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माटी का श्रृंगार : श्रृंखला–11 नोएडा (यूपी)। भारतीय लोककला की चर्चा यदि बांकुरा के प्रसिद्ध टेराकोटा घोड़े के बिना हो, तो वह अधूरी मानी जाएगी। पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले का पंचमुरा गांव सदियों से ऐसी मिट्टी गढ़ रहा है, जिसने भारत की सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच तक पहुंचाया है। यहां की लाल मिट्टी से बने घोड़े, हाथी, मंदिर, मुखौटे और लोक आकृतियां केवल सजावटी वस्तुएं नहीं, बल्कि ग्रामीण आस्था, शिल्प परंपरा और मानवीय सृजनशीलता के जीवंत दस्तावेज़ हैं। वर्ष 2018 में "बांकुरा पंचमुरा टेराकोटा क्राफ्ट" को भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) प्राप्त हुआ। इसके साथ ही यह शिल्प पश्चिम बंगाल की सर्वाधिक प्रतिष्ठित हस्तकलाओं में शामिल हो गया। आज बांकुरा का घोड़ा भारत सरकार के अनेक सांस्कृतिक आयोजनों, हस्तशिल्प प्रदर्शनियों तथा सरकारी उपहारों का प्रतीक बन चुका है। लाल मिट्टी में बसता है इतिहास बांकुरा की टेराकोटा परंपरा का इतिहास लगभग 300 से 400 वर्ष पुराना माना जाता है, यद्यपि इसकी सांस्कृतिक जड़ें बंगाल की प्राचीन मृद्भांड परंपरा तक पहुंचती हैं। पंचमुरा, राजग्राम, सोनामुखी, तिलुरी और बिष्णुपुर क्षेत्र के कुम्हार समुदाय ने इस कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा है। विशेष रूप से पंचमुरा गांव इस शिल्प का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, जहां आज भी दर्जनों परिवार पारंपरिक तकनीकों से टेराकोटा निर्माण में लगे हुए हैं। बिष्णुपुर के विश्वप्रसिद्ध टेराकोटा मंदिरों की स्थापत्य शैली और पंचमुरा की शिल्प परंपरा एक-दूसरे की सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। बांकुरा घोड़ा : भारत की लोककला का राष्ट्रीय प्रतीक बांकुरा का घोड़ा केवल एक सजावटी वस्तु नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन का प्रतीक है। इसकी लंबी गर्दन, खड़े कान, फैली छाती और संतुलित अनुपात इसे अन्य टेराकोटा घोड़ों से अलग पहचान देते हैं। ग्रामीण बंगाल में इसे शुभता, समृद्धि और ग्राम देवताओं को अर्पित श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आज यह घोड़ा ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट्स बोर्ड के प्रतीक चिह्नों से लेकर देश-विदेश के संग्रहालयों और कला दीर्घाओं तक अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करा चुका है। मिट्टी से मूर्ति बनने की वैज्ञानिक साधना बांकुरा की टेराकोटा कला पूरी तरह हस्तनिर्मित है। कारीगर स्थानीय लाल चिकनी मिट्टी में महीन रेत मिलाकर उसे कई दिनों तक गूंथते हैं। बड़े आकार के घोड़े या हाथी एक साथ नहीं बनाए जाते। पैर, धड़, गर्दन, सिर और कान अलग-अलग तैयार किए जाते हैं और फिर विशेष मिट्टी के घोल से जोड़ दिए जाते हैं। सूखने के बाद इन्हें 800 से 1000 डिग्री सेल्सियस तापमान वाली पारंपरिक भट्ठियों में पकाया जाता है। पकने के बाद मिट्टी में प्राकृतिक लाल-भूरा रंग विकसित हो जाता है, जो इस कला की पहचान है। कारीगर और अर्थव्यवस्था बांकुरा जिले में अनुमानतः 400 से अधिक कारीगर परिवार प्रत्यक्ष रूप से टेराकोटा शिल्प से जुड़े हैं, जबकि लगभग 2,000 से 2,500 लोग इस उद्योग से अपनी आजीविका प्राप्त करते हैं। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की भी है, जो सजावट, नक्काशी और अंतिम फिनिशिंग का कार्य करती हैं। यह शिल्प पश्चिम बंगाल के प्रमुख कुटीर उद्योगों में शामिल है तथा राज्य सरकार की "बंगश्री", विश्व बांग्ला, एमएसएमई विभाग तथा विभिन्न हस्तशिल्प विकास योजनाओं से जुड़ा हुआ है। प्रमुख उत्पाद : परंपरा से आधुनिकता तक समय के साथ पंचमुरा के कारीगरों ने अपनी कला को आधुनिक बाजार के अनुरूप ढाल लिया है। आज यहां केवल घोड़े और हाथी ही नहीं, बल्कि बांकुरा घोड़ा (6 इंच से 8 फीट तक), हाथी एवं ऊँट, दुर्गा, गणेश और कृष्ण की प्रतिमाएं, दीये एवं पूजा सामग्री, फूलदान, प्लांटर और गमले, वॉल पैनल और सजावटी टाइलें, मुखौटे, लैम्पशेड, आधुनिक गृह-सज्जा की वस्तुएं भी तैयार की जाती हैं। देश से दुनिया तक बांकुरा टेराकोटा आज भारत के प्रमुख निर्यात हस्तशिल्पों में शामिल है। कोलकाता के माध्यम से यहां के उत्पाद अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया, इटली, कनाडा तथा संयुक्त अरब अमीरात सहित अनेक देशों तक पहुंचते हैं। भारत के हस्तशिल्प निर्यात में टेराकोटा उत्पादों की लगातार बढ़ती हिस्सेदारी के साथ बांकुरा का योगदान भी उल्लेखनीय माना जाता है। विश्व बांग्ला, हैंडिक्राफ्ट्स एंड हैंडलूम एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन (एचएचईसी) तथा विभिन्न ई-कॉमर्स मंचों ने इस शिल्प को वैश्विक बाजार उपलब्ध कराया है। मेले: कारीगरों की जीवनरेखा कारीगरों की वार्षिक आय का बड़ा हिस्सा मेलों से आता है। चरक मेला, दुर्गा पूजा, काली पूजा, पौष मेला, विश्व बांग्ला मेला तथा सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला जैसे आयोजनों में बांकुरा टेराकोटा की भारी मांग रहती है। अक्टूबर से जनवरी तक का समय बिक्री का सबसे व्यस्त मौसम होता है, जब हजारों कलाकृतियां देशभर के बाजारों में भेजी जाती हैं। चुनौतियां अभी भी शेष विश्वव्यापी पहचान के बावजूद यह कला कई कठिनाइयों से जूझ रही है। गुणवत्तापूर्ण मिट्टी की कमी, ईंधन और परिवहन लागत में वृद्धि, सीमित कार्यस्थल, आधुनिक पैकेजिंग का अभाव तथा मशीन निर्मित सजावटी वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। सबसे बड़ी चिंता नई पीढ़ी का इस व्यवसाय से दूर होना है। बेहतर रोजगार के अवसरों के कारण अनेक युवा पारंपरिक शिल्प छोड़ रहे हैं, जिससे यह विरासत धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। बाउल दास कुम्भकार : परंपरा के प्रहरी पंचमुरा के प्रसिद्ध शिल्पकार बाउल दास कुम्भकार इस कला की जीवित विरासत हैं। लगभग 23 वर्षों से वे टेराकोटा शिल्प को समर्पित हैं। उनके पिता और दादा दोनों राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिल्पकार रहे हैं। स्वयं बाउल दास को पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जिला एवं राज्य स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। उनका मानना है कि यदि पारंपरिक कौशल को आधुनिक डिज़ाइन, डिजिटल विपणन और युवाओं की भागीदारी का साथ मिले, तो बांकुरा टेराकोटा आने वाली कई शताब्दियों तक जीवित रह सकती है। माटी का श्रृंगार बांकुरा का घोड़ा हमें केवल लोककला का सौंदर्य नहीं सिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि मिट्टी जब कलाकार के हाथों में पहुंचती है तो वह इतिहास बन जाती है। उसके भीतर केवल लाल रंग नहीं होता; उसमें पीढ़ियों का श्रम, लोकविश्वास, संस्कृति और आत्मसम्मान भी समाहित होता है। आज जब दुनिया मशीनों से बने एकरूप उत्पादों की ओर बढ़ रही है, तब पंचमुरा का प्रत्येक टेराकोटा घोड़ा यह संदेश देता है कि हस्तशिल्प की सबसे बड़ी पहचान उसकी आत्मा है। और वही आत्मा बांकुरा की मिट्टी में आज भी सांस ले रही है। यही है "माटी का श्रृंगार", जहाँ लाल मिट्टी केवल आकार नहीं लेती, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की अमर गाथा बनकर युगों तक जीवित रहती है।



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