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माटी का श्रृंगार : अंतिम अध्याय नोएडा (यूपी)। संध्या उतर रही है। दिन भर धूप में तपे घड़े अब ठंडी हवा को अपने भीतर समेटने लगे हैं। आंगन में कतारबद्ध रखे दीपकों पर डूबते सूर्य की अंतिम किरणें ठहर-ठहरकर जैसे कोई मौन आशीर्वाद लिख रही हैं। दूर खेतों से लौटते किसानों के पैरों से उड़ती धूल उसी मिट्टी में मिल जाती है, जिससे सुबह ये बर्तन बने थे। चाक अब रुक चुका है। लेकिन उसकी गति समाप्त नहीं हुई। उसकी परिक्रमा अभी भी हवा में है। उसकी लय अभी भी उन हथेलियों में है, जिन्होंने दिन भर मिट्टी को आकार दिया। और शायद उसकी स्मृति अब इस धरती की स्मृति का हिस्सा बन चुकी है। हम अक्सर समझते हैं कि सभ्यताएं बड़े-बड़े आविष्कारों से बनती हैं। यह आधा सत्य है। सभ्यताएं वास्तव में उन छोटे-छोटे श्रमों से बनती हैं, जिन्हें इतिहास अक्सर दर्ज नहीं करता। जिसने पहला दीप बनाया, उसका नाम किसी शिलालेख पर नहीं लिखा गया। जिसने पहली सुराही गढ़ी, उसका कोई स्मारक नहीं बना। जिसने पहला कुल्हड़ बनाया, उसके सम्मान में कोई राजकीय समारोह नहीं हुआ। लेकिन, यदि वे लोग न होते, तो शायद सभ्यता का स्वरूप भी वैसा न होता जैसा आज है। इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह सम्राटों के नाम याद रखता है, शिल्पियों के उन हाथों को नहीं, जिसने सृजन से संसार रचा। मिट्टी कभी शिकायत नहीं करती धरती ने कभी मनुष्य से कुछ नहीं मांगा। उसने केवल दिया। बीज को अंकुर बनने की जगह दी। नदी को बहने का रास्ता दिया। घर बनाने की ईंट दी। दीपक बनने की मिट्टी दी। मटका बनने का धैर्य दिया। और अंत में मनुष्य को विश्राम की गोद भी वही देती है। मिट्टी कभी शिकायत नहीं करती कि उसे रौंदा गया। वह हर बार फिर उठती है। फिर खेत बनती है। फिर अन्न बनती है। फिर घड़ा बनती है। फिर दीपक बनती है। यही उसका धर्म है। और यही कुम्हार का भी। कुम्हार हमें क्या सिखाता है वह सिखाता है कि सृजन शोर से नहीं होता। धीरे-धीरे होता है। धैर्य से होता है। प्रेम से होता है। वह यह भी सिखाता है कि हर चीज़ को समय चाहिए। बीज को वृक्ष बनने में समय लगता है। मिट्टी को घड़ा बनने में समय लगता है। मनुष्य को मनुष्य बनने में भी समय लगता है। आज का समाज गति से प्रेम करता है। कुम्हार हमें विराम का महत्व समझाता है। आज का समाज उपभोग में विश्वास करता है। कुम्हार उपयोग और संरक्षण का संतुलन सिखाता है। आज का समाज कृत्रिम चमक से आकर्षित है। कुम्हार सादगी की सुंदरता दिखाता है। हर दीपक के पीछे एक कहानी है इस वर्ष जब दीपावली आए और आप एक छोटा-सा मिट्टी का दीप अपने हाथ में लें, तो एक क्षण के लिए उसे ध्यान से देखिए। उसकी गोलाई में किसी बच्चे की हंसी छिपी है। उसकी किनारियों में किसी स्त्री की मेहनत है, जिसने उसे संवारा। उसकी सतह पर किसी वृद्ध कुम्हार की उंगलियों के निशान हैं। उसके भीतर किसी परिवार की उम्मीदें हैं। वह दीप केवल मिट्टी नहीं है। वह श्रम का प्रकाश है। यदि किसी गर्म दोपहर में मटके का पानी आपकी प्यास बुझाए, तो यह भी याद रखिए कि उस शीतलता के पीछे किसी ने तपती धूप में मिट्टी ढोई थी। यदि किसी रेल स्टेशन पर कुल्हड़ में चाय मिले, तो उसे केवल चाय समझकर मत पीजिए। वह आपकी हथेलियों तक पहुंची हुई सदियों पुरानी परंपरा है। समय बदल गया, संघर्ष नहीं आज प्लास्टिक है। स्टील है। एल्यूमिनियम है। मशीनों से बने लाखों सस्ते उत्पाद हैं। शहरों में कुल्हड़ की जगह कागज़ के कप आ गए। दीयों की जगह बिजली की लड़ियां चमकने लगीं। घड़ों की जगह फ्रिज ने ले ली। और सबसे बड़ी बात, कारीगर की कला का मूल्य आज भी उसके श्रम के बराबर नहीं है। फिर भी... वह हार नहीं मानता। जब अगली बार आपके हाथ में कुल्हड़ आए... दीपावली पर कोई दीप जले... गर्मी में मटके का शीतल जल आपकी प्यास बुझाए... या किसी मंदिर में मिट्टी का घोड़ा दिखाई दे... तो एक क्षण रुककर उस अनाम कुम्हार को अवश्य याद कीजिए। क्योंकि उस मिट्टी में केवल धरती नहीं, किसी परिवार का पूरा जीवन गुंथा हुआ है। हम क्या बचाना चाहते हैं आज पूरी दुनिया "विरासत बचाने" की बात करती है। हम पुराने किले बचाना चाहते हैं। पुराने मंदिर बचाना चाहते हैं। पुरानी इमारतें बचाना चाहते हैं। यह आवश्यक भी है। लेकिन क्या केवल इमारतें ही विरासत हैं? या वह कारीगर भी विरासत है, जो आज भी अपने पिता और दादा की तरह चाक घुमा रहा है? यदि चाक रुक गया, तो केवल बर्तन बनना बंद नहीं होंगे। लोकगीतों का एक स्वर मौन हो जाएगा। त्योहारों की एक परंपरा कम हो जाएगी। गांव की एक पहचान मिट जाएगी। भाषा का एक रूपक खो जाएगा। और हमारी सभ्यता की एक स्मृति हमेशा के लिए धुंधली पड़ जाएगी। भविष्य की ओर लौटती हुई सभ्यता शायद आने वाला समय फिर मिट्टी का समय होगा। जब दुनिया टिकाऊ और लंबे जीवन की ओर लौटेगी। जब बच्चे प्लास्टिक के खिलौनों से अधिक हस्तनिर्मित खिलौनों का मूल्य समझेंगे। जब शहरों की बालकनियों में टेराकोटा के गमले फिर मुस्कुराएंगे। जब रेस्तरां फिर कुल्हड़ में चाय और लस्सी परोसने को गौरव मानेंगे। जब घरों में मटके का पानी केवल परंपरा नहीं, स्वास्थ्य का विकल्प बनेगा और जब कोई युवा गर्व से कहेगा, "मैं कुम्हार हूँ। मैं मिट्टी को जीवन देता हूँ।" उस दिन यह केवल एक पेशे की वापसी नहीं होगी। यह मनुष्य का अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। मिट्टी में बसती है मनुष्यता "माटी का श्रृंगार" की यह यात्रा केवल मिट्टी के बर्तनों की यात्रा नहीं है। यह मनुष्य के श्रम, धैर्य, सृजन और सभ्यता की यात्रा है। हमने जाना कि मिट्टी केवल धरती नहीं होती, वह इतिहास होती है। घड़ा केवल बर्तन नहीं होता, वह जीवन होता है। दीप केवल प्रकाश नहीं होता, वह आशा होता है। और कुम्हार केवल एक कारीगर नहीं होता, वह सृष्टि के बाद सबसे बड़ा सृजनकर्ता होता है। चाक की गति में ब्रह्मांड की पहली लय छुपी है। जब कुम्हार की गीली हथेलियां माटी को सहलाती हैं, तो केवल एक पात्र आकार नहीं लेता, वहां सदियों की तपन, पूर्वजों का संचित धैर्य, और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य संवरता है। मिट्टी का हर घट, हर कुल्हड़ और हर नन्हा दीप इस बात का प्रमाण है कि सृजन का मूल शोर में नहीं, मौन समर्पण में है। सृजन का संसार जब भी किसी गांव से गुज़रिए और कहीं चाक घूमता दिखाई दे, तो कुछ पल ठहर जाइए। देखिए कि एक साधारण-सा आदमी किस धैर्य से मिट्टी को आकार दे रहा है। उसके हाथों में कोई जादू नहीं है। फिर भी जादू है।उसके पास कोई बड़ी मशीन नहीं है। फिर भी वह सृजन कर रहा है। उसके पास कोई बड़ा पुरस्कार नहीं है। फिर भी वह सभ्यता का सबसे बड़ा पुरस्कार हर दिन अर्जित करता है, मनुष्य के जीवन को उपयोगी, सुंदर और अर्थपूर्ण बनाने का पुरस्कार। कभी-कभी लगता है कि ईश्वर यदि धरती पर किसी कलाकार का रूप लेकर उतरता होगा, तो शायद वह किसी कुम्हार की तरह ही दिखाई देता होगा, जो मिट्टी उठाता है, उसे प्रेम से गूंथता है, धैर्य से आकार देता है, अग्नि में तपाता है और फिर मुस्कुराकर उसे संसार के हवाले कर देता है। माटी की स्मृति शायद मनुष्य की कहानी भी इससे अलग नहीं। हम सब उसी अनंत कुम्हार की चाक पर घूमती हुई मिट्टी हैं। कोई दीपक बनता है। कोई घड़ा। कोई सुराही। कोई कलश। रूप अलग-अलग हैं, लेकिन तत्व एक ही है...माटी। और इसी माटी में हमारी स्मृतियां हैं। हमारी संस्कृति है। हमारी सभ्यता है और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी। माटी को बचाना केवल एक शिल्प को बचाना नहीं है, यह मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़े रखने का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संकल्प है। क्योंकि अंततः सभ्यता की सबसे सुंदर कहानी पत्थरों पर नहीं, माटी पर लिखी गई है। वह आज भी किसी अनाम कुम्हार की हथेलियों पर गीली माटी बनकर सांस ले रही है। जिस दिन चाक रुक जाएगा, उस दिन केवल मिट्टी नहीं सूखेगी, मनुष्य की स्मृतियां भी सूखने लगेंगी। सभ्यता की आत्मा भी सांस लेती रहे, इसके लिए जरूरी है कि चाक धूमता रहे।



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