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पटना। सूखा, बाढ़ और लेट मानसून जैसी मौसम की हर 'गुगली' को नाकाम करने के लिए बिहार का कृषि विभाग इस बार किसानों को 'चरणबद्ध धान नर्सरी' का एक ऐसा स्मार्ट सुरक्षा कवच दे रहा है, जो खेती के जोखिमों को शून्य कर समय पर बंपर पैदावार की गारंटी बनेगा। आखिर क्या है यह 'चरणबद्ध नर्सरी प्रणाली' और इसके फायदे इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसका लचीलापन है। पारंपरिक तरीके से एक ही बार में सारी नर्सरी तैयार करने के बजाय इस प्रणाली में एक से दो सप्ताह के अंतराल पर दो से तीन चरणों में बिचड़ा (पौधे) तैयार किया जाता है। इसका सीधा फायदा यह होता है कि अगर मानसून की देरी या कम बारिश की वजह से रोपाई टालनी भी पड़े तो किसानों के पास हर समय रोपाई के लिए 25 से 28 दिन के स्वस्थ पौधे उपलब्ध रहते हैं। यदि किसी कारणवश पहली नर्सरी खराब हो जाती है, तो दूसरी या तीसरी नर्सरी बैकअप का काम करती है, जिससे किसानों को दोबारा महंगे बीज खरीदने और समय गंवाने की जरूरत नहीं पड़ती। कृषि विभाग का विशेष टाइम-टेबल: कब, कौन सी वैरायटी लगाएं कृषि विभाग ने इसके लिए एक व्यवस्थित टाइम-टेबल भी जारी किया है ताकि किसान मौसम के अनुसार सही किस्म का चुनाव कर सकें। इसके तहत जून के पहले पखवाड़े में लंबी अवधि (150 दिन से अधिक) वाली धान की किस्मों के लिए पहली नर्सरी लगाने की सलाह दी गई है। इसके बाद, जून के अंतिम सप्ताह में मध्यम और अल्प अवधि (110-135 दिन) वाली किस्मों के लिए दूसरा चरण शुरू होगा। वहीं, आखिरी और तीसरे चरण में जुलाई के दूसरे सप्ताह के दौरान केवल बेहद कम समय (110-115 दिन) में तैयार होने वाली धान की किस्मों की नर्सरी तैयार करने की सिफारिश की गई है। छोटे किसानों की लागत घटाएगा यह 'सामुदायिक मॉडल' यह तकनीक केवल बड़े किसानों तक सीमित न रहे, इसके लिए विभाग छोटे और सीमांत किसानों के बीच 'सामुदायिक चरणबद्ध नर्सरी मॉडल' को बढ़ावा दे रहा है। इस मॉडल में किसान समूह बनाकर सामूहिक रूप से एक ही जगह पर नर्सरी तैयार करते हैं। इससे सिंचाई, खाद और लेबर जैसी बुनियादी लागत आपस में बंट जाती है, जिससे खेती का खर्च काफी कम हो जाता है और जरूरत पड़ने पर सभी छोटे किसानों को समय पर स्वस्थ पौधे मिल जाते हैं। यह सामूहिक प्रयास कम लागत में अधिक मुनाफे की राह खोलता है। सारण जिले में 10 साल का सफल प्रयोग बना मिसाल इस तकनीक की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण सारण जिले के अपहर और दहियरा गांवों में देखने को मिला है। यहाँ निकरा परियोजना के तहत साल 2011 से 2021 के बीच पूरे एक दशक तक इस मॉडल का सफल परीक्षण किया गया। बाढ़ की विभीषिका झेलने वाले इन क्षेत्रों में भी 15 दिन के अंतराल पर नर्सरी तैयार करने से किसानों को मौसम के मिजाज के अनुकूल पौधे मिले और विपरीत परिस्थितियों में भी रोपाई का काम बिना रुके सुचारू रूप से चलता रहा। कृषि विभाग का मानना है कि बदलती जलवायु के बीच यह तकनीक समय पर रोपाई, बेहतर फसल प्रबंधन और बंपर पैदावार सुनिश्चित करने का सबसे व्यावहारिक और सुरक्षित जरिया है।



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