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मोतिहारी। हिंदी सिर्फ संवाद की भाषा नहीं बल्कि प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और व्यवहार में अपनी जगह बनाने की क्षमता रखने वाली भाषा है। जरूरत केवल इतनी है कि अंग्रेजी के वर्चस्व और औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर हिंदी को व्यवहार में उतारा जाए। महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी में हिंदी दिवस पर आयोजित समारोह में वक्ताओं ने इसी सवाल को केंद्र में रखते हुए हिंदी के भविष्य पर मंथन किया। राजभाषा प्रकोष्ठ और हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी माह के अंतर्गत ‘राजभाषा के रूप में हिंदी का भविष्य’ विषय पर आयोजित समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। अतिथियों का अंगवस्त्र, प्रतीक चिह्न और पौधा भेंट कर स्वागत किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति एवं समारोह के अध्यक्ष प्रो. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता के कारण आज भी हिंदी की तुलना में अंग्रेजी को अधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा, तभी हिंदी को सशक्त और समृद्ध बनाया जा सकेगा। ‘हिंदी के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं का भी सम्मान जरूरी’ राजभाषा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी के भविष्य को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। हिंदी लगातार विकास के पथ पर आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि हिंदी को आगे बढ़ाते समय भारत की अन्य भाषाओं के सम्मान और संरक्षण को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। कार्यालयों में हिंदी दिखे भी और इस्तेमाल भी हो विशिष्ट अतिथि एवं विशेष कार्याधिकारी (प्रशासन) प्रो. अतुल कुमार शरण ने हिंदी के तकनीकी, वैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्ष पर चर्चा की। उन्होंने विश्वविद्यालय के विभागों और कार्यालयों के नाम अंग्रेजी के साथ हिंदी में लिखने की जरूरत बताई। साथ ही हस्ताक्षर सहित दैनिक प्रशासनिक कार्यों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग का आग्रह किया। गांधी भवन परिसर के निदेशक एवं विश्वविद्यालय के मुख्य कुलानुशासक प्रो. प्रसून दत्त सिंह ने हिंदी के भविष्य को उज्ज्वल बताते हुए कहा कि हिंदी राजभाषा के साथ ही अघोषित रूप से भारत की राष्ट्रभाषा भी है। गैर-हिंदी भाषी लोगों ने भी हिंदी को किया समृद्ध हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. श्याम नंदन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी, मंत्रिमंडल सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन तथा उच्चतर शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली की सचिव दीप्ति गौर मुकर्जी के संदेशों का वाचन किया। उन्होंने कहा कि हिंदी को समृद्ध करने में गैर-हिंदी भाषी लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदी का विकास किसी एक क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विभिन्न भाषायी क्षेत्रों के योगदान से इसकी अभिव्यक्ति और व्यापक हुई है। समारोह में वित्त अधिकारी प्रो. पंकज कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी शेफालिका मिश्रा, हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अंजनी कुमार श्रीवास्तव, संस्कृत विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. श्याम कुमार झा, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. बिमलेश कुमार सिंह, समाज कार्य विभागाध्यक्ष डॉ. मृत्युंजय कुमार सिंह, संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. बबलू पाल एवं डॉ. मणिशंकर द्विवेदी सहित शिक्षक, विद्वान, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संयोजन हिंदी विभाग के सहायक आचार्य एवं हिंदी अधिकारी (अतिरिक्त प्रभार) के संयोजकत्व में हुआ। शोधार्थी विकास कुमार ने मंच संचालन किया, जबकि डॉ. श्याम नंदन ने धन्यवाद ज्ञापित किया।



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