता है तो केवल घर नहीं उजड़ते बल्कि सदियों से विकसित सामाजिक संबंध, देवस्थल, सांस्कृतिक परंपराएं और सामुदायिक जीवन भी बिखर जाता है। विकास का अर्थ यदि किसी समुदाय की सांस्कृतिक मृत्यु बन जाए तो उसकी नैतिक वैधता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। क्या कानून और ग्राम सभा की अनदेखी हुई आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि ग्राम सभाओं की सहमति, सामाजिक प्रभाव आकलन, वनाधिकार कानून और भूमि अधिग्रहण कानून की भावना का समुचित पालन नहीं किया गया। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि संविधान की उस मूल भावना की उपेक्षा है, जिसने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को निर्णय प्रक्रिया का केंद्र माना है। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं बल्कि प्रभावित लोगों को निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी देना भी है। विरोध पर दमन के आरोप चिंता का विषय यह भी है कि आंदोलनकारियों का आरोप है कि शांतिपूर्ण विरोध के बावजूद उन पर मुकदमे दर्ज किए गए, गिरफ्तारियां हुईं और लोगों पर आंदोलन समाप्त करने का दबाव बनाया गया। यदि विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए संवाद के बजाय दमन का रास्ता अपनाया जाता है तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होता है। किसी भी लोकतंत्र की ताकत उसकी असहमति को सुनने की क्षमता से मापी जाती है, न कि उसे दबाने की शक्ति से। पुराने विवादों की याद दिलाती परियोजना दरअसल, केन–बेतवा परियोजना का विवाद किसी एक बांध का विवाद नहीं है। यह वही प्रश्न फिर सामने लाता है जो कभी नर्मदा घाटी, टिहरी और पोलावरम जैसी परियोजनाओं के दौरान उठा था। हर बार सरकारों ने विकास का सपना दिखाया लेकिन हर बार हजारों लोगों ने अपनी जमीन, संस्कृति और भविष्य को लेकर असुरक्षा महसूस की। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत को केवल बड़े बुनियादी ढांचे की नहीं बल्कि न्यायपूर्ण विकास नीति की भी आवश्यकता है। टिकाऊ और न्यायपूर्ण समाधान की जरूरत बुंदेलखंड की जल समस्या वास्तविक है और उसका समाधान भी आवश्यक है। लेकिन, समाधान ऐसा होना चाहिए जो टिकाऊ, वैज्ञानिक और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो। यदि विशाल परियोजनाओं के साथ-साथ पारंपरिक जलाशयों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, चेक डैम, वाटरशेड विकास और स्थानीय जल प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए तो कम लागत और कम पर्यावरणीय नुकसान के साथ भी बड़े परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। विकास का उद्देश्य विकल्पों को खत्म करना नहीं बल्कि सबसे संतुलित विकल्प चुनना होना चाहिए। विकास की परिभाषा पर सबसे बड़ा सवाल केन–बेतवा परियोजना के बहाने देश के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि विकास की परिभाषा आखिर क्या है? क्या विकास केवल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), सिंचाई के रकबे और परियोजनाओं की लागत से मापा जाएगा या फिर यह भी देखा जाएगा कि उसके कारण कितने लोग विस्थापित हुए, कितने जंगल नष्ट हुए और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का कितना सम्मान किया गया? यदि विकास की कीमत सबसे कमजोर नागरिक को चुकानी पड़े तो उसकी सफलता अधूरी मानी जाएगी। संविधान की कसौटी पर विकास यह भी याद रखना होगा कि भारत का संविधान केवल विकास का दस्तावेज नहीं बल्कि न्याय का भी दस्तावेज है। उसकी प्रस्तावना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की बात करती है। इसलिए कोई भी परियोजना तभी सफल कही जा सकती है, जब वह इन तीनों कसौटियों पर खरी उतरे। यदि विकास के नाम पर आदिवासी समुदायों की सहमति, ग्राम सभाओं की भूमिका, वन अधिकार कानून और पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी होती है तो यह केवल एक परियोजना का नहीं, लोकतांत्रिक मूल्यों का भी प्रश्न बन जाता है। सरकार के सामने अवसर भी है सरकार के लिए भी यह अवसर है कि वह इस विवाद को टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाए। पुनर्वास को परियोजना का अंतिम चरण नहीं बल्कि पहला दायित्व माना जाए। प्रत्येक प्रभावित परिवार को सम्मानजनक पुनर्वास, पारदर्शी मुआवजा, महिलाओं को बराबरी का अधिकार और आजीविका की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों और जल उपलब्धता के वैज्ञानिक आकलनों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए ताकि जनता का विश्वास मजबूत हो। विकास और पर्यावरण का संतुलन जरूरी विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना भी उचित नहीं है। भारत जैसे देश को सिंचाई, पेयजल और आधारभूत संरचना की आवश्यकता है लेकिन उतनी ही आवश्यकता जंगलों, नदियों और जैव विविधता को बचाने की भी है। वास्तविक विकास वही होगा जो इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। दुनिया आज सतत विकास की बात कर रही है, जहां आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं, विरोधी नहीं। बराना नदी का फंदा एक बड़ा सवाल है बराना नदी में खड़ी आदिवासी महिलाओं के गले का फंदा केवल एक प्रतीक नहीं है; वह भारतीय लोकतंत्र के सामने रखा गया एक कठिन प्रश्न है। यह प्रश्न किसी सरकार, किसी दल या किसी एक परियोजना से बड़ा है। यह उस विकास मॉडल से जुड़ा है, जिसे आने वाली पीढ़ियां विरासत में पाएंगी। यदि विकास लोगों की भागीदारी, प्रकृति के सम्मान और न्यायपूर्ण पुनर्वास के साथ आगे बढ़ता है तो वही राष्ट्र को मजबूत करेगा। लेकिन, यदि विकास की कीमत विस्थापन, असमानता और अविश्वास बनती है तो उसकी उपलब्धियां भी अधूरी रह जाएंगी। अंतिम सवाल: कैसा विकास चाहता है भारत अंततः सवाल केन–बेतवा का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत ऐसा विकास मॉडल गढ़ सकता है, जिसमें बांध भी बनें, खेत भी सींचे जाएं, शहर भी आगे बढ़ें लेकिन जंगल भी बचें, नदियां भी जीवित रहें और सबसे बढ़कर इंसान का सम्मान भी अक्षुण्ण रहे क्योंकि किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता उसकी परियोजनाओं की ऊंचाई से नहीं बल्कि अपने सबसे कमजोर नागरिक के चेहरे पर दिखाई देने वाले विश्वास से मापी जाती है। यही विश्वास विकास की सबसे बड़ी पूंजी है और यही किसी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक ताकत। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं। पत्रकारिता एवं सामाजिक योगदान के लिए उन्हें विष्णु प्रभाकर सम्मान, तिलकामांझी राष्ट्रीय सम्मान, पर्यावरण पत्रकारिता सम्मान तथा स्वस्थ भारत यात्री सम्मान सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।)



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