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माटी का श्रृंगार: श्रृंखला-तीन नोएडा (यूपी)। सुबह की पहली किरण जब किसी गांव के कुम्हार के आंगन में रखी मिट्टी पर पड़ती है तो लगता है मानो धरती स्वयं उसके हाथों में अपना भविष्य सौंप रही हो... चाक पर घूमती मिट्टी सिर्फ घड़ा, सुराही या दीया नहीं बनाती बल्कि सदियों से संजोई उस लोकबुद्धि को आकार देती है, जिसने प्रकृति को किताबों से नहीं, उसके स्पर्श से समझा है... कुम्हार मिट्टी को देखकर ही उसकी भाषा पढ़ लेता है कि किसमें कितनी चिकनाहट है, कितनी नमी चाहिए, कौन-सी मिट्टी पानी को शीतल रखने वाला घड़ा बनेगी और कौन केवल ईंट का रूप ले सकेगी... उसका यह ज्ञान किसी प्रयोगशाला की खोज नहीं बल्कि पीढ़ियों की साधना, अनुभव और प्रकृति के साथ निरंतर संवाद का परिणाम है इसलिए वह केवल मिट्टी का शिल्पकार नहीं बल्कि धरती का ऐसा मौन वैज्ञानिक है, जिसने विज्ञान की औपचारिक परिभाषाएं बनने से बहुत पहले प्रकृति के नियमों को अपने हाथों की लकीरों में लिख लिया था। संतुलन, अनुपात और गति का समन्वय मिट्टी का विज्ञान पानी से आरंभ होता है। कुम्हार मिट्टी को केवल गूंथता नहीं बल्कि उसे जीवंत करता है। पानी मिलाने के बाद वह उसे कुछ समय तक विश्राम देता है ताकि मिट्टी के सूक्ष्म कण एक-दूसरे से समान रूप से जुड़ जाएं और उसमें आवश्यक लचीलापन आ सके। इसके बाद वही मिट्टी चाक पर चढ़ती है। घूमते हुए चाक पर उसकी उंगलियां केवल आकार नहीं बनातीं बल्कि संतुलन, अनुपात और गति का ऐसा अद्भुत समन्वय रचती हैं, जिसमें विज्ञान और सौंदर्य साथ-साथ चलते हैं। घड़ा हो, कलश हो, दीया हो या सुराही, हर आकार के पीछे व्यवहारिक प्रयोग का गणित और भौतिकी का एक मौन विज्ञान कार्य करता है। माटी की अग्नि परीक्षा इतने कुछ के बाद भी मिट्टी की सबसे कठिन परीक्षा अभी बाकी रहती है। धूप में सूखने के बाद भी वह केवल कच्चा पात्र होती है। यदि उसमें पानी भर दिया जाए तो कुछ समय बाद वह गलकर टूट जाएगी। उसका वास्तविक रूपांतरण भट्ठे की अग्नि में होता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है मिट्टी के भीतर मौजूद जल पूरी तरह बाहर निकल जाता है और उसके सूक्ष्म कण स्थायी रूप से आपस में जुड़ने लगते हैं। लगभग 500 डिग्री सेल्सियस (900 डिग्री फारेनहाइट) के आसपास होने वाला यह रासायनिक परिवर्तन मिट्टी को फिर कभी अपनी पुरानी अवस्था में लौटने नहीं देता। यही कारण है कि आग में पका हुआ मृद्भांड वर्षों नहीं बल्कि हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकता है। इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया ने प्राचीन सभ्यताओं के असंख्य मृद्भांडों को आज तक संरक्षित रखा है, जिनके आधार पर पुरातत्वविद इतिहास के अनेक अध्याय पढ़ते हैं। लोकज्ञान का विज्ञान मिट्टी की अपनी भी एक सीमा है। अत्यधिक तापमान, लगभग 1600 डिग्री सेल्सियस के आसपास, उसकी संरचना को बदलकर उसे कांच जैसी अवस्था में परिवर्तित कर देता है। आधुनिक विज्ञान इस प्रक्रिया को रासायनिक और भौतिक परिवर्तन के रूप में समझाता है लेकिन भारतीय कुम्हार सदियों से बिना किसी तापमापी के केवल आग की लपटों, धुएं के रंग और भट्ठे की तपिश को देखकर यह पहचान लेता है कि बर्तन कब पूरी तरह पक चुका है। यह लोकज्ञान भारत की पारंपरिक वैज्ञानिक विरासत का एक विलक्षण उदाहरण है। जीवन की पाठशाला एक अनुभवी कुम्हार के लिए भट्ठा केवल आग नहीं बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पाठशाला है। वह जानता है कि अधपकी मिट्टी कभी टिकाऊ नहीं होती। थोड़ी-सी चोट उसे चूर कर सकती है। यही सत्य मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है। संघर्ष, धैर्य और समय की अग्नि से गुजरे बिना व्यक्तित्व भी परिपक्व नहीं होता। शायद इसी कारण भारतीय लोकपरंपरा में मिट्टी और मनुष्य के जीवन के बीच गहरा साम्य स्थापित किया गया है। माटी की विनम्रता धरती का शायद ही कोई पदार्थ मिट्टी जितना विनम्र हो। उसे जितना गूंथा जाए, वह उतनी ही कोमल होती जाती है, जितना थपथपाया जाए, वह उतनी ही सहजता से नया आकार स्वीकार कर लेती है। लेकिन, वही मिट्टी जब अग्नि में तपकर बाहर आती है तो सदियों तक अपना अस्तित्व सुरक्षित रखती है। वह मानो मौन होकर यह संदेश देती है कि कोमलता कमजोरी नहीं बल्कि सृजन का आधार है और धैर्य ही स्थायित्व की सबसे बड़ी शक्ति। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने मिट्टी को केवल एक पदार्थ नहीं माना बल्कि जीवन का सबसे सशक्त रूपक बनाया। कुम्हार की हथेलियों में धरती बोलती है, उसके चाक पर समय घूमता है और उसकी भट्ठी में केवल घड़े, कलश और दीये नहीं पकते बल्कि मानव सभ्यता बार-बार एक नए रूप में जन्म लेती है। यही है माटी का वास्तविक श्रृंगार, जहां कला, विज्ञान, दर्शन और जीवन एक ही चाक पर घूमते हुए एकाकार हो जाते हैं। (क्रमशः)



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