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नई दिल्ली। सुबह की धूप अभी पूरी तरह नहीं खिली है...नाथनगर की ओर से आती सड़क चंपापुरी के पास पहुंचते ही जैसे किसी पुराने समय की तरफ मुड़ जाती है। मंदिर के शिखर पर लहराती ध्वजा दूर से ही दिखाई देने लगती है... परिसर में कदम रखते ही घंटियों की धीमी आवाज, पूजा में लीन श्रद्धालु और शांत वातावरण शहर के शोर से अलग एक दूसरी दुनिया का अहसास कराते हैं। कोई प्रतिमा के सामने हाथ जोड़कर खड़ा है, कोई चरणचिह्नों के आगे शीश झुका रहा है और कोई मंदिर की स्थापत्य-कला को ध्यान से देख रहा है। यहां आने वाला हर व्यक्ति अपनी तरह से इस भूमि को पढ़ता है—कोई आस्था से, कोई इतिहास से और कोई भीतर की शांति की तलाश में। यही चंपापुरी है—बिहार के भागलपुर की वह भूमि, जिसे जैन परंपरा भगवान वासुपूज्य की पंचकल्याणक भूमि मानती है। जन्म से मोक्ष तक की यात्रा चंपापुर दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र जैन समाज के प्रमुख तीर्थों में गिना जाता है। जैन परंपरा के अनुसार बारहवें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष पांचों कल्याणक इसी क्षेत्र से जुड़े हैं। एक तीर्थंकर के जीवन की पूरी आध्यात्मिक यात्रा की स्मृति से जुड़ी यह परंपरा चंपापुरी की सबसे बड़ी धार्मिक पहचान है। पंचकल्याणक इसलिए केवल पांच घटनाओं का धार्मिक क्रम नहीं है। यह जीवन से वैराग्य, आत्मबोध और मुक्ति तक की उस यात्रा का प्रतीक है, जिसमें मनुष्य बाहरी विजय से अधिक अपने भीतर की विजय को महत्व देता है। जैन परंपरा में भगवान वासुपूज्य का स्थान इसी कारण विशिष्ट है। चंपापुरी में उनकी स्मृति केवल किसी एक मंदिर या प्रतिमा तक सीमित नहीं है। वह यहां की धार्मिक चेतना, तीर्थयात्रा और स्थानीय सांस्कृतिक स्मृति में रची-बसी है। मंदिर की घंटियां, पूजा की ध्वनि, श्रद्धालुओं की यात्राएं और पर्वों के अवसर पर जुटने वाली भीड़ इस स्मृति को लगातार जीवित रखती है। जहां इतिहास और आस्था मिलते हैं लेकिन, मंदिर की शांति से बाहर निकलते ही चंपापुरी की कहानी और पुरानी हो जाती है। यह भूभाग प्राचीन अंग महाजनपद की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। प्राचीन अंग की राजधानी चंपा का उल्लेख बौद्ध और जैन साहित्य सहित विभिन्न प्राचीन परंपराओं में मिलता है। गंगा के पूर्वी भूभाग में स्थित होने के कारण चंपा व्यापार और आवागमन का महत्वपूर्ण केंद्र रही होगी। नदियां केवल जल का रास्ता नहीं बनातीं, वे सभ्यताओं के बीच संवाद का रास्ता भी बनाती हैं। व्यापारी, शिल्पी, साधु और यात्री जब किसी नगर से गुजरते हैं तो उनके साथ केवल वस्तुएं नहीं, विचार भी चलते हैं। चंपा की सांस्कृतिक पहचान को इसी आवाजाही के संदर्भ में समझना चाहिए। अंगभूमि में धर्म, व्यापार, लोकजीवन और ज्ञान परंपराएं एक-दूसरे से अलग-अलग खानों में नहीं थीं। नगर का जीवन अनेक धाराओं के मेल से बनता था। इसीलिए चंपापुरी को केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में देखना उसके व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को छोटा कर देना होगा। श्रमण परंपरा की पदचाप जैन साहित्य में भगवान महावीर के चंपा आगमन और यहां चातुर्मास से जुड़े उल्लेख मिलते हैं। इससे यह क्षेत्र श्रमण परंपरा की महत्वपूर्ण स्मृतियों से जुड़ जाता है। बौद्ध परंपरा में भी चंपा का उल्लेख मिलता है। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि अंगभूमि का सांस्कृतिक भूगोल किसी एक धार्मिक धारा तक सीमित नहीं था। विभिन्न आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपराओं का आवागमन इस क्षेत्र की पहचान का हिस्सा रहा है लेकिन चंपापुरी की आत्मा भगवान वासुपूज्य की स्मृति में बसती है।पंचकल्याणक की अवधारणा को देखें तो यह मनुष्य के जीवन की सामान्य यात्रा से कहीं आगे जाती है। गर्भ और जन्म जीवन के आरंभ के संकेत हैं। दीक्षा सांसारिक मोह और संचय से दूरी का संकल्प है। केवलज्ञान आत्मबोध की चरम अवस्था का प्रतीक है और मोक्ष कर्मबंधन से मुक्ति का। इसलिए चंपापुरी में दर्शन केवल प्रतिमा के सामने खड़े होकर प्रार्थना करना नहीं है। यह अपने भीतर झांकने का अवसर भी है। वर्तमान से संवाद करता दर्शन यही वह बिंदु है जहां किसी तीर्थ का अर्थ वर्तमान समय से जुड़ता है।आज का समाज अभूतपूर्व उपभोग, प्रतिस्पर्धा और संचय की संस्कृति से गुजर रहा है। अधिक पाने की इच्छा को विकास का पर्याय मान लिया गया है। ऐसे समय में जैन दर्शन का अपरिग्रह का आग्रह एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—जरूरत और लालच के बीच सीमा कहां है? अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि दूसरे जीव और प्रकृति के अस्तित्व के प्रति संवेदनशील होना भी है। अनेकांतवाद अपनी दृष्टि को अंतिम सत्य मानने के बजाय दूसरे दृष्टिकोण को सुनने की सीख देता है। हिंसा, असहिष्णुता और बढ़ते सामाजिक तनाव के समय इन विचारों को केवल धार्मिक उपदेश मानकर छोड़ देना शायद उनके व्यापक सामाजिक अर्थ को सीमित करना होगा। किसी भी दर्शन की जीवंतता इस बात से तय होती है कि वह अपने समय के सवालों से कितना संवाद कर पाता है। प्रतिमाओं में सहेजी विरासत चंपापुरी के मंदिर परिसर में भगवान वासुपूज्य की प्रतिमाओं और चरणचिह्नों के साथ अनेक तीर्थंकरों की प्रतिमाएं और वेदियां श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती हैं। मंदिर परिसर की स्थापत्य परंपरा, मूर्तियां और धार्मिक सामग्री धार्मिक इतिहास के साथ कला-अध्ययन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसी विरासत का संरक्षण केवल धार्मिक समुदाय की जिम्मेदारी नहीं होना चाहिए। वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, डिजिटल अभिलेख, संरक्षण तकनीक और शोध के माध्यम से इस विरासत को व्यापक समाज के सामने लाया जा सकता है। चंपापुरी की कथा यहां से आगे बढ़कर मंदारगिरि तक जाती है। बांका जिले का मंदार पर्वत जैन परंपरा में भगवान वासुपूज्य से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ है। परंपरा में वहां उनके दीक्षा और केवलज्ञान से जुड़े अलग-अलग विवरण मिलते हैं। मंदार की पहचान केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं है। पुराण परंपरा में उसका संबंध समुद्र-मंथन से जोड़ा जाता है। इस तरह मंदार एक बहुधार्मिक सांस्कृतिक स्थल के रूप में सामने आता है। अंगभूमि का आध्यात्मिक भूगोल चंपापुरी और मंदारगिरि को साथ रखकर देखें तो अंगभूमि का धार्मिक भूगोल कहीं अधिक विस्तृत दिखाई देता है। यह ऐसा भूगोल है जिसमें अलग-अलग आस्थाओं की स्मृतियां एक-दूसरे के साथ मौजूद हैं। विरासत का अर्थ किसी एक परंपरा को दूसरी परंपरा के ऊपर रखना नहीं, बल्कि उन सभी स्मृतियों को उनके अपने संदर्भ में समझना है। अंगभूमि की लोक और साहित्यिक स्मृति में कर्ण, रोमपाद और ऋष्यशृंग जैसे पात्रों की कथाएं भी आती हैं। इन कथाओं को प्रमाणित इतिहास के दस्तावेज की तरह पेश करने के बजाय लोक, साहित्य और सांस्कृतिक स्मृति के रूप में देखना अधिक उचित है। आस्था का अपना क्षेत्र है और इतिहास की अपनी पद्धति। किसी विरासत को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने के लिए दोनों के बीच यह अंतर बनाए रखना जरूरी है। चंपापुरी के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि उसकी विरासत को भविष्य से कैसे जोड़ा जाए। तीर्थ से सांस्कृतिक परिपथ तक इसे केवल धार्मिक पर्यटन स्थल मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। चंपापुरी, भागलपुर और मंदारगिरि को जोड़कर एक व्यापक सांस्कृतिक विरासत परिपथ विकसित किया जा सकता है। इसके लिए केवल सड़क और भवन पर्याप्त नहीं होंगे। एक अच्छे सूचना केंद्र की जरूरत होगी, जहां आगंतुकों को चंपा के इतिहास, जैन परंपरा, भगवान वासुपूज्य के पंचकल्याणक और क्षेत्र की बहुधार्मिक विरासत की प्रमाणिक जानकारी मिले। डिजिटल अभिलेख और संग्रहालय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित गाइड बनाया जा सकता है। इससे पर्यटन केवल बाहर से आने वाले लोगों के लिए सुविधा नहीं बनेगा, बल्कि स्थानीय समाज के लिए रोजगार का माध्यम भी बनेगा। हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद, छोटे कारोबार, परिवहन और खान-पान जैसी गतिविधियां इससे जुड़ सकती हैं। विकास में पवित्रता का संतुलन लेकिन, विकास का अर्थ तीर्थ की पवित्रता और पर्यावरण पर दबाव बढ़ाना नहीं होना चाहिए। किसी भी विरासत स्थल पर अनियोजित निर्माण, प्लास्टिक कचरा, यातायात का दबाव और अतिक्रमण उसकी पहचान को कमजोर कर सकते हैं। चंपापुरी के विकास की योजना में स्थानीय समुदाय की भागीदारी और क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को केंद्र में रखना जरूरी है। विरासत केवल पत्थर की इमारत नहीं होती। वह स्मृति होती है। वह लोगों की आस्था, भाषा, लोककथा, अनुष्ठान, स्थापत्य, कला और जीवन-मूल्यों में सांस लेती है। चंपापुरी की असली शक्ति भी केवल उसके मंदिरों और प्रतिमाओं में नहीं, उस जीवित स्मृति में है जिसे पीढ़ियां आगे बढ़ाती आई हैं। तीर्थ सिर्फ दर्शन नहीं आज जब धार्मिक स्थल पर्यटन के नक्शे पर तेजी से जगह बना रहे हैं, तब यह सवाल भी जरूरी है कि क्या तीर्थ केवल दर्शनीय स्थल बनकर रह जाएं? किसी तीर्थ की यात्रा का अर्थ यदि केवल फोटो खींचना, प्रसाद लेना और लौट जाना रह जाए तो उसके दर्शन का बड़ा हिस्सा रास्ते में ही छूट जाता है। चंपापुरी इससे आगे जाने का अवसर देती है।भगवान वासुपूज्य के पंचकल्याणक की स्मृति मनुष्य को जन्म से मोक्ष तक की यात्रा की याद दिलाती है। यह यात्रा बाहर से भीतर की ओर जाने की यात्रा है। इसमें विजय का अर्थ किसी दूसरे को पराजित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के लोभ, क्रोध, हिंसा और अहंकार को पहचानना और उन पर संयम पाना है। लौटते कदमों के साथ चलता एक प्रश्न मंदिर से लौटते समय पीछे मुड़कर देखें तो शिखर पर लहराती ध्वजा फिर दिखाई देती है। घंटियों की आवाज धीरे-धीरे पीछे छूटती जाती है। सड़क फिर वर्तमान में लौट आती है। लेकिन, चंपापुरी का प्रश्न साथ चलता है—हम अपनी विरासत से केवल श्रद्धा ले रहे हैं या उसके जीवन-मूल्यों को भी अपने जीवन में उतार रहे हैं? शायद यही चंपापुरी का सबसे बड़ा अर्थ है। यह केवल एक जैन तीर्थ नहीं। यह अंगभूमि की सांस्कृतिक स्मृति, श्रमण परंपरा की जीवित कड़ी और आत्मविजय के विचार को वर्तमान तक पहुंचाने वाली भूमि है। मंदिर की घंटियां इसलिए केवल पूजा की ध्वनि नहीं हैं। उनमें सदियों की स्मृति है और उस स्मृति में मनुष्य से अपने भीतर लौटने का एक शांत, लेकिन लगातार बजता हुआ आग्रह भी। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक एवं जनसरोकारों के टिप्पणीकार हैं।)