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नई दिल्ली। नदी में गाद दिखते ही हमारी नजर नदी पर नहीं, गाद पर टिक जाती है। हमें लगता है कि नदी का तल भर गया है इसलिए पानी रुक रहा है; गाद निकाल देंगे तो नदी गहरी हो जाएगी और बाढ़ का संकट कम हो जाएगा लेकिन नदी इतनी सरल गणित नहीं है, जिस गाद को हम नदी की समस्या कह रहे हैं, वही गाद नदी के स्वभाव और उसकी यात्रा का हिस्सा भी है। तो फिर सवाल यह है कि समस्या गाद है या गाद का असंतुलित जमाव? यदि गाद निकालना ही समाधान है तो हर बरसात के बाद नदी फिर क्यों भर जाती है? और यदि गाद नदी के साथ चलने वाली प्राकृतिक तलछट है तो उसे हटाने से पहले यह कौन तय करेगा कि कहां से कितनी गाद निकालनी है और कहां उसे नदी के साथ बहने देना है? बहस गाद निकालने की नहीं, नदी को समझने की है बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियों को लेकर यह सवाल अब केवल बाढ़ के मौसम का नहीं रह गया है। यह नदी-विज्ञान, जल-प्रबंधन, पर्यावरण और विकास की दिशा का सवाल है। वर्षों से गाद निकालने की मांग उठती रही है। सरकारों ने समितियां बनाईं, विशेषज्ञों ने अध्ययन किए और न्यायिक संस्थाओं के स्तर पर पर्यावरणीय सवाल उठे। फिर भी बहस बार-बार उसी जगह लौट आती है कि गाद निकालें या नहीं? असल सवाल इससे आगे का है—गाद क्यों जमा हो रही है और नदी का संतुलन कैसे कायम रखा जाए? 15 सितंबर 2026 को बिहार मंत्रिमंडल ने ‘बिहार जलस्रोत पुनर्स्थापन एवं गाद प्रबंधन नीति, 2026’ को मंजूरी दी। नीति में नदियों, बराजों और जलाशयों से गाद निकालकर उनकी जलधारण और जलवहन क्षमता बहाल करने तथा निकाली गई गाद का सड़क, रेल, सिंचाई, बाढ़ सुरक्षा और निर्माण कार्यों में उपयोग करने की बात कही गई है। नीति की जरूरत समझी जा सकती है, लेकिन इसकी सफलता मशीनों से निकलने वाली गाद की मात्रा से नहीं मापी जानी चाहिए। कसौटी यह होनी चाहिए कि गाद निकालने के बाद नदी का व्यवहार क्या बदला? क्या बाढ़ का पानी बेहतर ढंग से निकला? क्या कहीं दूसरे हिस्से में कटाव बढ़ा? क्या तलछट फिर उसी स्थान पर जमा हुई? क्या जलीय जीवन प्रभावित हुआ?इन सवालों का महत्व इसलिए भी है कि गाद पर बनी पुरानी समितियां हमें पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं। मित्तल समिति की सीख: हर जगह गाद निकालना समाधान नहीं 2001 में पूर्व केंद्रीय जल आयोग अध्यक्ष डॉ. बी.के. मित्तल की अध्यक्षता में बनी समिति ने गाद जमाव और बाढ़ के संबंधों की पड़ताल की थी। सरकारी अभिलेखों में दर्ज निष्कर्षों के अनुसार बड़ी नदियों में व्यापक स्तर पर गाद निकासी को सामान्य और आर्थिक रूप से व्यवहार्य समाधान नहीं माना गया। हालांकि विशेष परिस्थितियों वाले कुछ हिस्सों में तकनीकी और आर्थिक अध्ययन के बाद लक्षित गाद निकासी की संभावना स्वीकार की गई। 2016 में केंद्र ने माधव चितले समिति का गठन गंगा में भीमगौड़ा से फरक्का तक गाद प्रबंधन और ड्रेजिंग के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने के उद्देश्य से किया। समिति ने नदी के प्रत्येक हिस्से की अलग प्रकृति को समझने पर जोर दिया। तलछट का आवागमन, जमाव, नदी-तल की स्थिति और वार्षिक तलछट बजट जैसे पहलू इसके केंद्र में रहे। दोनों समितियों का संकेत स्पष्ट था कि पूरी नदी के लिए एक ही नुस्खा नहीं हो सकता। पुराने अध्ययनों की सीख नई नीति में कितनी दिखेगी? 2017 में बक्सर से फरक्का तक गंगा के हवाई सर्वेक्षण की पहल भी हुई थी। केंद्र की टीम में पूर्व केंद्रीय जल आयोग अध्यक्ष ए.बी. पांड्या और आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञ शामिल थे। यह बताता है कि समस्या को लेकर तकनीकी अध्ययन की आवश्यकता सरकारें पहले भी स्वीकार करती रही हैं। अब सवाल यह है कि उन अध्ययनों की सीख नई नीति के क्रियान्वयन में कितनी दिखाई देगी। फरक्का का प्रश्न भी इसी वैज्ञानिक संदर्भ में देखना होगा। बिहार लंबे समय से गंगा के प्रवाह और तलछट व्यवस्था पर फरक्का के प्रभाव की बात करता रहा है। लेकिन पूरी नदी की जटिलता को किसी एक बराज के खाते में डाल देना समाधान नहीं है। प्रवाह, ढाल, नदी-तल, सहायक नदियों से आने वाली तलछट, तटों की स्थिति और मानव हस्तक्षेप मिलकर नदी का व्यवहार तय करते हैं। हिमालय से मैदान तक: तलछट के साथ चलती हैं बिहार की नदियां बिहार की नदियां इस जटिलता का जीवंत उदाहरण हैं। हिमालय से उतरने वाली कोसी, गंडक, बागमती और दूसरी नदियां भारी मात्रा में तलछट लेकर मैदान में आती हैं। आईआईटी कानपुर के प्रो. राजीव सिन्हा के नदी-विज्ञान संबंधी अध्ययनों ने नदी की आकृति, प्रवाह और तलछट के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया है। नदी का तल स्थिर नहीं है और नदी की धारा भी स्थायी रेखा नहीं है। यही कारण है कि गाद को केवल हटाए जाने वाले पदार्थ के रूप में देखना गलत होगा। लोअर कोसी में सतत गाद प्रबंधन पर हुए अध्ययनों में इसके संभावित उपयोग को संसाधन के रूप में देखने की संभावना सामने आई है। बिहार की नई नीति में निकाली गई गाद के उपयोग का प्रावधान इसी दिशा में है। लेकिन उपयोग से पहले उसकी गुणवत्ता, संरचना और संभावित प्रदूषण की जांच जरूरी है। गंगा की गाद से हवाईअड्डे का भराव: विचार के साथ जरूरी हैं सवाल सुल्तानगंज के कवि सुधीर प्रोग्रामर का सुझाव है कि क्षेत्र से निकाली गई गंगा की गाद का इस्तेमाल प्रस्तावित हवाई अड्डा क्षेत्र में भराव के लिए किया जा सकता है। विचार उपयोगी हो सकता है, लेकिन नदी से गाद निकालने का औचित्य केवल इस आधार पर तय नहीं हो सकता कि उसका इस्तेमाल कहां होगा। गाद की मात्रा, गुणवत्ता, भराव की भू-तकनीकी स्थिरता, भूजल और जलनिकासी पर असर—इन सभी की वैज्ञानिक जांच जरूरी होगी। प्रगतिशील कृषि मंच के राष्ट्रीय संयोजक किशोर जायसवाल भी अंधाधुंध गाद निकासी के बजाय लक्षित हस्तक्षेप की जरूरत बताते हैं। उनके अनुसार पहले उन हिस्सों की पहचान होनी चाहिए जहां गाद वास्तव में प्रवाह या जलनिकासी में बाधा है। फिर सुरक्षित मात्रा, समय, प्रवाह में संभावित बदलाव और कटाव के जोखिम का आकलन होना चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में जलवैज्ञानिक और जलगतिकीय मॉडलिंग इस निर्णय का आधार बन सकती है। नदी सिर्फ ऊपर बहता पानी नहीं, नीचे चलता विज्ञान भी है एनआईटी पटना के प्रो. रामाकर झा जैसे नदी-विज्ञान विशेषज्ञों की भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है कि नदी को केवल ऊपर से दिखाई देने वाली जलधारा के रूप में नहीं, बल्कि उसके तल, प्रवाह और तलछट की परस्पर क्रिया के रूप में समझा जाए। राष्ट्रीय हरित अधिकरण को लेकर बिहार में यह धारणा रही है कि पर्यावरणीय नियमों के कारण गाद निकासी बाधित होती है। लेकिन गाद निकासी और व्यावसायिक खनन को एक ही गतिविधि मानना भी उचित नहीं होगा। बड़े पैमाने पर नदी के तल में हस्तक्षेप के लिए तकनीकी और पर्यावरणीय आकलन जरूरी हैं। इसलिए बहस ‘किसने रोका’ से आगे बढ़कर ‘क्या वैज्ञानिक आधार था’ पर होनी चाहिए। भागलपुर क्षेत्र में यह सावधानी और महत्वपूर्ण है। यहां गांगेय डॉल्फिन का संवेदनशील आवास है। नदी की गहराई, प्रवाह और तलछट में बदलाव जलीय जीवों के आवास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में बाढ़, नौवहन और निर्माण की जरूरतों के साथ पारिस्थितिकी को भी बराबर महत्व देना होगा। नदी को गहरा करने से पानी पैदा नहीं होता कम पानी की समस्या का भी गाद से सीधा और सार्वभौमिक संबंध नहीं है। नदी को गहरा कर देने से पानी पैदा नहीं होता। जल की उपलब्धता वर्षा, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, सहायक नदियों, आर्द्रभूमियों और प्राकृतिक प्रवाह से जुड़ी है। गाद निकासी कुछ स्थानों पर जलनिकासी या प्रवाह की बाधा दूर कर सकती है, लेकिन उसे जल-संकट का स्थायी इलाज नहीं माना जा सकता इसलिए बिहार की नई नीति को केवल गाद निकालने की नीति नहीं बनने देना चाहिए। इसे नदी और जलग्रहण क्षेत्र के पुनर्स्थापन की व्यापक नीति बनाना होगा। इसके लिए नदी-खंडवार नियमित तलमिति सर्वेक्षण, वार्षिक तलछट बजट, बाढ़ और कम प्रवाह दोनों स्थितियों की मॉडलिंग, गाद की गुणवत्ता की जांच और निकाली गई सामग्री के सुरक्षित उपयोग की व्यवस्था जरूरी है और सबसे जरूरी है पारदर्शिता। जनता को पता होना चाहिए कि कहां से कितनी गाद निकली, क्यों निकली, किस अध्ययन के आधार पर निकली और अगले मानसून में उसका परिणाम क्या रहा। नदी के नाम पर होने वाले हर बड़े हस्तक्षेप का सार्वजनिक लेखा-जोखा होना चाहिए। ‘नदियां हमारी पृथ्वी की धमनियों के समान हैं’ मुंगेर के कल्याणपुर की सुमन साहा नदी को केवल जलधारा नहीं मानतीं। उनके अनुसार, “नदियां हमारी पृथ्वी की धमनियों के समान हैं।” नदी की अविरलता और निर्मलता के लिए तटों के जंगल, मिट्टी, वनस्पति, जैव-विविधता और जलीय जीवों का संरक्षण जरूरी है। वह प्लास्टिक, विषैले रसायनों, औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू कचरे से नदियों को बचाने के लिए सामूहिक और सहभागी प्रयास की जरूरत पर जोर देती हैं। नदी की यही समग्र समझ आज गाद प्रबंधन की बहस को चाहिए क्योंकि नदी की सफाई और नदी का इलाज एक बात नहीं है। नदी के तल से मशीन चलाकर गाद निकाल देना दिखाई देता है, लेकिन उससे नदी का संतुलन बना या बिगड़ा—यह तुरंत दिखाई नहीं देता। बाढ़ के बाद नदी की नई धारा, कटे हुए किनारे, बदली हुई गहराई, सूखते आर्द्र क्षेत्र और जलीय जीवों के बदलते आवास ही असली परिणाम बताते हैं। सवाल ‘कितनी गाद’ का नहीं, ‘कहां और क्यों’ का होना चाहिए इसलिए बिहार को अब यह पूछना बंद करना होगा कि “कितनी गाद निकालनी है?” और पूछना होगा—“कहां गाद हटाना जरूरी है, क्यों जरूरी है और हटाने के बाद नदी कैसी होगी?” यही फर्क नदी से छेड़छाड़ और नदी प्रबंधन के बीच है।गाद निकालना आसान है, नदी को समझना कठिन। नई नीति की असली परीक्षा यह नहीं होगी कि कितने घनमीटर गाद नदी से बाहर आई। परीक्षा यह होगी कि अगले मानसून में नदी का प्रवाह कितना स्वाभाविक रहा, बाढ़ का पानी कितनी सहजता से निकला, कटाव कहां बढ़ा या घटा, जलीय जीवन कितना सुरक्षित रहा और क्या नदी का तलछट-संतुलन कायम रहा। गाद से लड़ना नहीं, उसकी भाषा समझना जरूरी नदी को बचाने के लिए उसकी गाद से लड़ना नहीं, उसकी गाद की भाषा समझना जरूरी है क्योंकि नदी से गाद निकालकर नदी नहीं बचती। नदी तब बचती है जब उसका प्रवाह, तल, तट, जलग्रहण क्षेत्र, जंगल, आर्द्रभूमि और जीवन, सब साथ बचें और यही समझ बिहार की गाद नीति को नदी नीति में बदल सकती है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)