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ग्लासगो (स्कॉटलैंड)। कुछ कहानियां सिर्फ मेडल जीतने की नहीं होतीं बल्कि हर उस मुश्किल को हराने की होती हैं, जो जिंदगी रास्ते में खड़ी करती है... भारत की पैरा एथलीट शर्मिला धनकड़ की कहानी भी ऐसी ही है। दो साल की उम्र में पोलियो ने उनका एक पैर कमजोर कर दिया। आर्थिक तंगी ने बचपन छीन लिया, कम उम्र में शादी हो गई और परिवार चलाना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जब ज्यादातर खिलाड़ी अपने करियर के शिखर पर होते हैं तब 34 साल की उम्र में शर्मिला ने खेल की दुनिया में कदम रखा और आज वही शर्मिला कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीतकर करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा बन गई हैं। शर्मिला धनकड़ ने राष्ट्रमंडल खेल (कॉमनवेल्थ गेम्स) 2026 में इतिहास रचते हुए महिलाओं के पैरा शॉट पुट एफ57 इवेंट का गोल्ड मेडल जीत लिया है। उन्होंने 9.81 मीटर का सीजन बेस्ट थ्रो कर शीर्ष स्थान हासिल किया। यह मौजूदा खेलों में भारत का दूसरा गोल्ड मेडल है। इसी स्पर्धा में भारत की शिल्पा के. शायला ने 7.26 मीटर का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। हालांकि, उनका पदक मुकाबला खत्म होने के बाद हुए नाटकीय घटनाक्रम और भारतीय टीम की आपत्ति के बाद पक्का हुआ। 9.81 मीटर के थ्रो ने दिलाया गोल्ड शर्मिला ने महिलाओं के शॉट पुट एफ57 इवेंट में अपने शानदार प्रदर्शन से सभी प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। उनका 9.81 मीटर का थ्रो इस सीजन का उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। शर्मिला की जीत के साथ भारत के खाते में दूसरा गोल्ड मेडल जुड़ गया। भारत के अब कुल 10 पदक हो गए हैं और टीम मेडल टैली में आठवें स्थान पर है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया 26 गोल्ड समेत कुल 59 पदकों के साथ पहले स्थान पर बना हुआ है। दो साल की उम्र में हुआ पोलियो, एक पैर हुआ प्रभावित शर्मिला हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले के चित्रौली गांव की रहने वाली हैं। वह महज दो साल की उम्र में पोलियो की चपेट में आ गई थीं, जिससे उनका एक पैर प्रभावित हो गया। उनके पिता छोटे किसान थे, जबकि मां दृष्टिबाधित हैं। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण शर्मिला का बेहतर इलाज नहीं हो सका। आर्थिक परेशानियों के बीच कम उम्र में उनकी शादी भी कर दी गई। 34 साल की उम्र में शुरू किया पैरा एथलेटिक्स का सफर शर्मिला ने उस उम्र में खेल की शुरुआत की, जब ज्यादातर खिलाड़ी अपने करियर के अंतिम दौर में पहुंचने लगते हैं। उन्होंने 34 साल की उम्र में कोच टेकचंद और देवेंद्र के मार्गदर्शन में F57 कैटेगरी के सीटेड शॉट पुट की ट्रेनिंग शुरू की। देर से शुरुआत और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार अभ्यास और मजबूत इरादों के दम पर वह अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं और अब गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। ट्रेनिंग के लिए बेच दिया अपना घर शर्मिला के संघर्ष का सबसे कठिन दौर वर्ष 2023 में आया, जब उनके पास ट्रेनिंग का खर्च उठाने के लिए पैसे नहीं थे। खेल जारी रखने के लिए उन्होंने अपना घर बेच दिया। इसके बाद उनका परिवार किराए के मकान में रहने लगा। घर बिक गया, आर्थिक मुश्किलें बनी रहीं लेकिन शर्मिला ने अभ्यास नहीं छोड़ा। यही जिद और मेहनत उन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के गोल्ड मेडल तक ले गई। भारतीय आपत्ति के बाद शिल्पा को मिला ब्रॉन्ज इसी इवेंट में भारत की शिल्पा के. शायला ने 7.26 मीटर का थ्रो कर अपना व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। शुरुआती नतीजों में वह चौथे स्थान पर थीं जबकि नाइजीरिया की यूचेरिया इयियाजी को ब्रॉन्ज मेडल दिया गया था। भारतीय दल ने नतीजे पर आपत्ति जताते हुए नाइजीरियाई खिलाड़ी के थ्रो की समीक्षा की मांग की। अधिकारियों की जांच में यूचेरिया का एकमात्र वैध माना गया थ्रो भी फाउल पाया गया। इसके बाद नतीजों में बदलाव किया गया और शिल्पा को चौथे से तीसरे स्थान पर पहुंचाते हुए ब्रॉन्ज मेडल दे दिया गया। क्या है एफ57 कैटेगरी एफ57 कैटेगरी में उन पैरा खिलाड़ियों को शामिल किया जाता है, जिनके निचले अंग प्रभावित होते हैं या जिनकी मांसपेशियों की ताकत कम होती है। इस वर्ग के खिलाड़ी बैठकर शॉट पुट जैसी थ्रो स्पर्धाओं में हिस्सा लेते हैं। शर्मिला का गोल्ड और शिल्पा का ब्रॉन्ज भारत के लिए सिर्फ दो पदक नहीं बल्कि संघर्ष, धैर्य और हार न मानने की कहानी भी हैं।



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