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नई दिल्ली। इलेक्ट्रिक वाहनों की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल बैटरी डिग्रेडेशन और लंबी चार्जिंग अवधि का समाधान अब भारतीय वैज्ञानिकों ने खोज लिया है। गुजरात के गांधीनगर स्थित आईआईटी गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी स्मार्ट चार्जिंग तकनीक विकसित की है, जो न सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) की बैटरी को तेजी से चार्ज कर सकती है, बल्कि उसकी उम्र बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकती है। यह उपलब्धि भारत के ईवी सेक्टर के लिए एक बड़ा कदम मानी जा रही है। शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, शोधकर्ताओं ने एक एडैप्टिव चार्जिंग फ्रेमवर्क विकसित किया है, जो बैटरी की सेहत, तापमान और उसकी वास्तविक स्थिति के आधार पर खुद को लगातार एडजस्ट करता है। पारंपरिक चार्जिंग सिस्टम जहां एक तय गति से बैटरी को चार्ज करते हैं, वहीं यह नई तकनीक हर बार चार्जिंग शुरू होने से पहले बैटरी की स्थिति का विश्लेषण करती है और उसी के अनुरूप चार्जिंग प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। बैटरी डिग्रेडेशन पर लगेगा ब्रेक विशेषज्ञों के मुताबिक, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों में सबसे बड़ी समस्या लिथियम प्लेटिंग की होती है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब बैटरी को अत्यधिक तेजी से चार्ज किया जाता है। इसके कारण बैटरी की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और शॉर्ट सर्किट समेत कई सुरक्षा संबंधी जोखिम भी बढ़ जाते हैं। आईआईटी गांधीनगर की नई तकनीक इसी समस्या को कम करने पर केंद्रित है। कैसे काम करती है नई चार्जिंग तकनीक? शोधकर्ताओं ने एडैप्टिव मल्टी-स्टेप कॉन्स्टेंट करंट (MSCC) चार्जिंग स्ट्रेटेजी विकसित की है। इसमें बैटरी को एक ही गति से चार्ज करने के बजाय कई चरणों में चार्ज किया जाता है। प्रत्येक चरण में अलग-अलग करंट दिया जाता है, जो बैटरी की स्थिति के अनुसार तय होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि बैटरी नई है और तापमान सामान्य है, तो सिस्टम ज्यादा करंट देकर तेजी से चार्जिंग करेगा। वहीं यदि बैटरी पुरानी हो चुकी है, तापमान बहुत कम है या लिथियम प्लेटिंग का खतरा बढ़ रहा है, तो सिस्टम स्वतः चार्जिंग की गति कम कर देगा। इससे बैटरी पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ता और उसकी लाइफ बढ़ाने में मदद मिलती है। आरआईसीसी टेस्टिंग से मिलेगी बैटरी की सटीक जानकारी इस तकनीक में रेस्ट-इंटरप्टेड कॉन्स्टेंट करंट (RICC) टेस्टिंग का भी उपयोग किया गया है। इस प्रक्रिया में बैटरी को कुछ समय तक चार्ज करने के बाद थोड़ी देर के लिए चार्जिंग रोक दी जाती है। इससे बैटरी की वास्तविक स्थिति और उसकी आंतरिक कार्यप्रणाली के बारे में अधिक सटीक जानकारी प्राप्त होती है, जिससे चार्जिंग प्रक्रिया को और बेहतर बनाया जा सकता है। सांख्यिकीय तकनीक से चुनी गई सबसे बेहतर चार्जिंग सेटिंग आईआईटी गांधीनगर की टीम ने टागुची स्टैटिस्टिकल ऑप्टिमाइजेशन मेथड का उपयोग करते हुए यह निर्धारित किया कि चार्जिंग के अलग-अलग चरणों में कितना करंट दिया जाना चाहिए। इस तकनीक की मदद से बैटरी की सुरक्षा और चार्जिंग गति के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया गया। कठिन परिस्थितियों में भी सफल रहा परीक्षण शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का परीक्षण विभिन्न परिस्थितियों में किया। बैटरियों को माइनस 5 डिग्री सेल्सियस से लेकर 25 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान और 15 प्रतिशत तक बैटरी डिग्रेडेशन की स्थितियों में जांचा गया। परीक्षणों में यह तकनीक प्रभावी साबित हुई और बैटरी की सुरक्षा व कार्यक्षमता दोनों में सुधार देखने को मिला। EV उद्योग के लिए क्यों है यह बड़ी उपलब्धि? यदि यह तकनीक व्यावसायिक स्तर पर अपनाई जाती है, तो इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियां अधिक समय तक चल सकेंगी, चार्जिंग प्रक्रिया सुरक्षित होगी और बैटरी बदलने की लागत भी कम हो सकती है। इससे ईवी अपनाने की रफ्तार बढ़ेगी और भारत को स्वच्छ एवं टिकाऊ परिवहन की दिशा में बड़ा फायदा मिल सकता है। इंडिया में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तेजी से बढ़ रही है और ऐसे में आईआईटी गांधीनगर का यह नवाचार आने वाले वर्षों में ईवी उद्योग की तस्वीर बदलने की क्षमता रखता है।



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