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नई दिल्ली। भारत में संरक्षण प्रयासों के दम पर एशियाई शेरों की संख्या पिछले 10 वर्षों में 523 से बढ़कर 891 हो गई है जबकि वर्ष 2020 के बाद उनका क्षेत्र भी करीब 30 हजार से बढ़कर 35 हजार वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया है। 2015 में 523, 2025 में 891 शेर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने विश्व शेर दिवस 2026 के अवसर पर बताया कि वर्ष 2015 में भारत में एशियाई शेरों की संख्या 523 थी, जो 2025 में बढ़कर 891 हो गई। यानी एक दशक में शेरों की संख्या में 368 की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वनकर्मियों और स्थानीय समुदायों को श्रेय श्री यादव ने इस उपलब्धि का श्रेय वन अधिकारियों, संरक्षणवादियों, स्थानीय समुदायों और शेर संरक्षण से जुड़े लोगों को दिया।उन्होंने कहा कि यह सफलता वन्यजीव और जैव-विविधता संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दिखाती है। ‘आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई दे शेरों की दहाड़’ केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत अपनी प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और कोशिश यह है कि एशियाई शेरों की दहाड़ आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देती रहे। उन्होंने संरक्षण को केवल शेरों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं बताया, बल्कि उनके आवास, स्वास्थ्य और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा पर भी जोर दिया। 2020 से 5,000 वर्ग किमी बढ़ा शेरों का क्षेत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2020 को एशियाई शेरों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए ‘प्रोजेक्ट लायन’ की घोषणा की थी।इसके बाद शेरों के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ। वर्ष 2020 में यह क्षेत्र करीब 30,000 वर्ग किलोमीटर था, जो अब बढ़कर लगभग 35,000 वर्ग किलोमीटर हो गया है। ‘प्रोजेक्ट लायन’ में सिर्फ गिनती नहीं, पूरा इकोसिस्टम फोकस में ‘प्रोजेक्ट लायन’ के तहत शेरों की संख्या बढ़ाने के साथ उनके पूरे आवास और जैव-विविधता के संरक्षण पर काम किया जा रहा है।इसमें पर्यावास सुधार, रोग निगरानी, पशु चिकित्सा सहायता, वैज्ञानिक तरीके से संख्या की निगरानी, तकनीक आधारित उपाय, जैव-विविधता संरक्षण, लाभ साझाकरण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर विशेष जोर है। विकास और संरक्षण साथ-साथ: कीर्ति वर्धन सिंह केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि महत्वपूर्ण आवासों की सुरक्षा, संरक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करने और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को बढ़ावा देकर भारत ने यह उदाहरण पेश किया है कि विकास और प्रकृति संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। संख्या बढ़ी, अब टिकाऊ संरक्षण बड़ी जिम्मेदारी एशियाई शेरों की संख्या का 891 तक पहुंचना संरक्षण की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन बढ़ती आबादी के साथ सुरक्षित आवास, रोग नियंत्रण, मानव-वन्यजीव संघर्ष और लंबी अवधि की निगरानी जैसी चुनौतियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं। फिलहाल सरकार का जोर इस बात पर है कि बढ़ती संख्या के साथ शेरों का आवास भी मजबूत हो और संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका लगातार बढ़ती रहे।



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