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माटी का श्रृंगार: श्रृंखला छह नोएडा (यूपी)। भारत की आर्थिक संरचना का इतिहास केवल राजकोष, व्यापारिक मार्गों और बड़े उद्योगों का इतिहास नहीं है। उसके भीतर एक ऐसा संसार भी है, जिसने बिना किसी शोर के सदियों तक देश की अर्थव्यवस्था को जीवित रखा। यह संसार है, कुम्हारों का। वे लोग, जिन्होंने धरती की साधारण मिट्टी को केवल घड़े, मटके और दीपक का रूप नहीं दिया, बल्कि उसे आजीविका, संस्कृति, व्यापार और आत्मनिर्भरता का आधार बना दिया। यदि किसान अन्नदाता है, तो कुम्हार जीवनदाता है। किसान धरती से अन्न निकालता है और कुम्हार उसी धरती को उपयोगी वस्तुओं में बदल देता है। दोनों मिलकर भारतीय ग्राम्य सभ्यता के दो ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर सदियों तक देश की अर्थव्यवस्था टिकी रही। आज जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, तब यह समझना आवश्यक है कि विकास की इस यात्रा में पारंपरिक कारीगरों, विशेषकर कुम्हार (प्रजापति) समुदाय की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। आधुनिक उद्योगों और डिजिटल अर्थव्यवस्था के बीच भी मिट्टी का यह प्राचीन व्यवसाय करोड़ों लोगों के जीवन, रोजगार और पर्यावरण से गहराई से जुड़ा हुआ है। ग्राम्य अर्थव्यवस्था की पहली कार्यशाला भारतीय गाँवों में कुम्हार केवल बर्तन बनाने वाला व्यक्ति नहीं था। वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन इकाइयों में से एक था। उसकी कार्यशाला ही गाँव का पहला लघु उद्योग थी। एक ही परिवार के पुरुष, महिलाएँ और बच्चे मिट्टी तैयार करने, चाक चलाने, बर्तन बनाने, उन्हें सुखाने, रंगने और भट्ठे में पकाने की प्रक्रिया में सहभागी होते थे। इस प्रकार यह उद्योग पारिवारिक श्रम पर आधारित स्वावलंबी आर्थिक मॉडल प्रस्तुत करता था। अनुमान है कि आज भी देश में 30 से 35 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी, टेराकोटा और सिरेमिक उद्योग से जुड़े हुए हैं, जबकि पारंपरिक कुम्हार परिवारों की संख्या लाखों में है। यह ऐसा कुटीर उद्योग है, जिसमें न्यूनतम पूंजी और स्थानीय संसाधनों के आधार पर आजीविका संभव होती है। भारत के सबसे बड़े कुटीर उद्योगों में एक मिट्टी का उद्योग भारत के सबसे पुराने और सबसे बड़े कुटीर उद्योगों में गिना जाता है। इसका सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें उत्पादन का प्रत्येक चरण स्थानीय स्तर पर पूरा होता है। मिट्टी स्थानीय, श्रम स्थानीय, बाजार स्थानीय और लाभ भी स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही वापस लौट आता है। दीपावली के दीये, गर्मियों के मटके, सुराही, कुल्हड़, विवाह के कलश, पूजा-पात्र, खिलौने, गमले, टेराकोटा मूर्तियाँ और सजावटी वस्तुएँ—इन सबका विशाल घरेलू बाजार हर वर्ष करोड़ों रुपये का व्यापार उत्पन्न करता है। भारत में केवल दीपावली के अवसर पर ही करोड़ों मिट्टी के दीपकों की बिक्री होती है, जिससे हजारों कुम्हार परिवारों को मौसमी रोजगार प्राप्त होता है। विदेशी मुद्रा कमाने वाली भारतीय मिट्टी भारतीय मिट्टी केवल देशवासियों को ही आकर्षित नहीं करती। उसकी सोंधी खुशबू विश्व बाजार तक पहुंच चुकी है। भारत से निर्मित सिरेमिक, टेराकोटा, कलात्मक बर्तन, हस्तनिर्मित मूर्तियाँ, सजावटी वस्तुएँ और टाइलें 140 से अधिक देशों में निर्यात की जाती हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया भारतीय हस्तशिल्प के प्रमुख आयातक हैं। भारत का हस्तशिल्प निर्यात प्रतिवर्ष लगभग 30,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुँचता है, जिसमें टेराकोटा, सिरेमिक और पारंपरिक मिट्टी की कलाकृतियों का भी उल्लेखनीय योगदान है। इस प्रकार कुम्हार केवल स्थानीय शिल्पकार नहीं रह गया है; वह भारत का सांस्कृतिक राजदूत भी बन चुका है। कुल्हड़ : पर्यावरण और अर्थशास्त्र का संगम एक समय प्लास्टिक और थर्मोकोल ने कुल्हड़ों को लगभग विस्थापित कर दिया था, किन्तु पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता ने मिट्टी को पुनः सम्मान दिलाया है। भारतीय रेलवे द्वारा अनेक स्टेशनों पर कुल्हड़ों में चाय परोसने की पहल तथा विभिन्न राज्यों में प्लास्टिक प्रतिबंध के बाद मिट्टी के कुल्हड़ों की मांग तेजी से बढ़ी है। देशभर में प्रतिदिन लाखों कुल्हड़ों का उपयोग होता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में नकद आय का प्रवाह बढ़ता है और स्थानीय रोजगार सृजित होता है। कुल्हड़ केवल एक प्याला नहीं है; वह "लोकल फॉर वोकल" और "आत्मनिर्भर भारत" की जीवंत अभिव्यक्ति है। हर त्योहार के केंद्र में कुम्हार भारतीय पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के वार्षिक व्यापार मेले भी हैं। दीपावली के दीपक, गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा की प्रतिमाएँ, छठ के सूप और कलश, नवरात्रि के घट, करवा चौथ के करवे, विवाह के मंगल कलश, जन्म संस्कार के पात्र—इन सबका निर्माण कुम्हार करता है। भारत के त्योहारों की अर्थव्यवस्था में मिट्टी का योगदान अरबों रुपये के मौसमी व्यापार का आधार बनता है। प्रत्येक पर्व हजारों परिवारों के लिए रोजगार लेकर आता है। हरित अर्थव्यवस्था का सबसे प्राचीन मॉडल आज पूरी दुनिया "ग्रीन इकोनॉमी" और "सस्टेनेबल डेवलपमेंट" की बात कर रही है। आश्चर्य यह है कि भारतीय कुम्हार हजारों वर्षों से यही मॉडल अपनाता आया है। मिट्टी के उत्पाद 100 प्रतिशत जैव-अवक्रमणीय होते हैं। इनके निर्माण में स्थानीय संसाधनों का उपयोग होता है। इनके नष्ट होने पर कोई विषैला कचरा नहीं बनता। यह उद्योग न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन करता है और प्राकृतिक संसाधनों के पुनर्चक्रण पर आधारित है। इस दृष्टि से देखा जाए तो कुम्हार केवल शिल्पकार नहीं, बल्कि भारत का पहला पर्यावरण वैज्ञानिक भी है। सरकारी योजनाओं से बदलती तस्वीर पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने पारंपरिक कुम्हारों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के अनेक प्रयास किए हैं। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की कुम्हार सशक्तिकरण योजना के अंतर्गत हजारों कारीगरों को इलेक्ट्रिक चाक, ब्लंजर मशीन, आधुनिक उपकरण और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया है। इलेक्ट्रिक चाक के प्रयोग से उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ी है और श्रम भी कम हुआ है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, मुद्रा योजना, ग्रामोद्योग विकास योजना तथा एक जिला–एक उत्पाद जैसी योजनाओं ने पारंपरिक शिल्प को नए बाजार उपलब्ध कराए हैं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर टेराकोटा, खुर्जा सिरेमिक, पश्चिम बंगाल का बांकुड़ा घोड़ा, राजस्थान की ब्लू पॉटरी और गुजरात सहित अनेक क्षेत्रों की मृद्भांड परंपराओं को जीआई टैग और विपणन सहायता मिल रही है। चुनौतियाँ अभी भी शेष हैं इसके बावजूद चुनौतियाँ कम नहीं हैं। प्लास्टिक और स्टील के सस्ते विकल्प, कच्ची मिट्टी की उपलब्धता में कमी, बढ़ती ईंधन लागत, सीमित विपणन, डिज़ाइन नवाचार का अभाव और नई पीढ़ी का अन्य व्यवसायों की ओर पलायन इस शिल्प के सामने गंभीर प्रश्न हैं।यदि समय रहते इन चुनौतियों का समाधान नहीं किया गया, तो केवल एक व्यवसाय ही नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत भी संकट में पड़ सकती है। जब चाक घूमता है, तब अर्थव्यवस्था भी चलती है किसी राष्ट्र की समृद्धि केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों और विशाल कारखानों से नहीं मापी जाती। उसका वास्तविक मापदंड यह भी होता है कि उसके सबसे साधारण कारीगर का जीवन कितना सम्मानपूर्ण है। कुम्हार का चाक केवल मिट्टी नहीं गढ़ता, वह रोजगार गढ़ता है, पर्यावरण बचाता है, संस्कृति को जीवित रखता है, विदेशी मुद्रा अर्जित करता है और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला मजबूत करता है। जब कोई कुम्हार अपनी हथेली से मिट्टी को आकार देता है, तब वह केवल एक घड़ा नहीं बनाता, वह भारत की अर्थव्यवस्था का एक और चक्र गति देता है। उसकी भट्ठी में केवल माटी नहीं पकती, वहाँ राष्ट्र की परंपरा, पर्यावरण, उद्यमिता और समृद्धि एक साथ तपकर भविष्य का आकार ग्रहण करती है। क्रमशः