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नई दिल्ली। किसान जब खेत में बीज डालता है तो केवल फसल नहीं बोता, वह अपनी अगली फसल, परिवार की जरूरत और कर्ज चुकाने की उम्मीद भी बोता है। बीज खराब निकला तो नुकसान पैकेट की कीमत तक सीमित नहीं रहता। खेत की तैयारी, खाद, सिंचाई, मजदूरी और पूरा मौसम दांव पर लग जाता है। इसलिए नए बीज कानून की जरूरत पर बहस से अधिक जरूरी सवाल यह है कि उसका केंद्र कौन होगा—किसान या बीज बाजार? कृषि भवन में गूंजा किसान और बाजार का सवाल 10 सितंबर को नई दिल्ली के कृषि भवन में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ देशभर के 100 से अधिक किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की संवादात्मक बैठक में यही सवाल अलग-अलग रूपों में सामने आया। बीज क्षेत्र के नियामक ढांचे और प्रस्तावित कानून पर सुझाव दिए गए। सरकार का मानना है कि बीज अधिनियम, 1966 और बीज नियंत्रण आदेश, 1983 बदलती कृषि व्यवस्था के लिए पर्याप्त नहीं हैं। नवंबर-दिसंबर 2025 में मसौदे पर करीब 18 हजार सुझाव मिलने के बाद भी सरकार ने किसान संगठनों से संवाद जारी रखा है। कानून लाने की कोई समय-सीमा अभी तय नहीं की गई है। यह सावधानी स्वागतयोग्य है। क्योंकि बीज कानून सिर्फ नकली बीज रोकने का कानून नहीं होगा। यह तय करेगा कि बीज की गुणवत्ता का जोखिम कौन उठाएगा, किसान को नुकसान होने पर न्याय कितनी जल्दी मिलेगा और कृषि की पारंपरिक बीज-संपदा पर किसका अधिकार रहेगा। कठोर दंड के साथ किसान की भागीदारी की मांग किसान महापंचायत ने नकली और बांझ बीज के मामलों में कठोर दंड, प्रभावित किसानों को पर्याप्त मुआवजा, कंपनियों की जवाबदेही और शिकायतों की जांच की मांग की है। बीज से जुड़ी समितियों में किसानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग भी महत्वपूर्ण है लेकिन जुर्माना और मुआवजा एक बात नहीं हैं। कंपनी पर कार्रवाई हो जाए और किसान मुआवजे के लिए वर्षों भटकता रहे तो कानून की कठोरता किसान के किस काम की? किसान के लिए न्याय की पहली शर्त समय पर राहत है। यहीं प्रगतिशील कृषि मंच के राष्ट्रीय संयोजक किशोर जायसवाल का सुझाव महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने खराब बीज से जुड़े विवादों और क्षतिपूर्ति के लिए स्वतंत्र शिकायत निवारण अधिकारी या ओम्बड्समैन जैसी व्यवस्था का सुझाव दिया है। किसान के पास ऐसी संस्था होनी चाहिए जहां शिकायत दर्ज करना आसान हो, जांच निष्पक्ष और वैज्ञानिक हो, जिम्मेदारी तय हो और मुआवजा समयबद्ध मिले। असमान जमीन पर कैसे शुरू होगा न्याय यह व्यवस्था इसलिए भी जरूरी है कि किसान के पास न प्रयोगशाला होती है, न विशेषज्ञों की टीम और न ही कंपनी के बराबर कानूनी संसाधन। यदि खराब बीज साबित करने का पूरा बोझ किसान पर डाल दिया गया तो न्याय की शुरुआत ही असमान जमीन से होगी।फिर भी हर फसल खराब होने को खराब बीज मान लेना उचित नहीं। मौसम, मिट्टी, सिंचाई, कीट और कृषि पद्धति भी परिणाम तय करते हैं। इसलिए शिकायत व्यवस्था किसान-पक्षधर होने के साथ वैज्ञानिक और स्वतंत्र भी होनी चाहिए। सवाल कंपनी को पहले से दोषी मानने का नहीं, किसान को कमजोर पक्ष मानकर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने का है। नए कानून की दूसरी परीक्षा नियमन और किसान की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की होगी। पंजीकरण, गुणवत्ता निगरानी, बीज की पहचान और आपूर्ति-श्रृंखला पर नजर मजबूत करना नकली बीज के खिलाफ जरूरी कदम हैं। लेकिन नियमन ऐसा नहीं होना चाहिए कि उसकी सबसे बड़ी कीमत किसान ही चुकाए। विविध खेती पर एकरूप आदेश का खतरा भारत की खेती एकरूप नहीं है। पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार और झारखंड की कृषि पारिस्थितिकी अलग हैं। स्थानीय मिट्टी, मौसम और परंपरा के अनुरूप विकसित बीजों की अपनी उपयोगिता है। इसलिए राष्ट्रीय गुणवत्ता मानक जरूरी हैं, लेकिन राज्यों, कृषि संस्थाओं और किसानों की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है। केंद्रीय कानून कृषि की विविधता को केंद्रीकृत आदेश में बदल दे, यह जोखिम नहीं लिया जा सकता। सबसे संवेदनशील प्रश्न किसान के अपने बीज का है। सरकार की ओर से कहा गया है कि किसान पारंपरिक और कृषक किस्मों के बीजों का उपयोग, आदान-प्रदान और बिक्री कर सकेंगे तथा इसके लिए अनिवार्य पंजीकरण नहीं होगा। यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, लेकिन अधिकार का सबसे सुरक्षित स्थान कानून की स्पष्ट धारा होती है, बयान नहीं। जलवायु संकट में स्थानीय बीजों की बढ़ती अहमियत भारत की खेती की असली पूंजी केवल उच्च उत्पादकता वाली आधुनिक किस्में नहीं हैं। गांवों में पीढ़ियों से बचाए गए स्थानीय बीज भी इस पूंजी का हिस्सा हैं। जलवायु परिवर्तन के समय इनकी अहमियत और बढ़ती है। सूखा, बाढ़, गर्मी और नए रोगों के बीच विविध बीज कृषि को संकट से उबरने के अधिक विकल्प देते हैं। किशोर जायसवाल ने इसलिए देशी और पारंपरिक बीजों तथा उनके सुरक्षित भंडार के संरक्षण की मजबूत संस्थागत व्यवस्था का सुझाव दिया है। संबंधित संस्थाओं को सुरक्षित बीज भंडार की जिम्मेदारी देने और उन्हें नियामक व्यवस्था से जोड़ने की बात भी महत्वपूर्ण है। संरक्षण किसान के साथ हो, किसान से अलग नहीं लेकिन बीज संरक्षण का अर्थ किसान से उसकी बीज-संपदा छीनकर किसी संस्था के गोदाम में बंद कर देना नहीं हो सकता। संरक्षण तभी सार्थक है जब किसान उस बीज का स्वामी और उपयोगकर्ता बना रहे। बीज बचाने की व्यवस्था किसान के साथ होनी चाहिए, किसान से अलग नहीं। जायसवाल का तीसरा सुझाव कृषि अनुसंधान को पर्याप्त नीतिगत समर्थन और संसाधन देने का है। इसे भी नए कानून की बहस के केंद्र में होना चाहिए। जलवायु परिवर्तन ने कृषि अनुसंधान की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। अब केवल ज्यादा उत्पादन वाली किस्में पर्याप्त नहीं। कम पानी में टिकने वाली, तापमान सहने वाली, बाढ़ या सूखे के बाद भी बेहतर प्रदर्शन करने वाली और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों की जरूरत है साथ ही साथ विकसित बीजों की प्राप्यता आवश्यक है । हर समस्या बाजार के लिए लाभकारी नहीं निजी क्षेत्र का अनुसंधान जरूरी है, लेकिन हर कृषि समस्या बाजार के लिए लाभकारी नहीं होती। छोटे किसानों, कम लाभ वाली फसलों और दूरदराज के क्षेत्रों की जरूरतों पर सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों को काम करना होगा। खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक निवेश को बाजार की जिम्मेदारी मान लेना खतरनाक होगा। यहीं बीज कानून बाजार और किसान के बीच शक्ति-संतुलन का सवाल बन जाता है। नियमन का उद्देश्य बाजार को बंद करना नहीं, उसे जिम्मेदार बनाना होना चाहिए। कंपनियों की जवाबदेही तय करने के साथ किसान की सौदेबाजी और शिकायत करने की क्षमता भी बढ़ानी होगी। किसान को यह पता होना चाहिए कि वह कौन-सा बीज खरीद रहा है, उसकी गुणवत्ता क्या है, शिकायत कहां करेगा और नुकसान होने पर मुआवजा कैसे मिलेगा। केवल पैकेट पर तकनीकी विवरण, क्यूआर कोड या डिजिटल व्यवस्था जोड़ देना पर्याप्त नहीं। किसान तक सूचना, जांच और न्याय की वास्तविक पहुंच जरूरी है। विरोधाभासों के बीच कानून की सबसे बड़ी कसौटी यही नए कानून की सबसे बड़ी कसौटी है। एक ओर नकली और घटिया बीज का बाजार है, दूसरी ओर किसानों की पारंपरिक बीज-संपदा। एक ओर नई तकनीक और निजी निवेश की जरूरत है, दूसरी ओर बाजार के वर्चस्व का खतरा। एक ओर देशव्यापी गुणवत्ता मानक चाहिए, दूसरी ओर भारत की स्थानीय कृषि-विविधता को बचाना है। इन विरोधाभासों का समाधान किसी एक पक्ष को मजबूत करके नहीं, किसान को केंद्र में रखकर ही निकलेगा। देश के विभिन्न किसानों संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत तभी सार्थक होगी जब वह केवल मसौदे पर सहमति लेने की औपचारिकता न बने। सुझावों का मूल्य तभी है जब वे कानून की धाराओं में दिखाई दें। छह सवाल तय करेंगे कानून की दिशा अब सवाल स्पष्ट हैं। क्या खराब बीज की शिकायत के लिए स्वतंत्र और सुलभ व्यवस्था बनेगी? क्या मुआवजा समयबद्ध होगा? क्या कंपनियों की जवाबदेही स्पष्ट होगी? क्या किसान नियामक संस्थाओं में प्रभावी भूमिका निभाएगा? क्या पारंपरिक बीजों पर उसका अधिकार सुरक्षित रहेगा? क्या सार्वजनिक कृषि अनुसंधान को पर्याप्त संसाधन मिलेंगे? इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि नया सीड बिल किसान का कानून बनेगा या केवल बीज बाजार का नियमन करेगा। बीज और भविष्य—दोनों पर किसान का अधिकार बीज पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन किसान के भविष्य पर नियंत्रण उससे भी जरूरी है। नकली बीज से मुक्ति, गुणवत्तापूर्ण बीज तक पहुंच, अपनी बीज-संपदा की रक्षा, नुकसान पर समयबद्ध न्याय और बदलती जलवायु के अनुकूल तकनीक—ये किसान के अधिकार हैं, किसी बाजार की कृपा नहीं। नए कानून की सफलता धाराओं की संख्या से नहीं, किसान के भरोसे से मापी जानी चाहिए। बीज खरीदते समय उसका भरोसा बढ़े, फसल खराब होने पर उसे न्याय मिले और भविष्य की खेती के लिए उसकी बीज-संपदा सुरक्षित रहे—तभी कानून सफल होगा क्योंकि बीज सिर्फ खेत में नहीं बोया जाता। उसके साथ किसान अपना भविष्य बोता है। ( कुमार कृष्णन स्वतंत्र पत्रकार, लेखक और सामाजिक सरोकारों के सक्रिय हस्ताक्षर हैं।)



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