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सूरज कुमार सिंह नई दिल्ली। इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों की कहानी नहीं होता, इतिहास उन आम लोगों की भी कहानी होता है, जिन्होंने अपने समय में घर बनाए, खेतों में मेहनत किया, परिवार बसाए, व्यापार किया और एक समाज का निर्माण किया लेकिन हजारों साल बाद जब उनकी बस्तियां मिट्टी के नीचे दब जाती हैं तब उनके पीछे बची कुछ हड्डियां, बर्तन, घरों के अवशेष और कब्रें ही उनके जीवन की मूक गाथा सुनाते हैं। हरियाणा के हिसार जिले में स्थित राखीगढ़ी आज ऐसी ही एक कहानी सुनाने को तैयार है। सिंधु-सरस्वती या हड़प्पा सभ्यता के इस विशाल नगर से मिले करीब 5000 साल पुराने मानव कंकालों और अस्थि अवशेषों को अब वैज्ञानिक अध्ययन के लिए कोलकाता भेजा गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ( एएसआई ) द्वारा भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण ( एएनएसआई ) को सौंपे गए ये अवशेष आने वाले वर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ऐसे अध्ययनों को किसी राजनीतिक, सांस्कृतिक या वैचारिक नजरिए से नहीं बल्कि केवल वैज्ञानिक तथ्यों और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए। मानव इतिहास की खोज हमेशा एक सतत प्रक्रिया होती है, जिसमें नए प्रमाण पुराने निष्कर्षों को और स्पष्ट भी कर सकते हैं और कई बार उन्हें चुनौती भी दे सकते हैं। एक शहर जो अपने समय से आगे था राखीगढ़ी को सिंधु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा ज्ञात नगर माना जाता है। लगभग 550 हेक्टेयर में फैला यह स्थल आकार के लिहाज से हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे प्रसिद्ध स्थलों की बराबरी करता है और कई मामलों में उनसे भी बड़ा माना जाता है। पिछले कई दशकों से यहां चल रहे उत्खननों ने यह दिखाया है कि करीब पांच हजार वर्ष पहले यहां रहने वाले लोग सुव्यवस्थित शहरी जीवन जीते थे। चौड़ी गलियां, विकसित जल निकासी प्रणाली, घरों की सुनियोजित संरचना, आभूषण निर्माण, धातु शिल्प और लंबी दूरी के व्यापार के प्रमाण बताते हैं कि यह केवल एक बस्ती नहीं बल्कि एक संगठित नगर था। पुरातत्वविदों के लिए राखीगढ़ी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नगरीय परंपराओं में से एक की झलक दिखाता है। कब्रिस्तान में मिली इतिहास की सबसे शांत गवाही वर्ष 2025-26 के उत्खनन सत्र में एएसआई की टीम ने राखीगढ़ी के टीला संख्या-7 पर स्थित कब्रिस्तान क्षेत्र में आठ दफन स्थलों की पहचान की। इनमें मानव के तीन पूर्ण कंकाल और कई अन्य अस्थि अवशेष मिले हैं। पुरातत्व की दुनिया में कब्रिस्तान केवल दफन स्थल नहीं होते बल्कि वे किसी सभ्यता के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के महत्वपूर्ण दस्तावेज माने जाते हैं। कब्रों की संरचना, शवों को दफनाने का तरीका, उनके साथ रखी गई वस्तुएं और मानव अवशेष उस समाज के विश्वासों, परंपराओं और जीवनशैली के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। इन्हीं कारणों से राखीगढ़ी से मिले अवशेषों को बेहद सावधानी के साथ संरक्षित कर कोलकाता स्थित एएसएसआई की विशेष प्रयोगशालाओं में भेजा गया है। हड्डियों में छुपी जानकारी को कैसे पढ़ेगा विज्ञान सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति के कंकाल को देखकर केवल उसकी उम्र या लिंग का अनुमान लगाया जा सकता है लेकिन आधुनिक विज्ञान अब इससे कहीं आगे पहुंच चुका है। वैज्ञानिक इन अवशेषों पर प्राचीन डीएनए ( एनशिएंट डीएनए ), आइसोटोप विश्लेषण, अस्थि विज्ञान ( आस्टीऑलजी ) और पैलियोपैथोलॉजी जैसी तकनीकों का उपयोग करेंगे। इन तकनीकों की मदद से यह समझा जा सकता है कि उस समय के लोग क्या खाते थे, उनका स्वास्थ्य कैसा था, वे किस प्रकार का शारीरिक श्रम करते थे और अपने जीवन में किन क्षेत्रों में आते-जाते रहे। आइसोटोप अध्ययन भोजन और पानी के स्रोतों के बारे में संकेत देता है जबकि डीएनए विश्लेषण आनुवंशिक संबंधों और आबादी के इतिहास को समझने में मदद करता है। वहीं, हड्डियों में मौजूद निशान उस समय की बीमारियों, पोषण स्तर और जीवन की कठिनाइयों के बारे में जानकारी दे सकते हैं। कई संस्थानों की साझा वैज्ञानिक पहल इस अध्ययन की विशेषता यह है कि इसमें केवल एक संस्था नहीं बल्कि कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान मिलकर काम करेंगे। भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, लखनऊ स्थित बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान ( बीएसआईपी ), बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ( बीएचयू ) और ब्रिटेन का यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) इस शोध प्रक्रिया से जुड़े प्रमुख संस्थानों में शामिल हैं। इन संस्थानों के वैज्ञानिक पुरातत्व, मानव विज्ञान, आनुवंशिकी और जैविक अनुसंधान के विभिन्न पहलुओं को एक साथ जोड़कर अध्ययन करेंगे ताकि किसी एक साक्ष्य पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारियों को मिलाकर निष्कर्ष निकाले जा सकें। विशेषज्ञों की नजर में क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन प्रसिद्ध आनुवंशिकी वैज्ञानिक और पद्मश्री सम्मानित डॉ. कुमारस्वामी थंगराज का मानना है कि प्राचीन डीएनए अध्ययन अतीत के समाजों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। उनके अनुसार, ऐसे अध्ययन यह समझने में मदद करते हैं कि हजारों वर्ष पहले रहने वाले लोगों की आनुवंशिक संरचना कैसी थी और समय के साथ आबादी में किस प्रकार के परिवर्तन हुए। वहीं, बीएचयू के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे का कहना है कि डीएनए, आइसोटोप और अस्थि विज्ञान के संयुक्त अध्ययन से उस समय के लोगों की जीवनशैली, स्वास्थ्य और गतिशीलता की अधिक व्यापक तस्वीर सामने आ सकती है। हालांकि विशेषज्ञ बार-बार यह भी दोहराते हैं कि मानव इतिहास से जुड़े निष्कर्षों को अंतिम सत्य मानने के बजाय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर समझना चाहिए क्योंकि नए शोध भविष्य में नई जानकारियां भी सामने ला सकते हैं। केवल अतीत की नहीं, इंसान की कहानी राखीगढ़ी से मिले ये कंकाल किसी राजा, सेनापति या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के ही नहीं हो सकते लेकिन यही उनकी सबसे बड़ी अहमियत है। वे उस समाज के सामान्य लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके जीवन के बारे में इतिहास की किताबें अक्सर बहुत कम बताती हैं। इन हड्डियों में किसी व्यक्ति के बचपन, उसके भोजन, उसकी बीमारियों, उसके श्रम और उसके जीवन संघर्षों के संकेत छुपे हो सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक ऐसे मानव अवशेषों को केवल शोध सामग्री नहीं बल्कि मानव इतिहास की अमूल्य धरोहर मानते हैं। इतिहास की अधूरी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश राखीगढ़ी के कंकालों पर होने वाला अध्ययन हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति, उसके विकास और उस दौर के समाज को लेकर दशकों से चल रही कई वैज्ञानिक चर्चाओं को नई दिशा दे सकता है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे लेकिन इतना तय है कि यह शोध अतीत को समझने की हमारी यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। हजारों वर्षों से मिट्टी के नीचे मौन पड़े ये अवशेष अब विज्ञान की भाषा में बोलने की तैयारी कर रहे हैं। शायद आने वाले वर्षों में इन्हीं हड्डियों से निकली जानकारियां हमें यह समझने में मदद करेंगी कि पांच हजार साल पहले इस धरती पर रहने वाले लोग कौन थे, उनका जीवन कैसा था और उन्होंने उस सभ्यता को कैसे आकार दिया, जिसे आज हम हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से जानते हैं।



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