Full Story

( कांवर पथ से संजय कौशिक) मोतिहारी। पैरों में छाले हैं...धूप अपनी पूरी तपिश के साथ सड़क पर उतर आई है... कंधे पर कांवड़ का भार है... शरीर थका है, मगर कदम रुके नहीं हैं। कोई आगे बढ़ते हुए ‘हर हर महादेव’ पुकार रहा है, तो पीछे से सैकड़ों कंठ उसी स्वर को थाम लेते हैं। देखते-देखते सड़क केवल सड़क नहीं रह जाती, वह आस्था की एक चलती हुई नदी बन जाती है। इस नदी के प्रवाह में कोई अकेला नहीं है। सब साथ हैं। करीब 80 किलोमीटर की यह कांवड़ यात्रा पूर्वी चंपारण की धरती पर केवल शिवभक्ति का दृश्य नहीं रचती बल्कि सामाजिक समानता की ऐसी तस्वीर भी सामने रखती है, जिसे देखकर लगता है, कुछ दिनों के लिए ही सही, कांवड़ पथ पर साम्यवाद उतर आया है। यह राजनीति का साम्यवाद नहीं है, यह आध्यात्मिक साम्यवाद है। यह किसी विचारधारा का घोषणापत्र भी नहीं, यह शिवघोष है। यह उस सहज समानता का अनुभव है, जिसमें मनुष्य अपनी बनाई हुई पहचानें पीछे छोड़कर दूसरे मनुष्य के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता है। सोमेश्वरनाथ महादेव के जलाभिषेक के लिए निकली करीब 80 किलोमीटर की यह यात्रा केवल एक धार्मिक संकल्प नहीं है। इसके साथ चलती है एक दूसरी कहानी, अजनबियों के अपने बन जाने की कहानी। कांवर पथ में कोई अकेला नहीं कांवड़ यात्रा में सबसे पहले जो चीज दिखाई देती है, वह है साथ। कोई अकेला नहीं चलता। आगे चल रहे कांवड़िए की चाल धीमी हुई तो पीछे वाला रुक गया। किसी के कंधे पर कांवड़ का संतुलन बिगड़ा तो पास चल रहे हाथों ने उसे संभाल लिया। किसी ने पानी मांगा तो बोतल आगे बढ़ गई। नाम-पता पूछने की जरूरत नहीं। परिचय जानने की जरूरत नहीं। यहां इतना काफी है कि सामने वाला भी कांवड़िया है। और यही रिश्ता धीरे-धीरे परिवार जैसा हो जाता है। खेतों के बीच गूंजता शिवनाम रास्ता कभी गांव के बीच से गुजरता है, कभी खेतों के किनारे से। कहीं घरों के बाहर खड़े लोग कांवड़ियों को देखते हैं, सेवा करते हैं। कहीं रास्ते के किनारे विश्राम करते यात्री दिखाई देते हैं। इन दृश्यों के बीच लगातार सुनाई देता है, “बोल बम...” फिर दूसरी ओर से जवाब आता है, “हर हर महादेव!” कुछ क्षण के लिए लगता है कि गांव, खेत, सड़क और आसमान, सब इसी एक ध्वनि में शामिल हो गए हैं। कांवड़ियों के कदमों की लय और शिवनाम की गूंज मिलकर यात्रा को एक अलग ही गति देती है। गेरुआ रंग और एक पहचान कतार में अलग-अलग जीवन से आए लोग हैं। लेकिन हर कोई नंगे पांव है। सब एक जैसे दिखाई देते हैं। गेरुआ रंग में रंगे हुए। यहां किसी की जाति दिखाई नहीं देती। किसी की आर्थिक स्थिति दिखाई नहीं देती। किसी का पद या प्रतिष्ठा दिखाई नहीं देती। दिखता है तो सिर्फ आस्था में मिश्रित समानता। सुनाई देता है तो सिर्फ शिवनाम। और मन में रहती है सिर्फ एक मंजिल, सोमेश्वरनाथ धाम। रास्ते में बनते रिश्ते इस यात्रा का सबसे सुंदर दृश्य शायद वह है जिसे कैमरा भी पूरी तरह कैद नहीं कर सकता। दो अपरिचित लोग साथ चल रहे हैं। कुछ दूर तक बातचीत होती है। फिर एक दूसरे की चाल पहचानने लगते हैं। थकान आती है तो साथ रुकते हैं। पानी बांटते हैं। फिर साथ चल पड़ते हैं। कुछ घंटे पहले जो अनजान था, वह अब अपना है। किसी के पैर में छाला पड़ता है तो कई लोग रुक जाते हैं। कोई मरहम देता है। कोई पानी देता है। कोई कहता है, “थोड़ा आराम कर लीजिए, हम भी रुकते हैं।” यही वह क्षण है जब यात्रा रिश्ते पैदा करती है। खून का रिश्ता नहीं, भावनाओं और संवेदनाओं का रिश्ता। दूसरे की तकलीफ अपनी लगती है कांवड़ पथ पर मानवीय संवेदना छोटी-छोटी घटनाओं में दिखाई देती है। किसी की कांवड़ भारी हुई तो कोई हाथ लगा देता है। किसी की गति धीमी हुई तो समूह की चाल धीमी हो जाती है। कोई पीछे रह गया तो लोग मुड़कर देखने लगते हैं। किसी के चेहरे पर परेशानी दिखाई दी तो पास से गुजरने वाला भी पूछ बैठता है, “सब ठीक है?” यही दो शब्द इस यात्रा के रिश्ते की पूरी कहानी कह देते हैं। यहां किसी की पीड़ा केवल उसकी अपनई नहीं रह जाती। सामूहिक रसोई में पकता है अपनापन दिन चढ़ने के साथ कहीं-कहीं सामूहिक रसोई की हलचल तेज हो जाती है। बड़े बर्तन चढ़ते हैं। चूल्हे जलते हैं। सब्जियां कटती हैं। आटा गूंथा जाता है। किसी के हाथ में कलछी है, किसी के हाथ में बेलन। कोई भोजन परोसने में लगा है। फिर पंगत बैठती है। कांवड़िए एक साथ भोजन करते हैं। यहां न कोई अलग थाली है, न अलग कतार। एक ही भोजन, एक ही पंगत। जिस भोजन को कई हाथों ने मिलकर बनाया, उसे जब दर्जनों लोग साथ बैठकर खाते हैं तो वह भोजन केवल भोजन नहीं रह जाता, महाप्रसाद जैसा अनुभव बन जाता है। धरती बिछावन, आकाश छत शाम ढलती है। दिनभर की पदयात्रा के बाद शरीर विश्राम मांगता है। कहीं शिविर है, कहीं खुले में जगह और कहीं सड़क के किनारे ही थोड़ी-सी जगह मिल जाती है। कांवड़ रखी जाती है। शरीर जमीन पर टिकता है। ऊपर आसमान है। धरती बिछावन और आकाश छत बन जाते हैं। दिनभर साथ चले लोग रात में भी एक-दूसरे के आसपास हैं। कोई पानी रख रहा है। कोई साथी के पैरों की थकान पूछ रहा है। कोई अगले पड़ाव की बात कर रहा है। थकान के बीच भी एक अपनापन पसरा हुआ है। 80 किलोमीटर की राह, लेकिन मन की दूरी घटती जाती है इस यात्रा में दूरी सड़क की है, करीब 80 किलोमीटर। लेकिन हर पड़ाव के साथ आदमी से आदमी के बीच की दूरी कम होती जाती है। जाति पीछे छूटती है। क्षेत्र पीछे छूटता है। अमीरी-गरीबी पीछे छूटती है। सामाजिक पहचानें पीछे छूटती हैं। आगे रह जाता है केवल एक परिचय, शिवभक्त हम भी हैं और आप भी। और यही परिचय हजारों अपरिचित लोगों को एक परिवार की तरह जोड़ देता है। सोमेश्वरनाथ की ओर बढ़ते कदम सुबह फिर होगी...फिर वही सड़क होगी... फिर खेत होंगे... फिर गांव होंगे... फिर कंधों पर कांवड़ होगी और फिर किसी मोड़ से आवाज उठेगी, “हर हर महादेव!” दूसरी ओर से वही आवाज लौटेगी। कदम फिर आगे बढ़ेंगे। 80 किलोमीटर की यह यात्रा अंततः सोमेश्वरनाथ महादेव के दरबार तक पहुंचेगी। लेकिन, रास्ते में शायद कुछ और भी हासिल हो चुका होगा, एक अपरिचित साथी। एक नया भाईचारा। किसी अनजान की मदद करने की खुशी। किसी की तकलीफ में उसके साथ खड़े होने का संतोष। और यह विश्वास कि साथ चलने वाले अजनबी भी परिवार बन सकते हैं। सोमेश्वरनाथ की राह इसलिए केवल जल लेकर चलने की राह नहीं है। यह मनुष्य से मनुष्य तक पहुंचने की राह भी है। यहां अजनबी अपना बनता है। सहयात्री साथी बनता है। साथी परिवार बन जाता है। दूसरे का दर्द अपना दर्द हो जाता है। दूसरे की खुशी अपनी खुशी बन जाती है। साझा भोजन महाप्रसाद बन जाता है। जमीन बिछावन बन जाती है। आकाश छत बन जाता है। और फिर पूरी राह में एक ही स्वर गूंजता रहता है, "हर... हर... महादेव!"