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नई दिल्ली/देहरादून। उत्तराखंड के बहुचर्चित एससी-एसटी छात्रवृत्ति घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ( ईडी ) ने शिकंजा कसते हुए 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां कुर्क की हैं, जबकि जांच में हजारों फर्जी और अपात्र छात्रवृत्ति दावों के जरिए सरकारी धन के दुरुपयोग का खुलासा हुआ है। गरीब छात्रों के नाम पर खेला गया करोड़ों का खेल यह मामला उत्तराखंड में वर्ष 2011-12 से 2016-17 के बीच अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) छात्रों के लिए दी जाने वाली पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना से जुड़ा है। सरकार का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए सहायता देना था, लेकिन जांच में सामने आया कि कुछ शिक्षण संस्थानों ने इसी योजना को कमाई का जरिया बना लिया। ईडी के मुताबिक कई कॉलेजों और संस्थानों ने ऐसे छात्रों के नाम पर छात्रवृत्ति का दावा किया जो या तो अस्तित्व में ही नहीं थे, पढ़ाई नहीं कर रहे थे, परीक्षा में शामिल नहीं हुए थे या संबंधित विश्वविद्यालयों में उनका वैध नामांकन ही नहीं था। हाईकोर्ट और एसआईटी जांच के बाद ईडी की एंट्री छात्रवृत्ति घोटाले की शिकायतें सामने आने के बाद उत्तराखंड पुलिस ने मामला दर्ज किया था। बाद में विशेष जांच दल (SIT) ने इसकी जांच की। इसी एफआईआर और जांच रिपोर्ट के आधार पर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कर वित्तीय पहलुओं की पड़ताल शुरू की। ईडी की जांच में पाया गया कि छात्रवृत्ति राशि प्राप्त करने के लिए एक सुनियोजित नेटवर्क बनाया गया था, जिसमें शिक्षण संस्थानों, ट्रस्टों, समितियों और उनसे जुड़े लोगों की भूमिका सामने आई। 6208 दावों की जांच, 2895 निकले फर्जी जांच के दौरान कुल 6208 छात्रवृत्ति दावों का विश्लेषण किया गया। इन दावों के आधार पर लगभग 27.98 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति राशि वितरित हुई थी। ईडी के अनुसार इनमें से: करीब 19.74 करोड़ रुपये छात्रों के खातों में भेजे गए। लगभग 8.24 करोड़ रुपये संस्थानों के बैंक खातों में फीस के रूप में जमा किए गए। लेकिन, जब इन दावों की जांच हुई तो 2895 दावे फर्जी, अपात्र या संदिग्ध पाए गए। इन दावों के आधार पर लगभग 13.83 करोड़ रुपये की सरकारी राशि का गलत तरीके से लाभ उठाया गया। जांच में सामने आईं चौंकाने वाली गड़बड़ियां ईडी की जांच में कई तरह की अनियमितताएं सामने आईं। कई छात्र ऐसे पाए गए जो कॉलेज में नियमित रूप से पढ़ाई ही नहीं कर रहे थे। कुछ मामलों में छात्रों का नामांकन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। कई छात्र परीक्षा में शामिल नहीं हुए थे जबकि कुछ को छात्रवृत्ति मिलने की जानकारी तक नहीं थी। जांच में यह भी पाया गया कि कुछ संस्थानों ने ऐसे पाठ्यक्रमों के लिए भी छात्रवृत्ति का दावा किया जो संबंधित विश्वविद्यालयों से मान्यता प्राप्त नहीं थे। छात्रों के खातों पर भी संस्थानों का कब्जा ईडी के मुताबिक घोटाले का सबसे गंभीर पहलू यह था कि छात्रों के नाम पर बैंक खाते खोले गए, लेकिन उनका संचालन संस्थानों के कर्मचारियों और प्रबंधन से जुड़े लोग कर रहे थे। कई खातों में छात्रों की जगह संस्थान के कर्मचारियों के मोबाइल नंबर दर्ज मिले। छात्रवृत्ति की राशि खाते में आने के बाद उसे विभिन्न खातों में ट्रांसफर कर लिया जाता था या नकद निकाल लिया जाता था। इस तरह छात्रवृत्ति का वास्तविक लाभ छात्रों तक पहुंचने के बजाय संस्थानों और उनसे जुड़े लोगों तक पहुंचता रहा। किस-किस संस्थान पर लगे आरोप ईडी की विज्ञप्ति के अनुसार जांच का दायरा उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के कई शिक्षण संस्थानों तक फैला है। इनमें हरिद्वार, रुड़की और मेरठ के कुछ संस्थान प्रमुख रूप से जांच के घेरे में हैं। जांच में यह भी सामने आया कि छात्रवृत्ति की राशि विभिन्न शैक्षणिक समितियों, ट्रस्टों और संस्थाओं के खातों में भेजी गई, जहां से उसे आगे कई स्तरों पर घुमाकर उपयोग किया गया। 13.83 करोड़ की संपत्तियां क्यों कुर्क हुईं ईडी का कहना है कि जांच के दौरान यह स्थापित हुआ कि छात्रवृत्ति घोटाले से प्राप्त धन को विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तियों के खातों के जरिए निवेश किया गया और उससे संपत्तियां खरीदी गईं। इसी आधार पर एजेंसी ने करीब 13.83 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन, भवन, बैंक जमा और अन्य परिसंपत्तियों को कुर्क करने का आदेश जारी किया है। ये संपत्तियां हरिद्वार और रुड़की सहित कई स्थानों पर स्थित हैं। 2020 से जारी है मनी लॉन्ड्रिंग जांच ईडी इस मामले की जांच वर्ष 2020 से कर रही है। अब तक एजेंसी कई आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई कर चुकी है और विशेष अदालत से कई प्रावधिक कुर्की आदेश भी प्राप्त कर चुकी है। ताजा कार्रवाई को इस पूरे घोटाले की जांच में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे कथित तौर पर घोटाले से अर्जित संपत्तियों को निशाना बनाया गया है। आगे क्या ईडी ने साफ किया है कि जांच अभी जारी है और आने वाले समय में और भी लोगों, संस्थानों तथा वित्तीय लेन-देन की जांच की जाएगी। एजेंसी यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि छात्रवृत्ति की राशि की हेराफेरी में किन-किन लोगों की भूमिका थी और इस धन का इस्तेमाल आखिर किन उद्देश्यों के लिए किया गया।



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